हमारा पिथौरागढ़ किसी से कम है क्या?शिक्षा के मंदिर में फर्जीवाड़ा, 43 फर्जी शिक्षक और कठघरे में पूरी व्यवस्था

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उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, शिक्षा को समाज की रीढ़ माना जाता है और गुरु को ब्रह्मा–विष्णु–महेश के समकक्ष। लेकिन जब यही गुरु फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी हथियाने लगें, जब शिक्षा विभाग घोटालों की प्रयोगशाला बन जाए और जब सरकार मौन साध ले—तो सवाल उठता है कि यह देवभूमि है या घोटालों की भूमि?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


ऊधम सिंह नगर और नैनीताल के बाद अब सीमांत जिला पिथौरागढ़ भी फर्जीवाड़े की उसी शर्मनाक सूची में शामिल हो गया है, जहाँ शिक्षा विभाग की साख तार-तार हो चुकी है। वर्ष 2024 की सहायक अध्यापक भर्ती प्रक्रिया में सामने आया यह घोटाला न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह साबित करता है कि उत्तराखंड में सरकारी नौकरी अब मेहनत से नहीं, बल्कि जुगाड़, जालसाजी और राजनीतिक संरक्षण से मिल रही है।
43 फर्जी शिक्षक: सिस्टम की आंखों में धूल या सिस्टम की मिलीभगत?
पिथौरागढ़ जिले में कुल 326 सहायक अध्यापकों की नियुक्ति हुई थी। अब यह खुलासा हुआ है कि इनमें से 43 सहायक अध्यापक ऐसे हैं, जिन्होंने फर्जी स्थायी निवास प्रमाणपत्र और जाली दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त की।
ये अभ्यर्थी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों से डीएलएड कर आए। भर्ती के समय इन्होंने उन राज्यों के स्थायी निवास प्रमाणपत्र लगाए और बाद में फर्जी तरीके से उत्तराखंड का निवास प्रमाणपत्र बनवाकर खुद को स्थानीय बता दिया।
सवाल यह नहीं है कि फर्जीवाड़ा हुआ—
सवाल यह है कि यह फर्जीवाड़ा बिना सिस्टम की सहमति के कैसे संभव हुआ?
क्या शिक्षा विभाग सो रहा था या सौदेबाज़ी चल रही थी?
यह मानना भोलेपन की पराकाष्ठा होगी कि 43 लोगों के दस्तावेज फर्जी हों और जांच अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी, चयन समिति, निदेशालय—किसी को भनक तक न लगे।
क्या दस्तावेजों का सत्यापन नहीं हुआ?
क्या निवास प्रमाणपत्रों की ऑनलाइन जांच नहीं की गई?
क्या जिलाधिकारी कार्यालय की भूमिका संदिग्ध नहीं है?
क्या यह केवल उम्मीदवारों की गलती है या पूरी चेन में भ्रष्टाचार व्याप्त है?
यह घोटाला केवल 43 फर्जी शिक्षकों का नहीं है, यह प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि संस्थागत भ्रष्टाचार का मामला है।
गुरु या गुनहगार? समाज को क्या संदेश जा रहा है
जो व्यक्ति फर्जी दस्तावेजों से शिक्षक बनता है, वह बच्चों को ईमानदारी, नैतिकता और संविधान के मूल्य क्या सिखाएगा?
क्या ऐसे लोगों को कक्षा में खड़ा रहने का नैतिक अधिकार है?
ये 43 लोग केवल नौकरी नहीं हथिया रहे, बल्कि—
योग्य युवाओं का भविष्य छीन रहे हैं
बेरोजगार उत्तराखंडियों के हक पर डाका डाल रहे हैं
शिक्षा व्यवस्था को अंदर से खोखला कर रहे हैं
यह केवल कानून का नहीं, समाज के साथ विश्वासघात है।
सरकार और मंत्री क्यों चुप हैं?
