

हल्द्वानी। वनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे भूमि पर अतिक्रमण से जुड़े मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तावित है। सुनवाई से पहले क्षेत्र के सैकड़ों लोग खुद को वर्षों से यहां का निवासी साबित करने के लिए पुराने दस्तावेज जुटाने में लगे हैं। हालात यह हैं कि 75 से 85 वर्ष तक के बुजुर्ग भी अपने बचपन के प्रमाण तलाशने के लिए राजकीय प्राथमिक विद्यालय वनभूलपुरा के चक्कर काट रहे हैं।

अतिक्रमण मुक्त उत्तराखंड की ओर निर्णायक कदम।उत्तराखंड की मूल अवधारणा केवल एक नया राज्य बनाने की नहीं थी, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करने की थी जो भ्रष्टाचार, अवैध कब्जों और अपराध से मुक्त हो। दुर्भाग्य से राज्य बनने के बाद सरकारी, नजूल और सीलिंग भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हुआ। आज जब हल्द्वानी से लेकर रुद्रपुर, देहरादून और हरिद्वार तक अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई की बात हो रही है, तो यह राज्य के लिए एक निर्णायक मोड़ माना जा सकता है।
सरकार द्वारा बुलडोजर कार्रवाई को केवल दमनात्मक कदम नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जाना चाहिए। अवैध कब्जे केवल जमीन हड़पने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि नशा, अपराध और काले धन के अड्डे भी बन जाते हैं। ऐसे में इनका हटना समाज के लिए जरूरी है।
हालांकि कार्रवाई के साथ मानवीय दृष्टिकोण भी उतना ही आवश्यक है। जो गरीब परिवार वर्षों से मजबूरी में बसे हैं, उनके लिए पुनर्वास की ठोस नीति बननी चाहिए। साथ ही उन अधिकारियों, नेताओं और माफियाओं पर भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, जिन्होंने इन अतिक्रमणों को संरक्षण दिया।
यदि सरकार निष्पक्ष और दृढ़ता के साथ यह अभियान आगे बढ़ाती है, तो अतिक्रमण मुक्त, भ्रष्टाचार मुक्त और सुरक्षित उत्तराखंड का सपना साकार हो सकता है—जो राज्य आंदोलन की असली आत्मा थी।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
लोग वर्ष 1954-55 में पढ़ी गई पाँचवीं कक्षा के प्रमाण पत्र और स्थानांतरण प्रमाण पत्र (टीसी) लेने स्कूल पहुंच रहे हैं, ताकि यह साबित किया जा सके कि वे दशकों से यहां रह रहे हैं। स्कूल की प्रधानाध्यापिका कविता पंत के अनुसार नवंबर माह में अब तक 38 लोगों को टीसी जारी की जा चुकी है, जबकि गुरुवार तक 300 से अधिक आवेदन प्रमाण पत्र के लिए प्राप्त हो चुके हैं। दस्तावेज स्कूल अभिलेखों से नाम, जन्मतिथि और पिता के नाम की पुष्टि के बाद ही जारी किए जा रहे हैं।
टीसी लेने वालों में अधिकांश लोग 55 से 85 वर्ष की आयु के हैं। लाइन नंबर 17 निवासी 8 सितंबर 1945 को जन्मे मोहम्मद हनीफ बताते हैं कि उनके पूर्वज भी हल्द्वानी में रहते थे और आज उनका पूरा परिवार यहीं बसा है। वर्ष 1955 में उन्होंने इसी स्कूल में पढ़ाई की थी, जिसका प्रमाण लेने वे स्कूल पहुंचे हैं। वहीं लाइन नंबर 18 के निवासी 71 वर्षीय मोहम्मद अयूब भी वर्षों बाद पहली बार विद्यालय पहुंचे, ताकि पढ़ाई छोड़ने का प्रमाण प्राप्त कर सकें।
हालांकि इस प्रक्रिया में कई तकनीकी दिक्कतें भी सामने आ रही हैं। कई लोगों के आधार कार्ड और स्कूल अभिलेखों में नाम व जन्मतिथि में अंतर पाया जा रहा है। कुछ लोग अपने परिवार के 8 से 10 सदस्यों के दस्तावेज एक साथ बनवाने स्कूल पहुंच रहे हैं।
लगातार बढ़ रही भीड़ का असर अब बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ने लगा है। विद्यालय में कक्षा एक से पांच तक 268 छात्र अध्ययनरत हैं और प्रधानाध्यापिका समेत 9 शिक्षक तैनात हैं। बीते एक माह से प्रमाण पत्र लेने वालों की भारी भीड़ के कारण शिक्षण व्यवस्था प्रभावित हो रही है और शिक्षक भी परेशान हैं।
इस पूरे मामले पर जिला शिक्षाधिकारी प्रारंभिक नैनीताल एच.बी. चंद का कहना है कि इतने पुराने दस्तावेजों की मांग के कारणों को स्पष्ट करने के लिए अब लोगों से शपथ पत्र लिया जाएगा, जिसमें उन्हें यह बताना होगा कि प्रमाण पत्र किस उद्देश्य से चाहिए। वहीं हल्द्वानी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कमल किशोर पंत ने कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए अभी किसी भी निर्णय पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी। यदि भविष्य में पुनर्वास की स्थिति बनती है, तो ये दस्तावेज अहम भूमिका निभा सकते हैं।
वनभूलपुरा में आज हालात ऐसे हैं कि वर्षों से बसे लोग अपने ही अस्तित्व को कागजों में साबित करने की जद्दोजहद में जुट गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पहले यह कानूनी और मानवीय संघर्ष और तेज होता दिखाई दे रहा है।




