तिलक राज बेहड़: कांग्रेस के बदलते समीकरणों में उभरता निर्णायक चेहरा? बेहड़ क्यों हैं उत्तराखंड कांग्रेस के लिए जरूरी

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संपादकीय: उत्तराखंड कांग्रेस में उभरते संकेत।उत्तराखंड कांग्रेस इन दिनों गहरे अंतर्कलह और नेतृत्व संकट से गुजर रही है, लेकिन इसी उथल-पुथल के बीच तिलक राज बेहड़ का कद तेजी से उभर रहा है। हालिया नियुक्तियों पर उनकी नाराज़गी ने हाईकमान को भी झकझोर दिया है, क्योंकि तराई में बेहड़ का जनाधार अपराजेय माना जाता है। 14 दिसंबर की दिल्ली रैली उनके शक्ति-प्रदर्शन का मंच बन चुकी है। कांग्रेस के भीतर जिस नेता के पीछे वास्तविक कार्यकर्ता-बल खड़ा दिखेगा, वही भविष्य तय करेगा—और इस समय समीकरण बेहड़ के पक्ष में मजबूत होते दिख रहे हैं। उत्तराखंड कांग्रेस का अगला अध्याय उन्हीं के इर्द-गिर्द लिखा जा सकता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

भीतरघात, नियुक्तियों की नाराज़गी, हाईकमान की रणनीति और 14 दिसंबर की रैली के बीच बड़ी जिम्मेदारी की आहट?उत्तराखंड कांग्रेस एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है, जहाँ उसकी राजनीति केवल नेताओं के बयानों या भीतर की गुटबाजी से तय नहीं हो रही, बल्कि जनाधार, संगठन की दिशा, हाईकमान की प्राथमिकताओं और भविष्य की रणनीति के बीच एक बड़े बदलाव के संकेत देखे जा सकते हैं। इस बदलते दौर के केंद्र में यदि किसी एक नेता का नाम लगातार उभर रहा है, तो वह है—पूर्व कैबिनेट मंत्री और किच्छा के विधायक तिलक राज बेहड़।

बीते महीनों में उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर लगातार माथापच्ची, नियुक्तियों पर असंतोष, फोटोशूट विवाद, और हाईकमान की भूमिका पर तरह-तरह की चर्चाओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यही उभरकर आई है कि बेहड़ को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है।
यह संभावना हवा में नहीं है—बल्कि इसे जन्म दे रहे हैं कांग्रेस के अंदर के वे सभी राजनीतिक समीकरण, जो बेहड़ की महत्वता को और अधिक मजबूत बना रहे हैं।

बेहड़ की नाराज़गी ने दिल्ली तक हलचल पैदा की
सूत्रों की मानें तो उधम सिंह नगर में हुई हालिया कांग्रेस नियुक्तियों को लेकर तिलक राज बेहड़ खासे नाराज़ हैं।
उनका मानना है कि—
नियुक्तियाँ बिना वरिष्ठ नेताओं की सहमति के हुईं,

स्थानीय सामाजिक-सियासी संतुलन की अनदेखी हुई,
और तराई के बड़े नेताओं को संगठनात्मक फैसलों में शामिल नहीं किया गया।
राजनीतिक गलियारों में यह कहा गया कि बेहड़ की नाराज़गी केवल “क्षेत्रीय असंतोष” नहीं है, बल्कि यह उस गहरी समस्या का हिस्सा है जिसने उत्तराखंड कांग्रेस को वर्षों से कमजोर किया है—गुटबाजी और एक-दूसरे की उपेक्षा।

लेकिन साथ ही यह स्पष्ट है कि हाईकमान बेहड़ जैसे बड़े और प्रभावशाली नेता को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम उठाने के मूड में नहीं है।
तराई में कांग्रेस का सबसे मजबूत चेहरा बेहड़ ही हैं, और यही उनकी असली ताकत है।
फोटोशूट विवाद और कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति!
हाल ही में दिल्ली में कांग्रेस के पांच नेताओं—गणेश गोदियाल, करण माहरा, हरक सिंह रावत, प्रीतम सिंह आदि—की एक फोटो वायरल हुई।
इस फोटो को पार्टी के भीतर एक संकेत के रूप में देखा गया कि शायद ‘नई टीम’ में इन्हीं नेताओं पर भरोसा किया जाएगा।
इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में चर्चा और असंतोष दोनों बढ़ा।

वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता धीरेंद्र प्रताप ने प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा से मुलाकात के बाद स्पष्ट किया कि—यह केवल एक अनौपचारिक फोटोशूट था,हरीश रावत की उपेक्षा नहीं हुई है,कांग्रेस में हरीश रावत अभी भी सर्वोच्च सम्मान रखते हैं।इस बयान से भले माहौल शांत करने की कोशिश की गई हो, लेकिन भीतर की हलचल को दबाया नहीं जा सका।
इन्हीं परिस्थितियों में तिलक राज बेहड़ का नाम सबसे अधिक प्रासंगिक बनकर उभरा है—क्योंकि वे न तो किसी गुट में बंधे हैं, और न ही किसी लॉबी का हिस्सा हैं।

क्यों बेहड़ हाईकमान की जरूरत बनते जा रहे हैं?

  1. तराई का सबसे मजबूत और निर्विवाद चेहरा?उधम सिंह नगर में बेहड़ की पकड़ केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक भी है।
    वे किसान, मजदूर, व्यापारी, अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलित सभी वर्गों के बीच सम्मानित नेता माने जाते हैं।
    तराई में कांग्रेस का व्यापक जनाधार केवल बेहड़ के कारण ही जीवित है।
  2. शांत, संयमित और साफ छवि वाले नेता?उत्तराखंड कांग्रेस में कई नेता आपसी टकराहट में फंसे रहते हैं।
    लेकिन बेहड़ हमेशा संयमित और संगठन के प्रति निष्ठावान नेता के रूप में उभरते हैं।
    उनकी छवि किसी भी आरोप या विवाद से दूर है—जो कांग्रेस के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।
  3. रैली और जनसंपर्क के मास्टर रणनीतिकार

14 दिसंबर दिल्ली रैली के लिए किच्छा स्थित उनके कार्यालय में कार्यकर्ताओं का जमावड़ा साबित करता है कि—बेहड़ जहाँ खड़े होते हैं, भीड़ अपने आप खड़ी हो जाती है,उन्होंने जिला, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर टीमों को सक्रिय कर दिया है,

उधम सिंह नगर से हजारों कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचने वाले हैं।
कांग्रेस हाईकमान ऐसे नेता को किनारे नहीं कर सकता जिसकी जमीनी ताकत साबित और प्रभावी हो।
10 दिसंबर को दिल्ली बुलावा और ‘न जाने’ का प्रभाव!सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस हाईकमान ने 10 दिसंबर को बेहड़ समेत एक दर्जन नेताओं को दिल्ली बुलाया था।
लेकिन अधिकांश नेताओं ने यह कहते हुए दिल्ली न जाने का निर्णय लिया कि—

वे 14 दिसंबर की तैयारी में व्यस्त हैं,रैली की रणनीति और भीड़ जुटाना अधिक महत्वपूर्ण है।
राजनीति में इसे एक संकेत की तरह देखा जा रहा है—
यह संदेश कि उत्तराखंड कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि उन्हें केवल फोटोशूट या औपचारिक बैठकों का हिस्सा न बनाया जाए, बल्कि निर्णयों में बराबर भागीदारी दी जाए।

बेहड़ का दिल्ली न जाना दर्शाता है कि वे अपना मूल्य जानते हैं और चाहते हैं कि हाईकमान तराई के जनाधार और उनके प्रभाव की गंभीरता को समझे।

14 दिसंबर की रैली: यह बेहड़ की ‘राजनीतिक परीक्षा’ नहीं, बल्कि ‘पावर शो’ है?दिल्ली में होने वाली “वोट चोर गद्दी छोड़ो” रैली कांग्रेस के लिए जितनी महत्वपूर्ण है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है बेहड़ के लिए यह मंच।
क्योंकि—जिस नेता के नेतृत्व में सबसे बड़ी भीड़ दिल्ली पहुंचेगी,

