स्थायी निवास प्रमाणपत्र की जांच स्वागतयोग्य — लेकिन क्या हर कर्मचारी-अधिकारी की जांच होगी?”

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उत्तराखंड में जाली दस्तावेज़ों के ज़रिए स्थायी निवास प्रमाणपत्र बनवाने के हालिया मामलों ने सरकार को आखिरकार झकझोर दिया। हल्द्वानी में फर्जी काग़ज़ों के सहारे यूपी निवासी को उत्तराखंड का स्थायी प्रमाणपत्र जारी होने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वह बड़ा आदेश लिया, जिसकी मांग वर्षों से की जा रही थी — पिछले तीन वर्षों में जारी सभी स्थानीय निवास प्रमाणपत्रों की जांच। वर्चुअल बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि राज्य को बाहरी लोगों के जमाव और घुसपैठ से बचाना ही मूल उद्देश्य है। यह निर्णय राज्य की पहचान, सुरक्षा और संसाधनों की रक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

मुख्यमंत्री का यह सख़्त रुख़ निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है।
लेकिन सवाल यहाँ खत्म नहीं होता — जो शुरुआत निवास प्रमाणपत्र से हुई है, क्या वह केवल यहीं तक सीमित रहेगी?

उत्तराखंड आंदोलन की आत्मा — “हमारा हक़, हमारी पहचान”उत्तराखंड राज्य इसी उद्देश्य के साथ लड़कर बना था कि पहाड़ के संसाधनों, नौकरियों, शिक्षा और विकास पर पहले वहाँ के मूल निवासी का अधिकार हो। लेकिन राज्य गठन के बाद दो दशक में जो हालात बने हैं, वे चौंकाने वाले हैं।
फर्जी प्रमाणपत्र, जाली शैक्षणिक योग्यता, संदिग्ध जाति प्रमाणपत्र, और बाहरी लोगों द्वारा अवसरों पर कब्ज़ा — यह सब अब किसी छुपे हुए सच की तरह नहीं, बल्कि खुले घाव की तरह सामने है।

धामी सरकार की यह कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्षों की उपेक्षा पर पहली बार चोट करती दिखती है।
लेकिन यह भी सच है कि फर्जी प्रमाणपत्रों के खिलाफ कार्रवाई तभी अर्थपूर्ण हो पाएगी जब यह राज्य के हर विभाग पर बिना अपवाद लागू हो।

और सबसे बड़ा प्रश्न— क्या हर कर्मचारी की जांच होगी?

यदि उत्तराखंड को वास्तव में फर्जी दस्तावेज़ों के कब्ज़े से मुक्त करना है तो जांच सिर्फ आम जनता तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि:

हर सरकारी कर्मचारी
हर अधिकारी
हर शिक्षक
हर डॉक्टर
और हर विश्वविद्यालय-महाविद्यालय के स्टाफ

के नियुक्ति के समय प्रस्तुत दस्तावेज़ों, शैक्षणिक प्रमाणपत्रों, जाति प्रमाणपत्रों और स्थायी निवास प्रमाणपत्रों की जांच भी अनिवार्य होनी चाहिए।

क्योंकि राज्य में सबसे बड़ा भ्रष्टाचार वही है जहाँ फर्जी प्रमाणपत्रों के सहारे नौकरी मिली, प्रमोशन मिला और वरिष्ठता हासिल की। और यही भ्रष्ट लोग आगे भ्रष्टाचार की जड़ बन जाते हैं।


पहली पंक्ति— पंतनगर विश्वविद्यालय

उत्तराखंड के इतिहास में शैक्षिक संस्थानों में फर्जी योग्यता और प्रमोशन के सबसे ज़्यादा आरोप जिस संस्थान पर लगे हैं, वह पंतनगर विश्वविद्यालय है।
प्रमोशन के मानक यदि शैक्षणिक योग्यता पर आधारित हैं और वह योग्यता—

नौकरी के बाद हासिल की गई हो,
संदिग्ध शिक्षण संस्थानों से ली गई हो,
डीम्ड या “वन-डे विश्वविद्यालयों” से प्राप्त की गई हो,
या फर्जी तरीके से सत्यापित करवाई गई हो,

तो उसकी समान रूप से जांच आवश्यक है। अगर फर्जी स्टेट-सब्जेक्ट राज्य के लिए खतरा है, तो फर्जी डिग्री फर्जी प्रशासन, फर्जी शासन और फर्जी निर्णयों का आधार बन जाती है। इसलिए दोनों का पैमाना एक होना चाहिए।

कुमाऊँ कमिश्नर दीपक रावत — पारदर्शिता की उम्मीद।कुमाऊँ कमिश्नर दीपक रावत ने अपने प्रशासनिक कार्यकाल में एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है—
भ्रष्टाचार से समझौता नहीं।
उनकी सक्रियता और तत्परता ने जनता में विश्वास जगाया है कि उत्तराखंड में अभी भी ऐसे अधिकारी हैं जो सिस्टम को साफ देखना चाहते हैं।

यह अवसर है कि:

कमिश्नर दीपक रावत के नेतृत्व में
➡ निवास प्रमाणपत्रों की जांच के साथ
➡ शैक्षणिक योग्यताओं और नियुक्तियों की जांच भी समान कठोरता से हो।

एक चेतावनी भी — “अभियान दिखावे में न बदल जाए”उत्तराखंड के लोग यह भय भी रखते हैं कि यह अभियान केवल कुछ छोटे कर्मचारियों और कमजोर वर्ग के नामों तक सीमित न रह जाए, जबकि असली लाभार्थी और फर्जी दस्तावेज़ों पर साम्राज्य खड़े करने वाले उच्च पदस्थ लोग बच निकलें।

सच्ची कार्रवाई तभी कहलाएगी जब —
भ्रष्ट क्लर्क ही नहीं, भ्रष्ट डीन भी जांच में आए
फर्जी प्रमाणपत्र वालों के साथ, उन्हें नियुक्त करने और प्रमोट करने वाले भी आरोपी हों
निवास प्रमाणपत्र ही नहीं,शिक्षा-नियुक्ति-प्रमोशन — सबकी जांच हो
मुख्यमंत्री धामी का निर्णय ऐतिहासिक है —
लेकिन इतिहास तब बनेगा जब यह निर्णय **आधा नहीं


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