

उत्तराखंड के भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग को 106वें समिट में SKOCH Group द्वारा दिए जाने वाले SKOCH Award के लिए चुना जाना निस्संदेह सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों के लिए गर्व का विषय हो सकता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
MDTSS और ई-रवन्ना सिक्योरिटी पेपर जैसी परियोजनाओं को “डिजिटल पारदर्शिता” का प्रतीक बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या डिजिटल डैशबोर्ड पर चमकती हरी बत्तियाँ सचमुच पहाड़ों के घावों को ढक सकती हैं?
डिजिटल चमक बनाम धूल-धक्कड़ की हकीकत
MDTSS—Mining Digital Transformation and Surveillance System—को अवैध खनन पर लगाम का रामबाण बताया जा रहा है। RFID, ANPR कैमरे, रियल-टाइम डैशबोर्ड, IFMS से राजस्व समंजन—सब कुछ तकनीकी रूप से प्रभावशाली लगता है। ई-रवन्ना को वॉटरमार्क और QR कोड से लैस कर दिया गया है ताकि फर्जीवाड़ा रुके।
पर ज़मीनी सच्चाई क्या है?
क्या ओवरलोड डंपरों की रफ्तार कम हुई?
क्या पहाड़ों की अंधाधुंध कटान थमी?
क्या नदियों का सीना छलनी होना बंद हुआ?
प्रदेश के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी रात के अंधेरे में डंपर दौड़ते दिखाई देते हैं। जिन सड़कों पर स्कूली बच्चे और ग्रामीण चलते हैं, वहीं खनन माफिया के ट्रक धूल के गुबार के बीच गुजरते हैं। यदि सिस्टम इतना चुस्त है तो ओवरलोडिंग की शिकायतें क्यों कायम हैं?
आपदाओं की पृष्ठभूमि में खनन
उत्तराखंड पहले ही भौगोलिक रूप से संवेदनशील राज्य है। भूस्खलन, अतिवृष्टि, नदी कटाव और बादल फटने की घटनाएँ बढ़ रही हैं। वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते आए हैं कि अनियंत्रित खनन और निर्माण गतिविधियाँ पर्वतीय संतुलन को बिगाड़ती हैं।
जब पहाड़ का पेट खाली किया जाता है तो वह कभी न कभी धंसता है।
जब नदी का प्राकृतिक प्रवाह रोका या बदला जाता है तो वह उफन कर जवाब देती है।
ऐसे में सरकार अगर अवार्ड मंच पर डिजिटल निगरानी की उपलब्धि गिना रही है तो जनता पूछने को मजबूर है—क्या पर्यावरणीय प्रभाव आकलन भी उतनी ही सख्ती से लागू हो रहा है? क्या स्थानीय समुदायों की सहमति ली जा रही है?
राजस्व बढ़ा, लेकिन किस कीमत पर?
सरकार का तर्क है कि इन परियोजनाओं से राजस्व में वृद्धि हुई है। मान भी लें कि रॉयल्टी की चोरी कम हुई, फर्जी रवन्ना बंद हुए—तो भी प्रश्न बचता है:
क्या राजस्व वृद्धि ही विकास का अंतिम पैमाना है?
यदि खनन से राज्य को आय मिल रही है, तो क्या वही आय उन गांवों तक पहुंच रही है जहाँ की जमीन, पानी और हवा प्रभावित हो रही है?
स्थानीय पहाड़ी परिवारों को क्या मिला—रोजगार या विस्थापन?
कई क्षेत्रों में ग्रामीणों का आरोप है कि बाहरी ठेकेदार संसाधन ले जाते हैं और स्थानीय लोगों को केवल अस्थायी मजदूरी मिलती है। विकास के नाम पर प्राकृतिक संपदा का दोहन हो रहा है, लेकिन स्थायी आजीविका के विकल्प सीमित हैं।
ओवरलोड डंपर और मौन तंत्र
तकनीक कहती है कि तराजू से वजन सीधे सिस्टम में दर्ज होता है। यदि ऐसा है तो फिर ओवरलोड डंपरों की तस्वीरें और वीडियो समय-समय पर सामने क्यों आते हैं?