हाईकमान उसकी ताकत को तुरंत पहचान लेगा,और आने वाली संगठनात्मक नियुक्तियों में वही नेता प्राथमिकता पाएगा।
सूत्रों का दावा है कि बेहड़ इस रैली को अपनी ‘राजनीतिक निर्णायकता’ सिद्ध करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं, और इसके लिए उन्होंने पूरी क्षमता झोंक दी है।

कांग्रेस की गुटबाजी और बेहड़ का बढ़ता महत्व;वर्तमान में उत्तराखंड कांग्रेस तीन बड़े समूहों में बंटी हुई मानी जाती है—

  1. हरीश रावत गुट,
  2. प्रीतम सिंह – गणेश गोदियाल – करण माहरा समूह,
  3. हरक सिंह रावत और उनके समर्थक?इन सबके बीच एक ऐसा नेता जो किसी भी गुट में नहीं है,
    लेकिन सभी क्षेत्रों में सम्मानित है,
    और संगठन को चुनौती नहीं बल्कि स्थिरता दे सकता है—
    वह केवल तिलक राज बेहड़ हैं।

हाईकमान ऐसे नेता को ही बड़ी जिम्मेदारी देने पर विचार करेगा जो—न किसी का विरोधी हो,
न किसी विवाद का हिस्सा,और जो आधे उत्तराखंड को अपनी मौजूदगी से प्रभावित कर सकता हो।

बेहड़ क्यों हैं उत्तराखंड कांग्रेस के लिए जरूरी?

  1. तराई क्षेत्र कांग्रेस की रीढ़ है, और बेहड़ तराई की रीढ़ हैं।
  2. सामाजिक संतुलन (सिख, मुस्लिम, पिछड़े, किसान) में उनकी पकड़ किसी और के पास नहीं।
  3. व्यवस्थित और शांत नेतृत्व—उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य के लिए बिल्कुल उपयुक्त।
  4. संगठनात्मक अनुभव और प्रशासनिक समझ—स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए शानदार कार्यकाल।
  5. बीजेपी के खिलाफ मजबूत मुकाबला देने की क्षमता—यह खासकर तराई में सिद्ध है।
  6. कार्यकर्ताओं के बीच अपार लोकप्रियता।
  7. हाईकमान और जमीनी स्तर के बीच एक भरोसेमंद पुल।
    इन सभी कारणों से कांग्रेस के अंदर जिस नेता की जरूरत है—वह बेहड़ ही दिखाई देते हैं।
    क्या बेहड़ होंगे अगली जिम्मेदारी का चेहरा?
    राजनीतिक संकेत साफ कहते हैं कि हाईकमान अब संतुलन की राजनीति करना चाहता है।पाँच नेताओं को नई जिम्मेदारी मिलने के बाद पार्टी के सामने यह दबाव है कि—

तराई को भी उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए,

और यह प्रतिनिधित्व बेहड़ से बेहतर कोई नहीं दे सकता।इसलिए यह बिलकुल संभव है कि—आगे आने वाले दिनों में बेहड़ को प्रदेश स्तर पर कोई महत्वपूर्ण पद मिले,
या उन्हें हाईकमान दिल्ली में उत्तराखंड का प्रतिनिधि बनाकर बड़ी जिम्मेदारी सौंपे।

तिलक राज बेहड़ का समय आ चुका है।कांग्रेस में उनकी भूमिका अब पहले से कहीं ज्यादा बड़ी और निर्णायक होने जा रही है।

तिलक राज बेहड़—उत्तराखंड कांग्रेस की नई धुरी?बेहड़ का उभार केवल उनके चुनावी प्रदर्शन या अनुभव का परिणाम नहीं है,
बल्कि यह कांग्रेस की वर्तमान स्थिति, उसके अंदर की गुटबाजी, तराई के राजनीतिक संतुलन और आने वाले विधानसभा व लोकसभा चुनावों की दृष्टि से एक अनिवार्य राजनीतिक आवश्यकता बन चुका है।आज जब कांग्रेस मजबूती की तलाश में है,
जब उसे ऐसा नेता चाहिए जो—
संगठन को संभाल सके,
कार्यकर्ताओं को जोड़े रखे,

क्षेत्रीय संतुलन बनाए,
और बीजेपी के खिलाफ प्रभावी चुनौती दे सके—
तो वह चेहरा बेहड़ ही हो सकते हैं।इसीलिए कहा जा सकता है कि:


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