

जब सरकार के वकील ही बिल्डर की ढाल बन जाएँ — तब न्याय की चौखट पर उम्मीद कितने दिन टिक पाएगी?

उत्तराखंड में भ्रष्टाचार अब कोई ख़बर नहीं, बल्कि व्यवस्था का चरित्र बन चुका है। सरकार, नौकरशाह और भूमाफिया के गठजोड़ की कहानियाँ लोगों ने वर्षों तक सुनी थीं, लेकिन रुद्रपुर के तालाब घोटाले ने यह सिद्ध कर दिया कि इस गठजोड़ में एक और शक्तिशाली कड़ी जुड़ चुकी है — सरकारी वकील, जिनकी भूमिका जनता की रक्षा के बजाय बिल्डर बचाओ अभियान में बदल चुकी है।RTI कार्यकर्ता रामबाबू की हालिया प्रेस वार्ता ने इस खेल को पूरी तरह उजागर कर दिया। हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि तालाब घोषित भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण, खरीद–फरोख्त, कब्जा या प्लानिंग प्रतिबंधित है। इसके बावजूद वहां करोड़ों के प्रोजेक्ट धड़ल्ले से चल रहे हैं। यह प्रश्न अब किसी एक तालाब या किसी स्थानीय विवाद का नहीं रह गया — यह न्याय व्यवस्था की बुनियाद को चुनौती देने वाला मामला बन गया है।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
रामबाबू ने न केवल दस्तावेज़ और आदेश दिखाए, बल्कि वह फोटो भी सामने रखी जिसमें कथित साजिशकर्ता स्पष्ट दिखाई देते हैं। फोटो का वायरल होना भले ही सोशल मीडिया के लिए सनसनी हो, लेकिन इसके असली मायने कहीं गहरे हैं —
चेहरे सामने हैं, आदेश सामने है, भ्रष्टाचार सामने है, पर कार्रवाई शून्य।
असली झटका यहीं से शुरू होता है?जब हाईकोर्ट में सुनवाई हुई, उम्मीद थी कि सरकार के वकील जनता और राज्य के हितों की रक्षा करेंगे। लेकिन जो हुआ, वह उत्तराखंड के लोगों के लिए सबसे बड़े धोखे जैसा था। सरकारी वकील ने वह पक्ष नहीं रखा जिसकी अपेक्षा जनता और कानून दोनों करते थे —
उन्होंने बिल्डर की पैरवी की।यानी सरकार के वकील ही सरकार के खिलाफ खड़े हो गए। और वह सरकार, जिसके प्रति उनका संवैधानिक दायित्व था — उसे न्याय दिलाने के बजाय, उन्हें निजी बिल्डर के लिए ढाल की तरह खड़ा देखा गया। इससे साफ है कि:
सरकारी वकीलों को उत्तराखंड के जन–हित से कोई मतलब नहीं,
उन्हें ईमानदार याचिकाकर्ताओं या सार्वजनिक संपत्तियों की रक्षा से कोई सरोकार नहीं
सत्ता, पूंजी और अभिजात गठजोड़ का कानूनी सुरक्षा कवच बनना ही उनका प्राथमिक लक्ष्य रह गया है?रामबाबू ने बताया कि उन्होंने याचिका पर बहस के दौरान सरकारी वकील का नाम रिकॉर्ड में दर्ज कराया, क्योंकि न केवल गलत दलीलें दी गईं बल्कि पूरी कोशिश की गई कि बिल्डर को बचा लिया जाए। जब न्यायालय से अंतिम उम्मीद भी खेल का हिस्सा बनने लगे, तो आम नागरिकों के सामने बचता क्या है?
उत्तराखंड की संपत्ति पर बाहरी ताकतों का कब्ज़ा — सत्ता की छत्रछाया में,
तालाब घोटाला कोई एक मिसाल नहीं है। नदी, नाले, रिज़ॉर्ट, ज़मीन, नज़ूल भूमि —
उत्तराखंड का हर प्राकृतिक और सरकारी संसाधन बाहरी भूमाफियाओं के हवाले किया जा रहा है।
और जो यह कब्ज़े करा रहे हैं, वे कोई छिपे हुए चेहरे नहीं —
सत्ताधारी नेताओं के संरक्षित बिल्डर हैं।
सबसे दुखद यह है कि यह खेल केवल मैदानी जिलों तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड का अंतिम पर्वतीय गांव भी अब सुरक्षित नहीं है — चौकोड़ी, जागेश्वर, चोपता, भीमताल, रानीखेत, टिहरी, हर जगह एक ही पैटर्न है:
पहाड़ बिक रहे हैं!
जंगल बिक रहे हैं!
नाले और झरने रिज़ॉर्ट के स्विमिंग पूल में बदले जा रहे हैं
गाँव की ज़मीन विदेशी प्लेटों पर परोसी जा रही है
और सवाल यह नहीं कि भ्रष्टाचार क्यों हो रहा है !
सवाल यह है कि भ्रष्टाचार को बचाने का राज्य–स्तरीय सिस्टम किसने बना दिया?
लड़ाई अदालत तक पहुँचती है तो वहाँ भी धोखा?जब प्रशासन भ्रष्ट होता है, जब शासन समझौते पर उतर आता है, जब अधिकारी ऑक्शन में आत्मा बेच देते हैं — तब आम नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और RTI एक्टिविस्ट न्याय की आखिरी चौखट पर दस्तक देते हैं — हाईकोर्ट।
लेकिन अगर हाईकोर्ट में भी सरकारी वकील भूमाफिया के हितों की वकालत करें, तो क्या नैनीताल कोर्ट में जाने वालों का विश्वास बच पाएगा?यहीं से संघर्ष एक कानूनी लड़ाई नहीं, आत्मसम्मान की लड़ाई बन जाता है। इसी कारण रामबाबू को अंततः उत्तराखंड सरकार के वकीलों पर भरोसा छोड़कर दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट के वकील को हायर करना पड़ा।क्या यह न्याय है?
क्या यह व्यवस्था है?
क्या यही था उस राज्य का सपना जिसके लिए 42 लोगों ने शहादत दी?
सबसे बड़ा अपराध — जब अन्याय को शासन की नीति बना दिया जाए?तालाब घोटाले की कीमत 500 करोड़ आँकी जा रही है। लेकिन असली नुकसान रुपए का नहीं — भरोसे का है।
अगर सरकारी आदेश काग़ज़ भर रह जाएँ,
अगर सबूतों का कोई अर्थ न रह जाए,
अगर सत्ता के संरक्षण में ज़मीन चोरी को गवर्नेंस कहा जाने लगे —
तो न्याय और अन्याय के बीच की रेखा मिट जाती है।
इस लड़ाई का असल मुद्दा एक तालाब की जमीन नहीं —
यह सवाल है कि क्या उत्तराखंड में जनता न्याय की उम्मीद कर सकती है?
अगर सरकारी वकील भी बिल्डर के वकील बन जाएँ,
अगर शासन का तंत्र ही अपराध का ढाल बन जाए,
अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने पर ही अदालत बोझ समझने लगे —
तो फिर उत्तराखंड की लड़ाई अब जमीन बचाने की नहीं, अस्तित्व बचाने की लड़ाई बन जाती है।




