बिहार में फिर लौटेगा एनडीए? — चाणक्य स्ट्रैटेजी सर्वे से निकला चौंकाने वाला निष्कर्ष

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बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे मतदान की ओर बढ़ रहे हैं, राज्य की सियासी सरगर्मी अपने चरम पर है। 6 नवंबर को पहले चरण के मतदान से पहले मंगलवार को जारी चाणक्य स्ट्रैटेजी का सर्वे राजनीतिक हलकों में चर्चा का केंद्र बन गया है। सर्वे के नतीजे एक बार फिर यह संकेत दे रहे हैं कि बिहार की जनता शायद 2020 जैसी तस्वीर दोहराने जा रही है — यानी सत्ता की बागडोर एनडीए के हाथों में ही रहने वाली है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

एनडीए को बहुमत का आशीर्वाद?

बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से बहुमत के लिए आवश्यक 122 के मुकाबले सर्वे में एनडीए को 128 से 134 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। यदि यह आंकड़ा सच साबित हुआ तो यह नीतीश कुमार और भाजपा गठबंधन के लिए बड़ी राहत होगी। इस नतीजे से यह भी स्पष्ट होता है कि जातीय समीकरणों और केंद्र सरकार की योजनाओं का असर अब भी बिहार की जनता पर बना हुआ है।

महागठबंधन का गणित कमजोर

महागठबंधन, जिसमें राजद, कांग्रेस और वाम दल शामिल हैं, को सर्वे में 102 से 108 सीटों के बीच सीमित बताया गया है। यह आंकड़ा भले ही बहुत पीछे नहीं हो, लेकिन सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं। इसका अर्थ है कि तेजस्वी यादव की मेहनत के बावजूद मतदाता अभी भी एनडीए के ‘स्थिर सरकार’ वाले नारे से प्रभावित दिख रहे हैं।

जनसुराज और तीसरे मोर्चे का संघर्ष

प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी, मायावती की बीएसपी और ओवैसी की एआईएमआईएम जैसे दलों को मात्र 5 से 9 सीटें मिलने का अनुमान है। हालांकि, यह सीटें निर्णायक प्रभाव डाल सकती हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां वोटों का अंतर बेहद कम रहेगा। जनसुराज को लेकर उत्सुकता अधिक है, परंतु संगठनात्मक मजबूती की कमी स्पष्ट झलक रही है।

राज्य में दो चरणों में होगा मतदान

बिहार में इस बार चुनाव दो चरणों में कराए जा रहे हैं। पहले चरण में 6 नवंबर को 121 सीटों पर मतदान होगा, जबकि शेष 122 सीटों के लिए 11 नवंबर को वोट पड़ेंगे। मतगणना 14 नवंबर को होगी। यानी आने वाले 10 दिन बिहार की राजनीति की दिशा और दशा तय करने वाले होंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स का मानना है कि चाणक्य स्ट्रैटेजी का यह सर्वे बिहार की राजनीतिक हकीकत का प्रतिबिंब अवश्य है, लेकिन लोकतंत्र में अंतिम फैसला हमेशा मतदाता ही करते हैं। बिहार की राजनीति का इतिहास पलटवारों और अप्रत्याशित परिणामों से भरा रहा है। इसलिए कोई भी सर्वे अंतिम सच नहीं कहा जा सकता।
फिर भी, अगर माहौल यही बना रहा तो 2025 का चुनाव एक बार फिर एनडीए के ‘सत्ता पुनरागमन’ का दस्तावेज बन सकता है — और तेजस्वी यादव को अपने ‘युवा नेता’ से ‘विकल्प सरकार’ बनने की राह में अब भी लंबी दूरी तय करनी होगी।



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