

लोकगीतों की कक्षा में भविष्य की चेतना
उत्तराखंड की पहचान केवल उसके पहाड़ों, नदियों और देवस्थानों से नहीं, बल्कि उसकी लोकविरासत से भी बनती है। दुर्भाग्य यह है कि जिस लोकसंस्कृति ने पीढ़ियों तक समाज को जोड़े रखा, वही आज आधुनिकता और बाज़ारवाद की दौड़ में हाशिये पर धकेली जा रही है। ऐसे समय में पिथौरागढ़ के गंगोत्री गर्बीयाल राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में आयोजित एक दिवसीय पारंपरिक लोकगीत कार्यशाला केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संस्कृति-संरक्षण का जीवंत प्रयास है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
पीयूष धामी द्वारा छात्र-छात्राओं को बाजूबंद, झुमैलो जैसी विलुप्तप्राय लोकगायन शैलियों का प्रशिक्षण देना यह दर्शाता है कि लोकसंस्कृति को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकारी विभागों या मंचीय आयोजनों की नहीं, बल्कि समर्पित युवाओं और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की भी है। लोक विरासत जनजाति एवं लोक कला समिति का यह प्रयास इस बात का प्रमाण है कि यदि सही दिशा और संकल्प हो, तो विद्यालय भी सांस्कृतिक पुनर्जागरण के केंद्र बन सकते हैं।
आज का यथार्थ यह है कि उत्तराखंड का युवा मोबाइल रील्स और बाहरी संगीत की चकाचौंध में अपनी जड़ों से कटता जा रहा है। ऐसे में विद्यालय स्तर पर लोकगीतों का प्रशिक्षण देना न केवल कला सिखाना है, बल्कि पहचान और आत्मबोध का संस्कार देना है। बाजूबंद और झुमैलो जैसी विधाएँ केवल गीत नहीं, बल्कि उस समाज की सामूहिक स्मृति हैं, जिसमें श्रम, उत्सव, प्रकृति और जीवन का दर्शन समाया हुआ है।
इस कार्यशाला में समिति की कोषाध्यक्ष स्मृति भट्ट, कविता पंत, लक्ष्मी तिवारी, आयुष कलकुडिया जैसे साथियों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि यह प्रयास व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक सांस्कृतिक जिम्मेदारी का परिणाम है। नि:शुल्क प्रशिक्षण यह संदेश भी देता है कि संस्कृति को बाज़ार की वस्तु नहीं, बल्कि साझा धरोहर समझा जाना चाहिए।
आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे प्रयास केवल एक दिवसीय आयोजन बनकर न रह जाएं। राज्य सरकार, शिक्षा विभाग और सांस्कृतिक संस्थानों को चाहिए कि वे विद्यालयों में लोककला और लोकगीतों को नियमित पाठ्य और गतिविधि का हिस्सा बनाएं। तभी उत्तराखंड की लोकविरासत जीवित रहेगी, वरना वह केवल शोधपत्रों और संग्रहालयों की शोभा बनकर रह जाएगी।
पीयूष धामी जैसे युवाओं के प्रयास यह उम्मीद जगाते हैं कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति अभी पूरी तरह मौन नहीं हुई है। जरूरत है इस स्वर को और बुलंद करने की—ताकि पहाड़ों की आत्मा आने वाली पीढ़ियों तक गूंजती रहे।




