अंकिता की चुप्पी नहीं, सवाल बोल रहे हैं — उत्तराखंड की अस्मिता कटघरे में, सत्ता की साख दांव पर”

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उत्तराखंड की राजनीति, प्रशासन और सत्ता के गलियारों में जब भी अंकिता भंडारी हत्याकांड का नाम आता है, तो केवल एक अपराध नहीं, बल्कि राज्य की आत्मा पर लगा एक गहरा घाव सामने आ जाता है। यह कोई साधारण हत्या नहीं थी, यह एक ऐसी बेटी की हत्या थी, जिसने सत्ता के आगे झुकने से इनकार किया, जिसने अपनी अस्मिता का सौदा करने से मना किया, और जिसकी कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


आज, जब किच्छा विधायक तिलक राज बेहड ने इस मामले में उत्तराखंड सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए सीबीआई जांच की मांग की है, तो यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि जनभावना की प्रतिध्वनि है। यह वह आवाज़ है, जो तीन साल से दबाई जा रही थी, जिसे बुलडोज़र के शोर में, फाइलों की खामोशी में और सत्ता के संरक्षण में दबाने की कोशिश की गई।
अंकिता केवल एक नाम नहीं थी, वह पहाड़ की आत्मा थी
अंकिता भंडारी कोई वीआईपी नहीं थी।
उसके पास कोई राजनीतिक सरनेम नहीं था।
वह किसी बड़े घराने से नहीं आती थी।
वह पहाड़ की साधारण बेटी थी, जो सपने देखती थी, जो नौकरी करना चाहती थी, जो सम्मान से जीना चाहती थी। लेकिन शायद उसकी सबसे बड़ी गलती यही थी कि उसने गलत लोगों के सामने ‘ना’ कहने का साहस किया।
जिस रात अंकिता गायब हुई, उसी रात से इस प्रकरण पर सवालों का अंधड़ शुरू हो गया था। लेकिन जवाबों के बजाय जो मिला, वह था—
सबूतों का जल्दबाज़ी में नष्ट होना
वनंतरा रिसॉर्ट पर बुलडोज़र चलना
वीआईपी के नाम पर पर्दा
जांच को सीमित दायरे में समेटना
क्या यह सब संयोग था?
या फिर यह सब किसी संरक्षण प्राप्त योजना का हिस्सा?
बुलडोज़र न्याय का प्रतीक था या अपराध छुपाने का औजार?
जिस रिसॉर्ट में अंकिता ने आखिरी सांस ली, उसी रिसॉर्ट को बुलडोज़र से ध्वस्त कर दिया गया। सरकार ने इसे “कानूनी कार्रवाई” कहा, लेकिन जनता ने इसे सबूतों पर बुलडोज़र माना।
न सवाल पूछे गए,
न जवाब दिए गए,
न फोरेंसिक जांच पूरी होने का इंतज़ार किया गया।
अगर सरकार और जांच एजेंसियां पूरी तरह निष्पक्ष थीं, तो फिर इतनी जल्दबाज़ी क्यों?
अगर छुपाने को कुछ नहीं था, तो सीबीआई जांच से डर क्यों?
उर्मिला सनावर के खुलासे: सत्ता के लिए असहज सच्चाई
अब इस पूरे प्रकरण में उर्मिला सनावर का नाम सामने आता है—एक ऐसी महिला, जिसने बार-बार कहा कि वह जो बोल रही है, वह सुनी-सुनाई बात नहीं, बल्कि रिकॉर्डेड बातचीत और प्रत्यक्ष जानकारी पर आधारित है।
उर्मिला सनावर द्वारा लिया गया नाम—
गट्टू उर्फ दुष्यंत कुमार गौतम,
राष्ट्रीय महासचिव, भारतीय जनता पार्टी।
यह कोई हल्का आरोप नहीं है।
यह कोई सोशल मीडिया की अफवाह नहीं है।
यह एक ऐसा दावा है, जिसने सत्ता के सबसे ऊंचे गलियारों को असहज कर दिया है।
यह पहली बार नहीं है जब किसी महिला ने जोखिम उठाकर सत्ता के खिलाफ बोला हो। लेकिन सवाल यह है कि—
क्या उसकी बातों की निष्पक्ष जांच होगी?
क्या उसके सबूतों को अदालत में परखा जाएगा?
या फिर उसे भी “राजनीतिक साजिश” कहकर खारिज कर दिया जाएगा?
बयान देने वालों पर हमला नहीं, सच्चाई पर संवाद चाहिए
यह समय चरित्र हनन का नहीं,
यह समय सत्य परीक्षण का है।
जो लोग बोल रहे हैं—चाहे वह उर्मिला सनावर हों, अंकिता की मां सोनी देवी हों, या विपक्ष के नेता—उनका सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि वे सिस्टम से सवाल पूछने का साहस कर रहे हैं।
लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं होता,
लेकिन सवालों से भागना जरूर अपराध की श्रेणी में आता है।
विधायक तिलक राज बेहड की दो टूक: सवाल सत्ता से हैं, बेटी के लिए हैं
विधायक तिलक राज बेहड ने जो कहा, वह महज़ राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा—
“अंकिता को न्याय दिलाना केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की बेटियों की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा प्रश्न है।”
उन्होंने यह भी कहा कि—
एसआईटी जांच पर्याप्त नहीं है
प्रभावशाली लोगों की भूमिका सामने आनी चाहिए
सीबीआई जांच से ही विश्वास बहाल हो सकता है
यह वही बात है, जो सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक हर उत्तराखंडी कह रहा है।
गुणाकार नेता और बयानवीर राजनीति
इस पूरे मामले में सबसे शर्मनाक भूमिका निभाई है गुणाकार नेताओं ने—जो हर मंच पर बयान देते हैं, लेकिन जिम्मेदारी लेने से बचते हैं।
कोई कहता है “मामला अदालत में है”
कोई कहता है “जांच चल रही है”
कोई कहता है “राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया मुद्दा”
लेकिन कोई यह नहीं कहता कि— “चलो, सच्चाई सामने लाते हैं।”
यह वही राजनीति है, जो बेटियों की मौत पर भी गणित लगाती है—
कितना फायदा?
कितना नुकसान?
कितनी सीटें?
भाजपा के भीतर भी मंथन के संकेत
दिलचस्प बात यह है कि इस बार मामला केवल विपक्ष तक सीमित नहीं है।
भाजपा सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत द्वारा गहन जांच की बात कहना इस ओर संकेत करता है कि—
पार्टी के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं है।
जब सत्ता के भीतर से सवाल उठने लगें, तो यह समझ लेना चाहिए कि आग धुएं के बिना नहीं होती।
कांग्रेस का आंदोलन: राजनीति या मजबूरी?
कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि यदि सीबीआई जांच नहीं हुई, तो वह प्रदेशव्यापी आंदोलन करेगी। सत्ता इसे राजनीति कह सकती है, लेकिन सवाल यह है—
अगर सरकार समय रहते निर्णय ले ले,
तो आंदोलन की ज़रूरत ही क्यों पड़े?
अंकिता की मां: न्याय की आखिरी उम्मीद
इस पूरे शोर-शराबे के बीच, सबसे मजबूत और सबसे पीड़ादायक आवाज़ है अंकिता की मां सोनी देवी की।
एक मां, जिसने अपनी बेटी खोई है,
लेकिन जिसने हार नहीं मानी है।
वह बार-बार कह रही है—
“सबूत अदालत में रखे जाएं, दोषियों को सजा मिले।”
क्या हम एक मां की इस मांग को भी राजनीति कहकर टाल देंगे?
प्रधानमंत्री से अपील: अब मौन नहीं, निर्णय चाहिए
विधायक तिलक राज बेहड ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में हस्तक्षेप की अपील की है। यह अपील केवल एक दल की नहीं, बल्कि देश की उस हर बेटी की है, जो यह जानना चाहती है कि—
क्या कानून सबके लिए बराबर है?
निष्कर्ष: यह लड़ाई अंकिता की नहीं, उत्तराखंड की आत्मा की है
अंकिता भंडारी हत्याकांड अब एक केस नहीं रहा।
यह उत्तराखंड की अस्मिता,
बेटियों की सुरक्षा,
और लोकतंत्र की साख का प्रश्न बन चुका है।
अगर आज भी—
वीआईपी का नाम सामने नहीं आता
सच्चाई दबाई जाती है
जांच सीमित रखी जाती है
तो इतिहास माफ नहीं करेगा।
अब वक्त है कि—
सीबीआई जांच हो
सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच हो
सच बोलने वालों को सुरक्षा मिले
दोषी चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, उसे सजा मिले
क्योंकि अगर अंकिता को न्याय नहीं मिला,
तो यह केवल एक बेटी की हार नहीं होगी—
यह पूरे उत्तराखंड की हार होगी।
न्याय टल सकता है, लेकिन दबाया नहीं जा सकता।


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