

रूद्रपुर समेत पूरे जिले में एक बार फिर आम आदमी को सरकारी लाइन में खड़ा होने का फरमान सुना दिया गया है। जिला पूर्ति अधिकारी विनोद चन्द तिवारी की चेतावनी है कि 15 दिसम्बर 2025 तक राशन कार्ड के सभी सदस्यों की ई-केवाईसी नहीं हुई तो राशन कार्ड निष्क्रिय हो सकता है। दूसरी ओर मंत्री रेखा आर्य का बयान है कि राशन मिलता रहेगा, राशन कार्ड निरस्त नहीं होगा। इस विरोधाभास ने जनता के मन में असमंजस और भय दोनों पैदा कर दिया है। सवाल सीधा है—जब मंत्री और विभाग के बयान अलग-अलग हों, तो भरोसा किस पर किया जाए?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
यह कोई पहली बार नहीं है जब जनता को “तकनीकी सुधार” के नाम पर फिर से कतारों में झोंक दिया गया हो। आधार कार्ड, पैन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, मृत्यु प्रमाण पत्र, स्थायी निवास प्रमाण पत्र—एक आम नागरिक का पूरा जीवन इन्हीं लाइनों में गुजर जाता है। अब राशन कार्ड के नाम पर फिर वही कहानी दोहराई जा रही है। सरकार डिजिटल इंडिया का ढोल पीटती है, लेकिन हकीकत यह है कि डिजिटल सुविधाएं जनता के लिए राहत कम और बोझ ज्यादा बनती जा रही हैं।
ई-केवाईसी की आवश्यकता से कोई इनकार नहीं करता। पारदर्शिता जरूरी है, फर्जीवाड़ा रोकना जरूरी है। लेकिन सवाल तरीके का है। इतने कम समय में लाखों लोगों की बायोमैट्रिक केवाईसी कराना क्या व्यवहारिक है? सस्ता गल्ला दुकानों पर पहले से भीड़ रहती है, मशीनें अक्सर खराब रहती हैं, और नेटवर्क की समस्या आम है। ऐसे में गरीब, बुजुर्ग, दिव्यांग और मजदूर वर्ग फिर सबसे ज्यादा परेशान होगा।
यह भी सोचने की बात है कि जब सोशल मीडिया पर पूर्व और वर्तमान जनप्रतिनिधि आश्वासन दे रहे हैं कि राशन कार्ड निरस्त नहीं होंगे, तो जिला पूर्ति अधिकारी की सख्त चेतावनी क्यों? यह प्रशासनिक मजबूरी है या राजनीतिक दवाब? या फिर यह वही पुराना “जनता को व्यस्त रखो” वाला सरकारी फार्मूला है, जिसमें आदमी रोजी-रोटी छोड़कर कागजों और अंगूठों के बीच उलझा रहे?
भारतीय जनता पार्टी की सरकार बार-बार “गुड गवर्नेंस” और “ईज ऑफ लिविंग” की बात करती है। पर हकीकत में जनता के लिए जीवन आसान नहीं, बल्कि और जटिल होता जा रहा है। अगर सरकार सच में जनहित चाहती है तो उसे डर और भ्रम की बजाय स्पष्ट, एकरूपी और विश्वसनीय नीति अपनानी होगी। नहीं तो जनता के मन में यही धारणा बनेगी कि यह सब व्यवस्था सुधार नहीं, बल्कि लोगों को लगातार लाइन में खड़ा रखकर “बिजी” बनाए रखने का ही विजन है।
सरकार को अब यह डर नहीं रहता कि जनता खाली बैठ गई तो सवाल पूछने लगेगी। इसलिए समय-समय पर कोई न कोई “केवाईसी महायज्ञ” शुरू करा दिया जाता है। कभी आधार अपडेट, कभी पैन लिंक, कभी बैंक केवाईसी और अब राशन कार्ड के नाम पर फिर वही लंबी कतारें। जनता को लगता है कि वह किसी जॉब इंटरव्यू में खड़ी है, जबकि असल में वह अपने ही हक के लिए बार-बार पहचान साबित कर रही है। मजेदार बात यह है कि जो सिस्टम पहले सत्यापन कर चुका होता है, वही सिस्टम दोबारा शक करता है।
डिजिटल इंडिया का नारा उस दिन खोखला लगने लगता है, जिस दिन बूढ़े, मजदूर और महिलाएं घंटों धूप में खड़े होकर अंगूठा लगाते हैं। जनता को यह एहसास धीरे-धीरे हो रहा है कि सरकार उसे सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि “कतार बैंक” भी मानने लगी है। सवाल यह नहीं कि केवाईसी जरूरी है या नहीं, सवाल यह है कि क्या जनता को हमेशा यूं ही व्यस्त बनाए रखना ही शासन का असली विजन है?
