

उत्तराखंड सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास संस्थान (MSME-DI) केंद्र सरकार का एक महत्वपूर्ण उपक्रम है, जिसका उद्देश्य लोगों को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करना, सरकारी योजनाओं की जानकारी देना और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। काग़ज़ों में यह व्यवस्था जितनी प्रभावशाली दिखती है, ज़मीनी हकीकत उतनी ही निराशाजनक है—खासतौर पर उत्तराखंड जैसे पर्वतीय और सीमांत राज्यों में।

पुरन चंद भट्ट ने कहा कि शिवसेना सीमांत पर्वतीय क्षेत्रों में सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएगी। सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर सेमिनार आयोजित कर लोगों को स्वरोजगार से जोड़ना ही शिवसेना की प्राथमिक नीति है।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
यह कटु सत्य है कि MSME मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत अधिकांश अधिकारी अपने सेमिनार, कार्यशालाएँ और जागरूकता कार्यक्रम शहरी इलाक़ों तक ही सीमित रखते हैं। पहाड़ों के दूरस्थ और सीमांत क्षेत्रों तक पहुँचना न उनकी प्राथमिकता में है, न कार्यसंस्कृति में। परिणामस्वरूप ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों के लोग उन सरकारी योजनाओं से अनजान रह जाते हैं, जिनके माध्यम से वे अपने ही गाँव में रोजगार सृजित कर सकते थे।
जानकारी के अभाव का सीधा दुष्परिणाम पलायन है। रोजगार की तलाश में युवा पहाड़ों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। खेत खाली पड़े हैं, गाँव सूने हो रहे हैं और सदियों से सहेजी गई पहाड़ी संस्कृति धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। यह केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है। यदि सीमांत क्षेत्रों को आर्थिक रूप से सशक्त नहीं किया गया, तो ‘विकास’ केवल शहरों की चकाचौंध तक सिमट कर रह जाएगा।
ऐसे समय में शिवसेना की नीति एक सकारात्मक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। शिवसेना का स्पष्ट मानना है कि यदि सरकारी तंत्र पहाड़ों तक नहीं पहुँच पा रहा, तो समाज और संगठन मिलकर उस खालीपन को भरें। शिवसेना का प्रयास है कि MSME जैसे केंद्रीय संस्थानों के अधिकारियों को सीमांत और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में सेमिनार आयोजित करने के लिए प्रेरित किया जाए। इन कार्यक्रमों में संगठन न केवल सहयोग करेगा, बल्कि व्यापक प्रचार-प्रसार कर स्थानीय लोगों की भागीदारी भी सुनिश्चित करेगा।
इन सेमिनारों के माध्यम से ग्रामीणों को स्वरोजगार योजनाओं, लघु उद्योगों, स्टार्टअप सहायता, ऋण, सब्सिडी और प्रशिक्षण की वास्तविक जानकारी मिलेगी। जब पहाड़ का युवा यह समझेगा कि मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, हर्बल उत्पाद, हस्तशिल्प, डेयरी, पर्यटन आधारित लघु उद्योग या फूड प्रोसेसिंग जैसे कार्य अपने ही गाँव में सम्मानजनक आजीविका दे सकते हैं, तब पलायन की मानसिकता स्वतः कमजोर होगी।
शिवसेना की यह नीति केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। पहाड़ों में स्वरोजगार का अर्थ है—स्थानीय संसाधनों का संरक्षण, संस्कृति की रक्षा और सीमांत क्षेत्रों में जनसंख्या का संतुलन। यह नीति “रोजगार के लिए शहर” की मजबूरी को “रोजगार के साथ गाँव” की संभावना में बदलने का प्रयास है।
अब आवश्यकता है कि केंद्र सरकार और MSME मंत्रालय भी इस वास्तविकता को समझे। योजनाएँ तभी सफल होती हैं, जब वे लाभार्थी तक पहुँचें। पहाड़ों को अनदेखा कर बनाया गया कोई भी विकास मॉडल अधूरा है। यदि आज भी सीमांत क्षेत्रों में जागरूकता नहीं फैलाई गई, तो कल पहाड़ों का खाली होना कोई आश्चर्य नहीं होगा।
शिवसेना का यह संकल्प—सरकारी संस्थानों, समाज और संगठन के सहयोग से पहाड़ों में स्वरोजगार को बढ़ावा देना—वास्तव में पलायन रोकने की दिशा में एक ठोस पहल है। यही नीति पहाड़ों को फिर से आबाद, आत्मनिर्भर और जीवंत बना सकती है।




