संपादकीय :राष्ट्रपति का संदेश — नेताओं के लिए आईना, जनता के लिए प्रेरणा”लेखअवतार सिंह बिष्ट, रुद्रपुर)

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उत्तराखंड की स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित विधानसभा के विशेष सत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का भाषण जितना प्रेरणादायक था, उतना ही आत्ममंथन कराने वाला भी। महज 25 मिनट का यह संबोधन नेताओं के लिए किसी ‘आईने’ से कम नहीं था — जिसमें उन्होंने बड़ी विनम्रता से वह सब कह दिया, जो जनता वर्षों से कहना चाहती रही है, लेकिन जिसे सत्ता और विपक्ष दोनों ने सुनना ही नहीं चाहा।

राष्ट्रपति ने कहा कि जनप्रतिनिधि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर जनता के हित में काम करें। यह एक सीधी लेकिन करारी टिप्पणी थी — एक ऐसे राज्य पर, जहां बीते पचीस वर्षों में विकास से अधिक दल-बदल और दल-वाद का बोलबाला रहा। विधानसभा की कुर्सियां जनता की सेवा की जगह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का प्रतीक बनती गईं, और “जनप्रतिनिधि” का अर्थ “जनसेवक” से बदलकर “जनशासक” हो गया।

उत्तराखंड की यह त्रासदी रही है कि हर विधानसभा सत्र में जनता की आवाज से ज्यादा तालियों और टोमाटो की गूंज रही। पर्वतीय समस्याओं के समाधान पर जितनी चर्चा नहीं हुई, उतनी कुर्सियों और कैबिनेट पदों के बंटवारे पर हुई है। राष्ट्रपति के शब्द “जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच विश्वास का अटूट बंधन बनना चाहिए” — वास्तव में नेताओं के लिए चेतावनी हैं कि यदि यह बंधन टूटा, तो लोकतंत्र केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा।

राष्ट्रपति ने उत्तराखंड को “25 वर्ष का युवा राज्य” कहा — परंतु यह युवापन तभी सार्थक होगा जब यह राज्य जोश से ज्यादा होश से चले। आज उत्तराखंड के पहाड़ खाली हो रहे हैं, युवाओं का पलायन जारी है, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था गांवों में दम तोड़ रही है। ऐसे में महिला सशक्तिकरण और शिक्षा की जो सराहना राष्ट्रपति ने की, वह सरकार के लिए प्रेरक शब्द हैं, पर नेताओं के लिए परीक्षा का प्रश्नपत्र भी — क्या वे इस प्रशंसा को केवल मंचीय उपलब्धि मानेंगे या इसे व्यवहार में उतारने की जिम्मेदारी भी निभाएंगे?

अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के फैसलों — लोकायुक्त, नकल विरोधी कानून, समान नागरिक संहिता, जमींदारी विनाश अधिनियम — का उल्लेख किया। निस्संदेह, यह उल्लेख राजनीतिक सद्भावना का प्रतीक था, लेकिन साथ ही एक संकेत भी था कि सत्ता में बैठी सरकार को अब नारे नहीं, बल्कि परिणाम देने होंगे।

लोकायुक्त की बात आई तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है — 25 साल बाद भी भ्रष्टाचार क्यों जिंदा है? नकल विरोधी कानून तो बना, पर सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता कब आएगी? समान नागरिक संहिता पारित हो गई, पर क्या समाज में समानता सचमुच उतरी? ये प्रश्न आज भी जनता के दिल में धधक रहे हैं।

राष्ट्रपति का भाषण इस मायने में ऐतिहासिक था कि उन्होंने शब्दों में संयम रखते हुए भी नेताओं को आईना दिखा दिया। वह आईना, जिसमें झांकने की हिम्मत बहुत कम नेता जुटा पाएंगे। क्योंकि इस आईने में जनता का चेहरा है — वही जनता जिसने आंदोलन कर राज्य बनाया, शहीद दिए, और अब उसी राज्य की नीतियों में खुद को भुलाया हुआ पा रही है।

आज जब राज्य रजत जयंती मना रहा है, तब असली उत्सव केवल तब होगा जब नेता दल और वोट से ऊपर उठकर “जन और पहाड़” के लिए सोचें। क्योंकि उत्तराखंड की असली चमक सोने-चांदी की नहीं, बल्कि सेवा, संवेदना और स्वच्छ राजनीति की रजत चमक में है।

राष्ट्रपति मुर्मू के शब्दों में छिपा यह संदेश शायद आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के राजनीतिक चरित्र को नया आकार दे सके — अगर नेता इसे सुनने की विनम्रता दिखाएं। वरना इतिहास यही कहेगा —

“जनता ने राज्य बनाया, नेताओं ने राजनीति।”

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी



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