

चमोली जिले के पोखरी क्षेत्र में जूनियर हाईस्कूल हरिशंकर में घटित घटना केवल एक छात्र पर भालू के हमले की खबर नहीं है, बल्कि यह राज्य की वन्य-मानव सह-अस्तित्व नीति पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। कक्षा छह के छात्र आरव को स्कूल परिसर से भालू द्वारा उठा लिया जाना और शिक्षकों व बच्चों की सूझबूझ से उसकी जान बच पाना राहत की बात जरूर है, लेकिन इससे यह सच्चाई नहीं बदलती कि अब हमारे विद्यालय भी सुरक्षित नहीं रहे।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
यह घटना बताती है कि जंगल और बस्ती की सीमाएं तेजी से धुंधली हो रही हैं। दो दिन पहले इसी स्कूल के एक अन्य छात्र पर रास्ते में हमला होना और अब स्कूल के भीतर भालू का घुस आना, यह दर्शाता है कि समस्या आकस्मिक नहीं बल्कि लगातार और बढ़ती हुई है। स्कूल में बच्चों का रोना, भय और अफरातफरी—ये दृश्य उस मानसिक आघात की ओर संकेत करते हैं जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जौलीग्रांट के थानो वन रेंज में वन प्रहरियों द्वारा बच्चों को स्कूल पहुंचाने की व्यवस्था, महिला सुरक्षा के लिए टीमों का गठन, सोलर लाइट और पिंजरों की स्थापना—ये सभी कदम सराहनीय हैं। परंतु सवाल यह है कि क्या ऐसे इंतजाम पूरे राज्य के संवेदनशील क्षेत्रों में समय रहते लागू किए गए? या हर बार किसी हादसे के बाद ही प्रशासन जागता है?
वन्यजीव संरक्षण आवश्यक है, लेकिन मानव जीवन की सुरक्षा उससे भी अधिक अनिवार्य है। पहाड़ों में महिलाओं का घास-लकड़ी के लिए जंगल जाना आजीविका की मजबूरी है, कोई शौक नहीं। बच्चों का स्कूल जाना उनका अधिकार है, जोखिम नहीं। ऐसे में वन विभाग, शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन को समन्वित और स्थायी नीति बनानी होगी—जिसमें स्कूल परिसरों की फेंसिंग, नियमित गश्त, चेतावनी प्रणाली, स्थानीय समुदाय को प्रशिक्षण और त्वरित मुआवजा व्यवस्था शामिल हो।
यह समय है कि वन्य आतंक को “सामान्य” मानने की मानसिकता बदली जाए। अगर भालू स्कूल का दरवाजा तोड़ने की कोशिश कर सकता है, तो खतरा अब जंगल तक सीमित नहीं रहा। आरव की जान बच जाना सौभाग्य है, लेकिन हर बार सौभाग्य के भरोसे नहीं रहा जा सकता। राज्य को अब डर नहीं, समाधान की राजनीति करनी होगी—वरना अगली खबर और भी अधिक भयावह हो सकती है।




