संपादकीय | अंकिता भंडारी हत्याकांड: जब न्याय की मांग सड़कों से बाज़ार तक पहुँची, और सत्ता से सवाल और तीखे हुएअंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड के इतिहास का वह काला अध्याय

Spread the love

उत्तराखंड के इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसने देवभूमि की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। दो वर्ष से अधिक समय बीतने के बाद भी “VIP कौन था?”—यह सवाल आज भी अनुत्तरित है। समय के साथ यह मामला केवल एक अपराध नहीं रहा, बल्कि सत्ता-संरक्षण, जांच की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की कठोर परीक्षा बन चुका है।
इसी क्रम में रुद्रपुर में आज जो दृश्य सामने आया, उसने जनभावनाओं की गंभीरता को साफ़ शब्दों में बयां कर दिया। उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष एवं कांग्रेस नेता संजय जुनेजा ने अपने साथियों के साथ मुंडन कराकर अंकिता को श्रद्धांजलि दी। यह प्रतीकात्मक विरोध मात्र नहीं था—यह उस पीड़ा, आक्रोश और नैतिक साहस का प्रदर्शन था, जो तब जन्म लेता है जब न्याय लगातार टलता दिखे। इस दौरान भाजपा सरकार के खिलाफ नारे लगे, जो इस बात का संकेत हैं कि सवाल अब केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि आम जन और व्यापारी वर्ग के बीच गहराई तक उतर चुके हैं।
रुद्रपुर का बाज़ार—जो आम तौर पर रोज़मर्रा की भागदौड़ और व्यापारिक गतिविधियों में व्यस्त रहता है—आज एक स्वर में न्याय की मांग करता दिखा। भारी संख्या में व्यापारियों की भागीदारी यह बताती है कि यह विरोध किसी एक व्यक्ति या दल का नहीं, बल्कि पूरे उद्योग व्यापार मंडल और रुद्रपुर शहर की सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। संजय जुनेजा का नेतृत्व यहां इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने आर्थिक हितों से ऊपर उठकर नैतिक प्रश्न को प्राथमिकता दी—यह संदेश देते हुए कि व्यापारिक समुदाय अन्याय पर चुप नहीं रहेगा।
राजनीतिक गलियारों में भी बेचैनी साफ़ दिखाई दे रही है। पूर्व शिक्षा मंत्री एवं गदरपुर विधायक अरविंद पांडेय का बयान इस संदर्भ में खास महत्व रखता है। उनका स्पष्ट कहना कि यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति या VIP की संलिप्तता है, तो उसे बचाना न्याय के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा—यह दर्शाता है कि सत्ता के भीतर भी सवाल उठ रहे हैं। यह केवल विपक्ष की आवाज़ नहीं रही; सत्ता-पक्ष के भीतर से उठी यह चिंता जांच की दिशा और सीमाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
उधर, ज्वालापुर के पूर्व भाजपा विधायक सुरेश राठौर की कथित पत्नी उर्मिला सनावर के 24 मिनट के फेसबुक लाइव में लगाए गए आरोपों—VIP की मौजूदगी, दबाव और कथित सबूतों की बात—ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है। अंकिता की व्हाट्सएप चैट्स पहले ही यह संकेत देती हैं कि वह खुद को असुरक्षित महसूस कर रही थी। “VIP गेस्ट” और “एक्स्ट्रा सर्विस” जैसे शब्द जांच की परिधि को शीर्ष तक ले जाने की मांग करते हैं। वायरल ऑडियो में बड़े नामों के जिक्र ने भी जांच एजेंसियों की भूमिका पर नए सिरे से सवाल खड़े किए हैं।
संजय जुनेजा का विरोध इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि उन्होंने इसे किसी दलगत लाभ की राजनीति नहीं बनने दिया। उनका संदेश स्पष्ट रहा—दोषियों को सज़ा मिले, सच सामने आए। यह विरोध इस बात की याद दिलाता है कि जब सत्ता में बैठे लोग जवाबदेही से बचते हैं, तब समाज के जिम्मेदार वर्गों को आगे आना पड़ता है। व्यापारी समुदाय का सड़क पर उतरना बताता है कि “आर्थिक चुप्पी” का मिथक टूट चुका है; अन्याय के विरुद्ध आवाज़ अब हर वर्ग से उठेगी।
आज सीबीआई जांच की मांग फिर तेज़ है। अरविंद पांडेय का बयान और रुद्रपुर के बाज़ार की एकजुटता इस मांग को राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर वजन देती है। सवाल सीधा है—क्या जांच की सीमाएं पहले से तय थीं? अगर नहीं, तो VIP एंगल अब तक धुंध में क्यों रहा?
न्याय केवल सज़ा का नाम नहीं; सच के पूर्ण उद्घाटन का नाम है। यदि प्रभावशाली लोग शामिल थे, तो नाम सामने आने चाहिए—ताकत चाहे जितनी भी हो। देवभूमि की जनता आधे सच से संतुष्ट नहीं। संजय जुनेजा और उद्योग व्यापार मंडल का यह कदम याद दिलाता है कि लोकतंत्र में जब सत्ता मौन साध ले, तब समाज की नैतिक आवाज़ ही अंतिम उम्मीद बनती है।
अब सरकार और जांच एजेंसियों के सामने एक ही कसौटी है—सच का सामना। अन्यथा इतिहास यही पूछेगा कि क्या अंकिता का सच फाइलों में दबा दिया गया, या न्याय ने अंततः अपनी राह


Spread the love