

उत्तराखंड की सरकार भले ही कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर उपलब्धियों के दावे कर रही हो, लेकिन ऊधमसिंह नगर जिले के ताजा आंकड़े इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी हैं। एक साल में 37 हत्याएं और 258 सड़क हादसों में मौत—साफ है कि अपराध का सबसे बड़ा हथियार अब पिस्तौल या चाकू नहीं, बल्कि बेकाबू रफ्तार और बदहाल ट्रैफिक व्यवस्था बन चुकी है। यह आंकड़ा सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि सरकार के लिए गंभीर आरोपपत्र है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
पुलिस जिस सख्ती का ढिंढोरा पीट रही है, वह या तो कागजों में सिमट गई है या चौराहों तक सीमित रह गई है। शहरों के भीतर तेज रफ्तार डंपर, ओवरलोड ट्रक, बिना नंबर प्लेट फर्राटा भरती बाइकों और नाबालिग चालकों पर सरकार का कोई बस नहीं चलता। नो-एंट्री, चेकिंग और फॉग लाइट की अपील—ये सब दुर्घटनाओं के बाद का सरकारी अफसोस हैं, पूर्व-नियोजन नहीं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब हत्या जैसे संगीन अपराधों में कमी लाई जा सकती है, तो सड़क पर मौत के खुले खेल पर लगाम क्यों नहीं? क्या इसलिए कि ट्रैफिक सुधार से फोटो सेशन नहीं होता? क्या भारी वाहन माफिया, ट्रांसपोर्ट लॉबी और अवैध पार्किंग के ठेकेदार सरकार की पहुंच से बाहर हैं?
258 मौतें सिर्फ आंकड़े नहीं हैं—ये 258 उजड़े घर हैं, 258 बुझते चूल्हे हैं और 258 सरकारी असफलताओं की गवाही हैं। सरकार अगर सच में संवेदनशील है, तो उसे दिखावटी चेकिंग छोड़कर स्थायी समाधान लाने होंगे—हाईवे और शहरी सड़कों का वैज्ञानिक पुनर्गठन, स्पीड कैमरे, ड्राइविंग लाइसेंस की सख्त जांच, नशे में ड्राइविंग पर ज़ीरो टॉलरेंस और ट्रैफिक पुलिस की जवाबदेही तय करना अनिवार्य होगा।
ऊधमसिंह नगर की सड़कों पर मौत सबसे अधिक ओवरलोड खनन डंपरों से दौड़ रही है। बालू-बजरी से लदे ये भारी वाहन दिन-रात रिहायशी इलाकों से गुजरते हैं और प्रशासन मूकदर्शक बना रहता है। आम वाहन चालकों का चालान तुरंत कटता है, लेकिन खनन माफिया के डंपर सरकार की आंखों के सामने कानून रौंदते हैं। यही लापरवाही हादसों को जन्म दे रही है और परिवार उजड़ रहे हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार के लिए राजस्व ज्यादा जरूरी है या नागरिकों की जान? जब तक ओवरलोड डंपरों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, सड़कें सुरक्षित नहीं होंगी।
आज ऊधमसिंह नगर में सबसे बड़ा ‘हत्यारा’ कोई अपराधी नहीं, बल्कि सरकारी लापरवाही से दौड़ती सड़कें हैं। अगर अब भी सरकार नहीं जागी, तो आने वाले वर्षों में हत्याओं से ज्यादा मौतें “दुर्घटना” लिखकर फाइलों में दफन होती रहेंगी—और जिम्मेदार हमेशा की तरह “जांच के आदेश” तक सीमित रहेंगे।




