संपादकीय:धामी सरकार के निवेश दावे बनाम बेरोजगारी की हकीकत_उत्तराखंड देश में सबसे अधिक बेरोजगारी दर वाला राज्य ?अवतार सिंह बिष्ट, संवाददाता, रुद्रपुर (उधम सिंह नगर)

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उत्तराखंड सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि प्रदेश में अभूतपूर्व निवेश आया है और लाखों युवाओं को रोजगार के अवसर मिले हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दिसंबर 2023 में आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट को राज्य के इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक उपलब्धि बताया था। सरकार के मुताबिक, इस समिट में 3.56 लाख करोड़ रुपये के निवेश के एमओयू (MOU) साइन हुए, जिनमें से एक लाख करोड़ रुपये के निवेश की ग्राउंडिंग हो चुकी है। मुख्यमंत्री बार-बार मंचों से कहते रहे कि “उत्तराखंड अब निवेशकों की पहली पसंद बन चुका है” और “प्रदेश आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ रहा है।”

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

लेकिन इसी बीच इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित Periodic Labour Force Survey (PLFS) की रिपोर्ट ने सरकार के दावों की चमक फीकी कर दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में उत्तराखंड देश में सबसे अधिक बेरोजगारी दर वाला राज्य बन गया है।


उत्तराखंड सबसे ऊपर बेरोजगारी दर में

रिपोर्ट के अनुसार, देश की औसत बेरोजगारी दर जहाँ 5.2% रही, वहीं उत्तराखंड में यह दर 8.9% तक पहुँच गई — यानी राष्ट्रीय औसत से लगभग 70% अधिक।
उत्तराखंड के बाद आंध्र प्रदेश (8.2%) और केरल (8%) का स्थान रहा।

केंद्रीय सांख्यिकी मंत्रालय की इस रिपोर्ट के मुताबिक:

  • ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर घटकर 4.4% रह गई,
  • जबकि शहरी बेरोजगारी दर बढ़कर 6.9% हो गई।

यानी जहाँ देश के ग्रामीण इलाकों में रोज़गार के अवसरों में सुधार दिखा, वहीं उत्तराखंड के शहरों में बेरोजगारी का संकट गहराया है।


युवाओं में सबसे ज्यादा बेरोजगारी

रिपोर्ट का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर में बढ़ोतरी हुई है।
देशभर में युवाओं की बेरोजगारी दर 14% तक पहुँच गई, जो पहली तिमाही के 14.6% के आसपास ही टिकी रही।
इसका अर्थ यह है कि उत्तराखंड के शिक्षित युवा—विशेष रूप से डिग्रीधारी—न तो सरकारी नौकरियों में स्थान पा रहे हैं, न ही निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर मिल रहे हैं।


तो फिर निवेश गया कहाँ?

यहाँ सबसे बड़ा सवाल उठता है —
यदि राज्य सरकार के दावे के अनुसार एक लाख करोड़ का निवेश “ग्राउंड” हो चुका है, तो फिर बेरोजगारी दर में यह बढ़ोतरी क्यों?
कहीं यह “ग्राउंडिंग” सिर्फ फाइलों और मंचीय घोषणाओं तक सीमित तो नहीं?

सच्चाई यह है कि इन्वेस्टर्स समिट में साइन हुए MOU सिर्फ “इरादे के पत्र” थे, जिनमें से बहुत से प्रोजेक्ट जमीन पर उतर ही नहीं पाए।
प्रदेश में न तो इतने बड़े पैमाने पर औद्योगिक यूनिट्स की स्थापना हुई, न ही रोजगार सृजन के वास्तविक आँकड़े सामने आए।
ज्यादातर “ग्राउंडेड” प्रोजेक्ट सिर्फ कागजी अनुमोदन और भूमि आवंटन तक ही सीमित हैं।


रोज़गार का झुकाव कृषि की ओर

PLFS रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देश में 42.4% लोग आज भी कृषि पर निर्भर हैं, जबकि उद्योग और सेवा क्षेत्र का हिस्सा अपेक्षाकृत कम है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहाँ उद्योगों को आकर्षित करने के लिए विशेष आर्थिक ज़ोन बनाए गए थे, वहाँ भी रोज़गार का बोझ अब फिर से खेतों पर लौटता दिखाई दे रहा है।
यह संकेत है कि प्रदेश में औद्योगिक विकास ठप पड़ा है, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही लोगों का सहारा बनी हुई है।


महिला श्रम भागीदारी बढ़ी, पर वेतन असमानता बरकरार

रिपोर्ट का एक सकारात्मक पहलू यह है कि महिलाओं की श्रम भागीदारी दर (LFPR) बढ़कर 33.7% हो गई है, जो पहले 33.4% थी।
लेकिन अधिकांश महिलाएँ स्व-रोजगार या पारिवारिक सहयोगी कार्यों में लगी हैं, जिनमें नियमित आय या सुरक्षा नहीं होती।
यानी महिलाओं की भागीदारी तो बढ़ी है, लेकिन उनके आर्थिक सशक्तिकरण की वास्तविक तस्वीर अभी धुंधली है।


राजनीतिक संदेश स्पष्ट है

धामी सरकार को यह समझना होगा कि निवेश की घोषणाएँ और बेरोजगारी के आँकड़े एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं होने चाहिए।
यदि निवेश सचमुच हुआ होता, तो बेरोजगारी दर घटनी चाहिए थी, न कि देश में सबसे अधिक होनी चाहिए थी।
प्रदेश के युवाओं के सामने नौकरी, कौशल प्रशिक्षण और स्थायी उद्योग की कमी एक गंभीर समस्या बन चुकी है।


संपादकीय :उत्तराखंड जैसे युवा राज्य के लिए बेरोजगारी का यह आँकड़ा चिंताजनक है।
यह न केवल सरकारी नीतियों की जमीन से दूरी दिखाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि इन्वेस्टर्स समिट की चमक अब फीकी पड़ चुकी है।

मुख्यमंत्री धामी को अब सिर्फ़ आंकड़ेबाज़ी छोड़कर,

  • निवेश की वास्तविक ग्राउंडिंग की समीक्षा करनी होगी,
  • युवाओं के लिए स्थायी उद्योग नीति लानी होगी,
  • और नौकरी सृजन के ठोस परिणाम जनता के सामने रखने होंगे।

क्योंकि जनता को अब सिर्फ़ “घोषणाओं का निवेश” नहीं, बल्कि “रोज़गार का परिणाम” चाहिए।


(लेखक अवतार सिंह बिष्ट रुद्रपुर स्थित वरिष्ठ पत्रकार हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स के संवाददाता हैं।)



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