- जनता किन-किन कागजातों के लिए कहां-कहां लाइन में खड़ी होती है –
आज का आम नागरिक जन्म से लेकर मृत्यु तक लाइनों में ही खड़ा रहता है। बच्चे का जन्म होता है तो जन्म प्रमाण पत्र के लिए नगर निगम की लाइन। पढ़ाई के लिए जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र और निवास प्रमाण पत्र के लिए तहसील की लाइन। नौकरी के लिए पैन कार्ड, पुलिस सत्यापन और मेडिकल जांच के लिए नई लाइन। बैंक खाता खुलवाने के लिए केवाईसी, फिर हर कुछ साल में केवाईसी अपडेट के लिए बैंक की लाइन। मोबाइल सिम के लिए आधार, गैस कनेक्शन के लिए आधार, बिजली कनेक्शन के लिए आधार।
वोट देने के लिए मतदाता पहचान पत्र की लाइन, जमीन खरीदने-बेचने के लिए रजिस्ट्री कार्यालय की लाइन, वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन, दिव्यांग पेंशन—हर योजना के साथ एक नई कतार। कोरोना काल में वैक्सीनेशन की लाइन, अब ई-केवाईसी की लाइन।
आदमी की पूरी जिंदगी कागजों के सहारे चलती है और हर कागज के लिए उसे किसी न किसी सरकारी दफ्तर में खड़ा होना ही पड़ता है। हैरानी यह है कि हर प्रक्रिया “अंतिम सत्यापन” कहलाती है, लेकिन यह अंतिम कभी होती नहीं। एक प्रमाण पत्र से दूसरे तक, एक लाइन से दूसरी लाइन तक—आम आदमी की जिंदगी प्रशासनिक कतारों के बीच पिसती चली जा रही है।
लाइन में खड़ी जनता और सरकार का बिजी रखने का फार्मूला”
इन दिनों राशन कार्ड की ई-केवाईसी के नाम पर एक बार फिर सस्ता गल्ला दुकानों पर जनता की लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं। गरीब, बुजुर्ग, महिलाएं, मजदूर—सब अपने काम-धंधे छोड़कर सुबह से शाम तक अंगूठा लगाने के इंतजार में खड़े हैं। सरकार कहती है कि इससे व्यवस्था सुधरेगी, फर्जीवाड़ा रुकेगा। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि अव्यवस्था ही व्यवस्था बनती जा रही है।
एक ओर मंत्री कह रहे हैं कि राशन बंद नहीं होगा, दूसरी ओर जिला पूर्ति अधिकारी कार्ड निष्क्रिय होने की चेतावनी दे रहे हैं। इस विरोधाभास का सीधा असर जनता की मानसिकता पर पड़ रहा है—डर भी है और मजबूरी भी। लाइन में खड़ा होकर अंगूठा लगाना अब राशन से ज्यादा जरूरी बना दिया गया है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार के पास जनता को राहत देने का कोई नया तरीका नहीं है? क्या हर समस्या का समाधान सिर्फ “नई केवाईसी” है? लगता है सरकार का एक ही फार्मूला काम कर रहा है—जनता को लाइन में इतना व्यस्त रखो कि वह सवाल पूछने का समय ही न पाए। यही आज के शासन की सबसे बड़ी विडंबना है।




