

रुद्रपुर आज उत्तराखंड की हवा में एक अलग सी खामोशी थी। रुद्रपुर गांधी पार्क में एकत्र हुए लोग केवल एक श्रद्धांजलि सभा का हिस्सा नहीं थे—वे एक इतिहास, एक आंदोलन, एक व्यक्तित्व और एक युग को स्मरण कर रहे थे। मंच पर पुष्प थे, पर शब्दों में आग भी थी; आंखों में नमी थी, पर मन में गर्व भी। कार्यक्रम का आयोजन उत्तराखंड क्रांति दल और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा किया गया, और हर वक्ता के स्वर में एक ही बात गूंज रही थी—“दिवाकर भट्ट सिर्फ एक नाम नहीं, उत्तराखंड की आत्मा थे।”

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
दिवाकर भट्ट जिनका परिचय किसी पदवी, पद या उपाधि से नहीं, बल्कि संघर्ष और जनसरोकारों से होता है। उन्हें याद करने का अर्थ है उस अटूट साहस को याद करना जो पहाड़ के गांवों से उठकर राज्य बनने तक की लड़ाई में लहू, पसीना, बलिदान और बेफिक्री की मिसाल बन गया। आज गांधी पार्क में जो आवाजें उठीं, वे पुरानी पीढ़ी के आंदोलनकारियों की स्मृतियों से टकराकर, नई पीढ़ी के दायित्वों को भी झकझोर रही थीं।
एक आंदोलनकारी की पहचान—पद नहीं, संघर्ष
संघर्षों का इतिहास अक्सर किताबों और भाषणों में सिमट जाता है, लेकिन दिवाकर भट्ट का इतिहास लोगों की स्मृतियों में जीवित है। वक्ताओं ने स्मरण कराया कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन कोई योजनाबद्ध राजनीतिक अभियान नहीं था, यह दर्द, आक्रोश और अस्तित्व की लड़ाई थी। उस लड़ाई की पहली कतार में कुछ ऐसे चेहरे थे जिन्हें नाम और कुर्सियों की परवाह नहीं थी—उनमें सबसे प्रखर चेहरा था दिवाकर भट्ट का।
उनकी आवाज में जो विद्रोह था वह किसी व्यक्ति या शासन के खिलाफ नहीं था—वह पहाड़ की अवमानना के खिलाफ था। वह आवाज कहती थी कि “पहाड़ के लोगों के भविष्य का निर्णय मैदानों में नहीं लिखा जाएगा।” इसी स्वर ने हजारों युवाओं, महिलाओं, छात्रों और मजदूरों के दिलों में आग जलाई, और यही ऊर्जा अंततः उत्तराखंड राज्य के निर्माण में परिणत हुई।
सत्ता में पहुंचने के बाद भी आंदोलनकारी बने रहे
दिवाकर भट्ट विधायक बने, फिर राजस्व एवं शहरी विकास मंत्री—लेकिन यहां भी उन्होंने कुर्सी को लक्ष्य नहीं, साधन माना। सत्ता का स्वाद अधिकांश लोगों को संघर्षों से दूर कर देता है, पर दिवाकर भट्ट के लिए आंदोलन कुर्सी का रास्ता नहीं, बल्कि कुर्सी आंदोलन को मजबूत करने का एक साधन बनी।
लोकतंत्र में मंत्री बनकर भी उन्होंने जनता के मसलों को उठाने का जो साहस दिखाया, वह उनके चरित्र की सबसे बड़ी पहचान है। उन्होंने प्रदेश की संरचना, प्लानिंग और संसाधन वितरण के मुद्दों पर फैसले लेने के लिए सरकार और सत्ता में बैठे बड़े चेहरों से भी टकराव मोल लिया। यह टकराव निजी महत्वाकांक्षा का नहीं था—यह जनता के विश्वास की रक्षा का था।
जब आंदोलनकारियों की आवाज कमजोर होने लगी
श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने एक कटु सत्य भी याद दिलाया—राज्य बनने के बाद धीरे-धीरे आंदोलन की आत्मा कमजोर पड़ने लगी। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं, गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय असमंजस के बीच वह ऊर्जावान आंदोलन धीमी पड़ता गया। ऐसे समय में भी दिवाकर भट्ट ‘हमारी आवाज बिकाऊ नहीं है’ के साथ अडिग खड़े रहे।
