

संसद के शीतकालीन सत्र में भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी VBG राम-जी बिल का पारित होना केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मौजूदा संसदीय संस्कृति का आईना भी है। जिस तरह विपक्ष के तीखे विरोध, नारेबाजी और बिल की प्रतियां फाड़े जाने के बीच यह विधेयक ध्वनि मत से पारित हुआ, उसने लोकतांत्रिक संवाद की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने जवाब में कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए मनरेगा में भ्रष्टाचार, फंड के दुरुपयोग और “नामकरण की राजनीति” के आरोप लगाए। गांधी, संविधान और कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों को बहस के केंद्र में लाकर सरकार ने अपने वैचारिक रुख को मजबूती से रखा, लेकिन सवाल यह है कि क्या रोजगार और आजीविका जैसे जमीनी विषय पर पर्याप्त तथ्यात्मक और नीति-आधारित चर्चा हो सकी?
विपक्ष का हंगामा और वेल में उतरना जहां उसकी रणनीतिक हताशा को दर्शाता है, वहीं सरकार का बहुमत के बल पर विधेयक पारित करना यह संकेत देता है कि संसद अब बहस से अधिक संख्याबल का मंच बनती जा रही है। रोजगार गारंटी जैसे अहम विषय पर विपक्ष की आशंकाओं—फंडिंग, क्रियान्वयन, राज्यों की भूमिका और पारदर्शिता—का ठोस जवाब यदि संवाद के जरिए दिया जाता, तो लोकतंत्र और मजबूत होता।
सरकार का दावा है कि यह बिल किसानों और गरीबों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा और मनरेगा की कमियों को दूर करेगा। यदि ऐसा है, तो आने वाला समय इसकी वास्तविक परीक्षा होगा। वहीं विपक्ष को भी यह आत्ममंथन करना होगा कि संसद के भीतर शोर से ज्यादा असरदार है ठोस तर्क और वैकल्पिक नीति प्रस्ताव।
अंततः, लोकतंत्र केवल बिल पास करने से नहीं, बल्कि सहमति-असहमति के बीच सार्थक संवाद से मजबूत होता है। VBG राम-जी बिल का पारित होना सरकार की जीत हो सकती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह संसदीय गरिमा और लोकतांत्रिक विमर्श की भी जीत है?




