

उत्तराखंड की राजनीति का परिदृश्य 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही गरमाने लगा है। सत्ता में लगातार कमजोर होती कांग्रेस पार्टी अब अपने पुराने चेहरों को फिर से सामने लाकर “फुके हुए कारतूसों में बारूद भरने” की कोशिश कर रही है। सवाल यह है कि क्या यह प्रयोग पार्टी को सत्ता के समीकरण में कोई नया जीवन देगा या यह सिर्फ संगठन के भीतर मौजूद ठहराव और वैचारिक दिवालियापन का प्रतीक है?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यही रही है कि पार्टी समय के साथ अपने चेहरे बदलने और जमीनी नेताओं को आगे लाने में विफल रही। वही पुराने नेता, जिनकी विश्वसनीयता जनता की नजरों में घट चुकी है, अब फिर मंच पर सजाए जा रहे हैं। यह रणनीति ठीक वैसी है जैसे जंग लगे हथियारों को फिर से चमका कर युद्ध जीतने का सपना देखना। जबकि हकीकत यह है कि आज का मतदाता बेहद जागरूक है और वह पुराने वादों और थके-हारे नारों में विश्वास नहीं करता।
भाजपा ने उत्तराखंड में लगातार चुनाव दर चुनाव संगठनात्मक मजबूती, धर्म-संस्कृति के एजेंडे और प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे के सहारे अपनी स्थिति मजबूत की है। इसके उलट कांग्रेस न तो कोई ठोस वैकल्पिक एजेंडा प्रस्तुत कर पाई है और न ही प्रदेश स्तर पर कोई ऐसा नेता खड़ा कर सकी है जिस पर जनता भरोसा कर सके। आलाकमान के सहारे चलने वाली राजनीति ने प्रदेश कांग्रेस को निर्जीव बना दिया है।
यदि कांग्रेस सचमुच 2027 की लड़ाई लड़ना चाहती है तो उसे “फुके कारतूसों” में बारूद भरने के बजाय नए विचार, नए चेहरे और जनता के मुद्दों पर आधारित ठोस रणनीति बनानी होगी। रोटी कपड़ा और मकान,बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे असली सवालों पर आक्रामक विपक्षी राजनीति ही उसे नया जीवन दे सकती है। वरना 2027 का चुनाव भी कांग्रेस के लिए एक और पराजय का अध्याय बनकर रह जाएगा। कांग्रेस के सामने अभी भी वक्त है, लेकिन यह तभी संभव है जब वह बीते कल के बोझ को ढोने के बजाय नए उत्तराखंड की उम्मीदों को अपनी राजनीति का आधार बनाए। अन्यथा फुके हुए कारतूस चाहे जितना चमकाए जाएं, वे युद्ध जीतने की ताकत नहीं रखते।