क्या हर चेकपोस्ट पर सिस्टम समान रूप से सक्रिय है?
क्या कहीं “मानवीय हस्तक्षेप” की गुंजाइश बाकी है?
डिजिटल सिस्टम तभी प्रभावी है जब उसे निष्पक्षता से लागू किया जाए। यदि निगरानी का नियंत्रण उन्हीं हाथों में है जिन पर सवाल उठते रहे हैं, तो तकनीक केवल आवरण बन जाती है।
पुरस्कार और प्रश्नचिह्न
SKOCH Group द्वारा दिया जाने वाला SKOCH Award शासन और विकास में नवाचारों को मान्यता देता है। 28 मार्च 2026 को नई दिल्ली में यह सम्मान ग्रहण किया जाएगा।
लेकिन पुरस्कार चयन प्रक्रिया का आधार मुख्यतः प्रस्तुत आंकड़े और रिपोर्ट होते हैं। क्या स्वतंत्र सामाजिक और पर्यावरणीय ऑडिट भी इस मूल्यांकन का हिस्सा थे?
क्या प्रभावित गांवों की राय पूछी गई?
यदि किसी परियोजना से राजस्व बढ़ता है पर पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है, तो उसे पूर्ण सफलता कहना जल्दबाज़ी नहीं होगी?
जनता की आवाज बनाम जश्न
मीडिया का एक वर्ग इस उपलब्धि पर जश्न मना रहा है। लेकिन वही मीडिया कितनी बार उन गांवों तक पहुंचा है जहाँ खनन के कारण खेतों में धूल जमती है?
कितनी बार उन परिवारों से बात की गई जिनकी आजीविका नदी और जंगल पर निर्भर है?
यदि पत्रकारिता केवल प्रेस रिलीज तक सीमित हो जाए तो वह लोकतंत्र का प्रहरी नहीं, सूचना का वाहक भर रह जाती है।
विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में विकास का अर्थ केवल राजस्व नहीं हो सकता। यहाँ विकास का मतलब होना चाहिए—
पर्यावरणीय संतुलन
स्थानीय रोजगार
आपदा जोखिम में कमी
पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन
डिजिटल निगरानी अच्छी पहल है, लेकिन उसे पर्यावरणीय संरक्षण और सामाजिक न्याय के साथ संतुलित करना होगा।
आगे का रास्ता
यदि सरकार सचमुच इस उपलब्धि को ऐतिहासिक बनाना चाहती है तो उसे कुछ ठोस कदम उठाने होंगे:
स्वतंत्र पर्यावरणीय और सामाजिक ऑडिट सार्वजनिक किए जाएँ।
ओवरलोडिंग पर जीरो टॉलरेंस नीति लागू हो।
स्थानीय ग्राम सभाओं को निगरानी तंत्र में औपचारिक भूमिका दी जाए।
खनन राजस्व का निश्चित प्रतिशत प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास और विकास पर खर्च हो।
निष्कर्ष
अवार्ड मंच पर तालियाँ बजना आसान है। कठिन है पहाड़ की नाजुक धड़कनों को समझना।
यदि MDTSS और ई-रवन्ना सचमुच पारदर्शिता लाए हैं, तो उन्हें जनता की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा। अन्यथा यह उपलब्धि भी उन कई घोषणाओं की तरह रह जाएगी जो कागजों और मंचों तक सीमित रह जाती हैं।
उत्तराखंड की जनता को केवल डिजिटल डैशबोर्ड नहीं, सुरक्षित पहाड़, स्वच्छ नदियाँ और सम्मानजनक आजीविका चाहिए। पुरस्कार तभी सार्थक होगा जब विकास का मॉडल प्रकृति और समाज—दोनों के साथ न्याय करे।




