

संपादकीय | सोशल मीडिया की नकली दबंगई और असली कमजोरियाँ
सोशल मीडिया आज व्यक्तित्व का आईना नहीं, बल्कि अक्सर उसका मुखौटा बन चुका है। यहाँ सबसे ज़्यादा वही लोग दबंगई का प्रदर्शन करते दिखते हैं, जिनके भीतर आत्मविश्वास का घोर अभाव होता है। “हम ही असली डॉन हैं”, “FIR किसी और क्षेत्र में है” जैसे स्टेटस दरअसल ताक़त का नहीं, डर का ऐलान होते हैं। जो वास्तव में शक्तिशाली होता है, उसे अपनी शक्ति साबित करने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
जैसे एक डरपोक व्यक्ति फेसबुक पर खुद को दबंग दिखाने की कोशिश करता है, वैसे ही बेईमान आदमी सबसे ज़्यादा ईमानदारी का ढोल पीटता है। जो चरित्र में खोखला होता है, वही नैतिकता के लंबे भाषण देता है। अत्यधिक हँसने वाला व्यक्ति अक्सर भीतर से टूटा होता है, क्योंकि मुस्कान उसके दर्द का पर्दा होती है। लगातार ज्ञान बाँटने वाला कई बार खुद दिशाहीन होता है, और हर मुद्दे पर राय देने वाला व्यक्ति अपने जीवन के फैसलों में सबसे ज़्यादा उलझा रहता है।
सोशल मीडिया पर दिखने वाली छवि और ज़मीनी सच्चाई के बीच की यह खाई हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है। आज “दिखना” ही “होना” बन गया है। लेकिन समाज को यह समझना होगा कि असली ताक़त शोर में नहीं, संयम में होती है; असली ईमानदारी प्रचार में नहीं, आचरण में होती है। जो भीतर से मजबूत होता है, वह बाहर से चुप रहता है—और यही उसकी पहचान है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी




