

जंगल में चारा लेने गई महिला का चेहरा भालू ने बुरी तरह से नोंच लिया। महिला किसी तरह बच निकली और गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद हिम्मत जुटाकर पूरी रात एक पेड़ के सहारे छिपकर बैठी रही। सुबह गांव के लोगों ने उसे खोजा। हालत गंभीर होने के कारण उसे हेलीकॉप्टर से एम्स ऋषिकेश भेजा गया है। इसी तरह एक और घटना में महिला पर भालू ने हमला तो किया लेकिन महिला ने भी दरांती से जवाबी हमला किया। कुछ देर बाद भालू भाग गया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
अगर पिछले 25 साल के आंकड़ों पर गौर करें तो पाते हैं कि इन हमलों में 2000 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। इनमें 71 लोगों ने अपनी जान गंवाई है। मवेशियों की भी मौत हुई है। यह भी देखने में आया है कि पिछले 5 साल में हमलों की तादाद बढ़ी है।
पिछले 25 वर्षों के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में भालू के 202081 हमलों में 2,009 लोग घायल हुए और 71 लोगों की मौत हुई है, जो कि एक गंभीर स्थिति है। वन विभाग के मुताबिक अकेले 2025 में अभी तक 71 हमले और 7 मौतें दर्ज की गई हैं। 2020 में 99 लोग घायल हुए, 2021 में 80, 2022 में 57, 2023 में 53, और 2024 में 65 लोग घायल हुए। भालुओं के हमले ज्यादातर उत्तरकाशी, पौड़ी, पिथौरागढ़, चमोली और रुद्रप्रयाग जैसे जिलों में केंद्रित हैं, जहां इनका अक्सर मानव बस्तियों से सामना होता है।
जिस समय देश भर में कोविड के कारण लॉकडाउन लग गया था उस समय देखा गया था कि उत्तराखंड के जंगलों से जंगली जानवर निकल कर इंसानी बस्ती तक बेखौफ घूमने लगे थे। इसी दौरान भालूओं के इंसानी बस्ती में आकर हमलों की घटनाएं भी बढ़ी हैं।
भालुओं के इंसानों पर हमलों की घटनाओं से स्थानीय लोगों में दहशत है। उनका जीवन जंगली चारे, लकड़ी और उत्पादों पर निर्भर है और वहां जंगली जानवरों के खतरे हैं। इसमें भी समस्या और बढ़ जाती है जब भालू इंसानी बस्ती में आकर हमले करने लगें। पिछले दिनों ऐसी ढेरों घटनाएं हुई हैं जब भालू ने रात में आकर गोशाला के दरवाजे या छतें उखाड़ दीं। अंदर से गाय या बैल को बाहर निकाला और उसे मारकर खा गए।
वन्य जीव विशेषज्ञों का कहना है कि इन हमलों की मुख्य वजहें प्राकृतिक परिस्थितियों में तेजी से हो रहे बदलाव हैं। सबसे महत्वपूर्ण कारणों में जंगलों में फल-फूल की कमी, जलवायु परिवर्तन, और भालुओं के प्राकृतिक आवास का वर्षा या मानवीय गतिविधियों के कारण नष्ट होना शामिल है। इस कारण से भालू भोजन की तलाश में गांवों और मानवीय बस्तियों की ओर आने लगे हैं। कई स्थानों पर फसलें और खेत फलदार पौधों में बदल गए हैं, जिससे भालुओं को इंसानी बस्तियों के पास आसानी से भोजन मिलने लगा है, वहीं कूड़ा-कचरा भी आकर्षण का कारण बनता है।
अधिकांश हमले मॉनसून के बाद वाले समय यानी सितंबर से नवंबर के महीनों में बढ़ते हैं, जब ग्रामीण महिलाएं जंगल में चारा, लकड़ी व अन्य संसाधन लेने जाती हैं। यात्रियों, तीर्थयात्रियों और बच्चों के स्कूल आने-जाने के दौरान भी हमले की घटनाएं सामने आई हैं। सड़कों का विस्तार, कचरा प्वाइंट का जंगल के पास होना व जंगलों में मानव गतिविधियों का विस्तार टकराव को और गहरा करता है।




