

उत्तराखंड की धरती देवभूमि कहलाती है, परंतु विडंबना यह है कि यहां की पहाड़ियाँ और नदियाँ समय-समय पर आपदा का भीषण रूप धारण कर लेती हैं। चमोली जनपद के थराली क्षेत्र में हाल की प्राकृतिक आपदा ने कई परिवारों की खुशियाँ छीन लीं। ऐसे कठिन समय में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का प्रभावित क्षेत्र का दौरा करना केवल औपचारिकता नहीं बल्कि एक संवेदनशील संदेश है—“संकट की इस घड़ी में सरकार आपके साथ है।”


मुख्यमंत्री ने कुलसारी में राहत शिविर का निरीक्षण किया, प्रभावित परिवारों से संवाद किया और मृतकों के परिजनों को ₹5-5 लाख की तत्काल सहायता राशि प्रदान की। साथ ही बेघर हुए परिवारों के पुनर्वास की ठोस व्यवस्था करने का आश्वासन भी दिया। यह पहल प्रशासनिक सक्रियता और मानवीय संवेदनशीलता, दोनों का संगम है।

इस दौरान जिलाधिकारी संदीप तिवारी ने मुख्यमंत्री को राहत शिविरों की व्यवस्था, भोजन, चिकित्सा सुविधाओं और सड़क-पेयजल-विद्युत बहाली की प्रगति से अवगत कराया। राहत शिविरों में रहने वाले लोगों से मुख्यमंत्री ने सीधे फीडबैक लिया और अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि किसी भी प्रभावित व्यक्ति को असुविधा न हो। यह कदम शासन की गंभीरता और तात्कालिक प्रतिक्रिया को दर्शाता है।
फिर भी सवाल यह है कि क्या केवल तत्काल राहत और सांत्वना ही पर्याप्त है? उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य के लिए आपदा प्रबंधन की दीर्घकालिक रणनीति और भी अधिक महत्वपूर्ण है। बार-बार आपदाओं से जूझते पहाड़ी क्षेत्रों में मजबूत पूर्व चेतावनी तंत्र, वैकल्पिक सड़क नेटवर्क, सुरक्षित आवासीय योजनाएं और त्वरित राहत वितरण प्रणाली विकसित करना समय की मांग है।
सकारात्मक पक्ष यह है कि मुख्यमंत्री धामी ने अधिकारियों को 24×7 अलर्ट मोड पर काम करने के निर्देश दिए और युद्धस्तर पर राहत कार्य चलाने का भरोसा दिलाया। थराली आपदा से प्रभावित लोगों को सरकार की प्राथमिकता सूची में रखा जाना निश्चय ही स्वागत योग्य कदम है।
लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से यह आपदा हमें पुनः याद दिलाती है कि उत्तराखंड को केवल प्रतिक्रिया-प्रधान नहीं बल्कि पूर्वनियोजित आपदा-तैयारी वाले राज्य में बदलना होगा। तभी ऐसी त्रासदियों का प्रभाव कम किया जा सकेगा।
आज थराली के लोग राहत शिविरों में हैं, उनका जीवन असुरक्षित घरों और उजड़े सपनों से घिरा है। मुख्यमंत्री का दौरा उन्हें भरोसा और संबल तो देता है, लेकिन उनके स्थायी पुनर्वास और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना ही असली प्रशासनिक सफलता होगी।
यह संपादकीय सरकार की संवेदनशीलता को सराहते हुए यह भी रेखांकित करता है कि उत्तराखंड में दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन नीतियों की आवश्यकता अब और टाली नहीं जा सकती।