यह घोटाला उस समय का है जब शिक्षा विभाग एक राजनीतिक नेतृत्व के अधीन था। सवाल यह है कि—
तत्कालीन शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं हो?
क्या मुख्यमंत्री कार्यालय को इसकी जानकारी नहीं थी?
क्या केवल नोटिस जारी कर सरकार अपने पाप धो लेगी?
जब उत्तराखंड में एक के बाद एक—
भर्ती घोटाले
परीक्षा पेपर लीक
फर्जी डिग्री
आउटसोर्सिंग घपले
सामने आ रहे हों, तो यह साफ है कि यह व्यक्तिगत नहीं, नीतिगत भ्रष्टाचार है।
सीबीआई जांच क्यों नहीं? किसे बचाया जा रहा है?
इतनी बड़ी संख्या में फर्जी नियुक्तियां राज्य स्तरीय साजिश की ओर इशारा करती हैं। ऐसे में—
केवल विभागीय जांच क्यों?
केवल नोटिस देकर क्यों छोड़ा जा रहा है?
सीबीआई जांच से सरकार क्यों डर रही है?
यदि सरकार की नीयत साफ है, तो पूरे शिक्षा विभाग, चयन प्रक्रिया और प्रमाणपत्र जारी करने वाली मशीनरी पर सीबीआई जांच बैठाई जाए।
नौकरशाही पर भी गिरेगी गाज या फिर वही ढाल?
उत्तराखंड में परंपरा बन चुकी है—
घोटाला होता है
कर्मचारी बच जाते हैं
बलि का बकरा कोई छोटा अफसर बनता है
अब सवाल यह है कि—
क्या जिला शिक्षा अधिकारी निलंबित होंगे?
क्या सत्यापन करने वाले बाबुओं पर FIR होगी?
क्या जिलाधिकारी कार्यालय की भूमिका की जांच होगी?
अगर नहीं, तो यह मान लिया जाए कि नौकरशाही भ्रष्टाचार की संरक्षक बन चुकी है।
फर्जी पाए गए तो बर्खास्तगी नहीं, जेल होनी चाहिए
यह कोई तकनीकी गलती नहीं है।
यह धोखाधड़ी, कूटरचना और सरकारी संपत्ति की लूट है।
इसलिए मांग स्पष्ट है—
43 फर्जी सहायक अध्यापकों को तत्काल बर्खास्त किया जाए
अब तक मिला वेतन रिकवर किया जाए
IPC और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आपराधिक मुकदमे दर्ज हों
चयन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों को निलंबित कर जेल भेजा जाए
उत्तराखंड के युवाओं के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात
आज उत्तराखंड का युवा—
सालों से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है
आर्थिक तंगी झेल रहा है
परिवार की उम्मीदों का बोझ ढो रहा है
और दूसरी ओर दूसरे राज्यों के लोग पैसे और फर्जी कागजों के दम पर उसकी नौकरी छीन रहे हैं।
यह केवल घोटाला नहीं, यह उत्तराखंड के भविष्य पर हमला है।
पिथौरागढ़ का नाम क्यों बदनाम किया जा रहा है?
सीमांत जिला पिथौरागढ़ हमेशा से ईमानदारी, सादगी और राष्ट्रभक्ति के लिए जाना जाता रहा है।
लेकिन आज उसे—
फर्जी शिक्षकों
जाली प्रमाणपत्र
भ्रष्ट सिस्टम
के साथ जोड़ दिया गया है।
यह केवल जिले का नहीं, पूरे राज्य का दुर्भाग्य है।
अब भी समय है… या फिर इतिहास माफ नहीं करेगा
सरकार के पास अभी भी मौका है—
दोषियों को बचाने के बजाय उदाहरण बनाने का
युवाओं का भरोसा लौटाने का
शिक्षा व्यवस्था को बचाने का
यदि आज भी लीपापोती हुई, तो यह तय है कि उत्तराखंड की आने वाली पीढ़ी सरकार और सिस्टम—दोनों पर विश्वास खो देगी।
देवभूमि को दलालों और दलाल-प्रणाली से मुक्त करना होगा—वरना इतिहास सवाल पूछेगा और जवाब देने वाला कोई नहीं होगा।


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