संपादकीय लेख – डिज़ाइनर मोदक की मिठास और बाज़ार की बदलती संस्कृति

Spread the love

रुद्रपुर, उत्तराखंड  गणेश चतुर्थी का पर्व केवल आस्था का नहीं बल्कि परंपरा, संस्कृति और बदलते बाज़ार की रचनात्मकता का भी प्रतीक बन चुका है। महाराष्ट्र और गुजरात की तरह अब उत्तराखंड में भी गणेश उत्सव तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है। रुद्रपुर, काशीपुर, हरिद्वार, देहरादून से लेकर पहाड़ों के कस्बों तक मंडल सज रहे हैं, दक्षिण भारतीय परंपरा की छाप दिख रही है और भक्तगण अपने बप्पा को प्रसन्न करने के लिए नए-नए प्रयोग कर रहे हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर (उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी)

रुद्रपुर देहरादून जैसे बाज़ारों में जब 5000 हज़ार रुपये किलो तक के “गोल्डन मोदक” बिक रहे हों, तो यह केवल मिठाई नहीं बल्कि आधुनिक समय की “शान और पहचान” भी बन जाती है। कमल के बीच रखा मोदक, पान पर मोदक या फिर शंख के साथ मोदक – ये केवल स्वाद की चीज़ें नहीं बल्कि आस्था में डिज़ाइन और नवाचार का समावेश है। यही लहर धीरे-धीरे उत्तराखंड तक भी पहुँच रही है, जहाँ स्थानीय हलवाई भी चॉकलेट, ड्रायफ्रूट और केसर-बादाम जैसे फ्लेवर के साथ गणपति के प्रिय मोदक बनाने लगे हैं।

यह प्रवृत्ति हमें दो तरफ़ ले जाती है। एक ओर यह बताती है कि हमारी धार्मिक परंपराएं समय के साथ जुड़कर कितनी आधुनिक हो सकती हैं, वहीं दूसरी ओर यह उपभोक्तावादी बाज़ार की ताक़त को भी उजागर करती है। भक्तिभाव और भव्यता का यह संगम कहीं-कहीं “आडंबर” भी लगता है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इससे उत्सव में नई ऊर्जा, स्वाद और आकर्षण जुड़ रहा है।

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी प्रदेश में जहां त्यौहार अक्सर सादगी से मनाए जाते रहे हैं, वहां अब महानगरों और मैदानों की तरह भव्य पंडाल, डिज़ाइनर प्रसाद और अलग-अलग फ्लेवर की मिठाइयां प्रवेश कर रही हैं। यह सांस्कृतिक मिलन नई पीढ़ी को उत्सव से जोड़ने का एक तरीका भी है।

अंततः, चाहे वह राजकोट के 12 हज़ार रुपये किलो वाले “गोल्डन मोदक” हों या रुद्रपुर के स्थानीय हलवाई के 500 रुपये किलो वाले केसर-मावा मोदक – दोनों ही हमारी आस्था के प्रतीक हैं। फर्क केवल बाज़ार और जीवनशैली का है। जरूरत इस बात की है कि हम उत्सव की आत्मा – भक्ति और सरलता – को बनाए रखते हुए नवाचार का स्वागत करें।



Spread the love