यह अलग बात है कि सच बोलने वाले और जन संघर्ष को प्राथमिकता देने वाले नेता आज की राजनीतिक फसल में दुर्लभ होते चले गए। शायद इसलिए दिवाकर भट्ट को याद करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, एक दर्पण भी है—क्योंकि वह दिखाता है कि जनता के लिए राजनीति कैसी होनी चाहिए।
गांधी पार्क की श्रद्धांजलि — इतिहास की पुकार
गांधी पार्क में फूल अर्पित किए गए, भाषण दिए गए, और मौन धारण किया गया। परंतु इस श्रद्धांजलि की आत्मा फूलों में नहीं, उन वाक्यों में थी जिनमें कहा गया:आदर्श राजनेता का जो रूप होना चाहिए, वही दिवाकर भट्ट थे।”
आदर्श राजनेता का जो रूप होना चाहिए, वही दिवाकर भट्ट थे।”
आंदोलन की लौ बुझी नहीं है, वह हमारे बीच जिम्मेदारी के रूप में मौजूद है।”
यदि पहाड़ आज राज्य है, तो उसमें दिवाकर भट्ट का पसीना, आवाज और त्याग शामिल है।”
इन वाक्यों में न स्मरण की औपचारिकता थी, न राजनीति का दिखावा — बल्कि कृतज्ञता का सत्य था।
श्रद्धांजलि सभा में मुख्य रूप से वरिष्ठ नेता आंदोलनकारी आनंद सिंह एसगोला, कांति भागुनी, जिला अध्यक्ष जीवन सिंह नेगी ,राजेंद्र प्रसाद जोशी, त्रिभुन करकी , भानु प्रताप मेहरा ,ठाकुर बिष्ट, मुकुल सिंह रावत, एडवोकेट राहुल कांडपाल, सुरेंद्र सिंह चीलवाल, इंदु बोरा, क्या बताया अपना नाम सुरेंद्र सिंह रावत अनिल कुमार, आदि लोग उपस्थित थे
फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट के निधन पर उत्तराखंड की आत्मा शोक में डूबी — उक्रांद नेताओं ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट के निधन ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन की विरासत को गहरा आघात पहुँचाया है। उत्तराखंड क्रांति दल के वरिष्ठ नेता आनंद सिंह असगोला ने कहा कि दिवाकर भट्ट ने राज्य के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया, उनका जाना एक युग के अंत जैसा है। मोहन चंद्र पांडे ने कहा कि दिवाकर भट्ट ने संघर्ष की लौ हमेशा जलाए रखी, वे पहाड़ की आवाज थे। कांति भागुनी और जानकी जोशी ने संयुक्त रूप से कहा कि राज्य आंदोलन में महिलाओं को संघर्ष की पहली पंक्ति में लाने का श्रेय दिवाकर भट्ट को जाता है। पुष्पा जोशी ने कहा कि उनका नेतृत्व भावनाओं से नहीं, संकल्प से भरा था। भानु मेहरा और इंदु बोरा ने कहा कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा रहेंगे। बबीता बोरा और तारा देवी ने कहा कि दिवाकर भट्ट का संघर्ष हर पहाड़ी के दिल में हमेशा जीवित रहेगा।
आज के परिप्रेक्ष्य में दिवाकर भट्ट की प्रासंगिकता
आज राज्य है—लेकिन किसके लिए?
यह प्रश्न आज भी उत्तर मांगता है।
गांव खाली हो रहे हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है, पलायन आज भी पहाड़ की नियति बना हुआ है। चाहे शिक्षा हो या स्वास्थ्य, खेती हो या युवाओं का भविष्य — चुनौतियां अब भी वहीं हैं, शायद पहले से अधिक जटिल।
श्रद्धांजलि सभा में मुख्य रूप से कांति भागुनी,
दिवाकर भट्ट की प्रासंगिकता आज इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि वह राज्य बनने पर ठहर नहीं गए — वे कहते थे:
राज्य मिल गया, अब राज्य को सही दिशा देना असली आंदोलन है।”
यह वाक्य आज पहाड़ की हर पंचायत, हर शहर और हर युवा के लिए चेतावनी




