गौशाला राजनीति की भेंट, दल  दल पर तड़पती गौमाता: किच्छा में आखिर कब जागेगा प्रशासन?गौभक्ति केवल पोस्टरों तक सीमित?

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किच्छा विधानसभा के शांतिपुरी क्षेत्र से सामने आई यह तस्वीर केवल कुछ घायल गोवंशों की पीड़ा भर नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति, प्रशासनिक संवेदनहीनता और जनप्रतिनिधियों के खोखले वादों का जीवंत आईना बन चुकी है। शांतिपुरी नं०-2 और शांतिपुरी नं०-3 ग्राम सभा क्षेत्र में चार से पांच घायल गोवंश कई दिनों से असहाय अवस्था में तड़प रहे हैं। कोई सड़क किनारे पड़ा है, कोई दलदल में फंसा हुआ मौत और जिंदगी के बीच संघर्ष कर रहा है। लेकिन जिन नेताओं ने चुनाव के समय “गौ माता” के नाम पर वोट मांगे थे, वे आज इन बेसहारा पशुओं की सुध लेने तक नहीं पहुंचे।
इसी बीच शांतिपुरी निवासी उमेश चन्द्र जोशी ने जिस प्रकार व्यक्तिगत प्रयासों से दलदल में फंसे गोवंश को बचाने का प्रयास किया, वह न केवल मानवता का उदाहरण है बल्कि उन तमाम जनप्रतिनिधियों और सरकारी तंत्र के लिए एक करारा तमाचा भी है, जो करोड़ों की योजनाओं और घोषणाओं के बावजूद धरातल पर शून्य साबित हुए हैं। एक आम नागरिक अपने संसाधनों और सीमित क्षमता में घायल पशुओं को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, जबकि सत्ता में बैठे लोग फोटो खिंचवाने और भाषण देने में व्यस्त हैं।
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गौशाला राजनीति की भेंट, सड़क पर तड़पती गौमाता: किच्छा में आखिर कब जागेगा प्रशासन?
रुद्रपुर/किच्छा।उत्तराखंड में वर्षों से “गौ संरक्षण” राजनीति का सबसे बड़ा धार्मिक और भावनात्मक मुद्दा रहा है। चुनाव आते हैं तो बड़े-बड़े मंचों से गौशालाओं के निर्माण के वादे किए जाते हैं, गाय को “माता” कहकर संस्कृति और सनातन की दुहाई दी जाती है, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वही गौमाता सड़कों, खेतों और दलदल में मरने के लिए छोड़ दी जाती है। किच्छा विधानसभा का शांतिपुरी क्षेत्र इस समय इसी कड़वी सच्चाई का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है।
शांतिपुरी नं०-2 और शांतिपुरी नं०-3 ग्राम सभा क्षेत्र में इन दिनों कई घायल और असहाय गोवंश बदहाली की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। कोई सड़क किनारे घावों से कराह रहा है तो कोई भूख और प्यास से तड़प रहा है। स्थिति इतनी भयावह है कि एक गोवंश दलदल में फंस गया, जिसे निकालने के लिए स्थानीय निवासी उमेश चन्द्र जोशी को स्वयं आगे आना पड़ा। सवाल यह है कि आखिर सरकारी तंत्र कहां है? पशुपालन विभाग कहां है? स्थानीय प्रशासन कहां है? और सबसे बड़ा सवाल — आखिर वे जनप्रतिनिधि कहां हैं जो चुनावों में गौ सेवा के नाम पर वोट मांगते हैं?
घोषणाओं में बनी गौशालाएं, जमीन पर गायब
किच्छा विधानसभा में गौशाला निर्माण को लेकर वर्षों से घोषणाएं होती रही हैं। हर सरकार ने दावा किया कि आवारा पशुओं की समस्या का स्थायी समाधान किया जाएगा। करोड़ों रुपये की योजनाओं का दावा हुआ, बैठकों में प्रस्ताव पास हुए, अधिकारियों ने फाइलें आगे बढ़ाईं, लेकिन परिणाम क्या निकला? आज भी गायें सड़कों पर मर रही हैं।
जनता पूछ रही है कि आखिर उन योजनाओं का पैसा गया कहां? यदि गौशालाएं बनीं तो उनमें पशु क्यों नहीं हैं? यदि नहीं बनीं तो जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि धार्मिक भावनाओं के साथ खुला खिलवाड़ है।
किसान परेशान, सड़कें बनीं मौत का जाल
आवारा पशुओं की समस्या केवल धार्मिक या सामाजिक मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह किसानों और आम जनता की सुरक्षा का बड़ा संकट बन चुकी है। शांतिपुरी, किच्छा, लालपुर, दरऊ और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान रातभर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। मेहनत से उगाई गई फसलें आवारा पशु चट कर जाते हैं। कई किसान आर्थिक रूप से टूट चुके हैं।
वहीं दूसरी ओर सड़कों पर घूमते पशु दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं। आए दिन बाइक सवार और छोटे वाहन इन पशुओं से टकराकर घायल हो रहे हैं। कई मामलों में लोगों की जान तक जा चुकी है। लेकिन प्रशासन की प्राथमिकताओं में यह मुद्दा शायद शामिल ही नहीं है।
गौभक्ति केवल पोस्टरों तक सीमित?
सबसे बड़ा कटाक्ष उन नेताओं पर है जो मंचों से “गौ माता हमारी आस्था है” कहकर तालियां बटोरते हैं। यदि वास्तव में गौ माता आस्था होतीं, तो क्या उन्हें इस तरह सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता? क्या घायल पशु घंटों तक तड़पते रहते? क्या गौशाला निर्माण केवल चुनावी घोषणा बनकर रह जाता?
जनता अब पूछने लगी है कि आखिर गौभक्ति केवल भाषणों और पोस्टरों तक ही सीमित क्यों है? सत्ता में बैठे लोग धार्मिक भावनाओं का राजनीतिक उपयोग तो कर लेते हैं, लेकिन जब वास्तविक सेवा का समय आता है तो पूरा तंत्र गायब हो जाता है।
प्रशासन की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार प्रशासन और संबंधित विभागों को सूचना दी गई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल आश्वासन मिला। घायल पशुओं को न उपचार मिला, न आश्रय। पशु चिकित्सा विभाग की टीमें मौके पर पहुंचने में देरी करती हैं और नगर निकाय जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालते रहते हैं।
यदि एक आम नागरिक उमेश चन्द्र जोशी अपने व्यक्तिगत प्रयासों से गोवंश को बचाने की कोशिश कर सकता है, तो क्या जिला प्रशासन के पास इतने भी संसाधन नहीं कि वह तत्काल रेस्क्यू टीम भेज सके?
उमेश चन्द्र जोशी बने मानवता की मिसाल
जहां नेता और प्रशासन मौन हैं, वहीं शांतिपुरी निवासी उमेश चन्द्र जोशी ने जो कार्य किया, वह समाज के लिए प्रेरणा है। उन्होंने न केवल घायल गोवंशों की स्थिति को सार्वजनिक किया बल्कि स्वयं मौके पर पहुंचकर दलदल में फंसे पशु को बचाने का प्रयास किया। उनका कहना है कि यदि समय रहते गौशाला और स्थायी व्यवस्था नहीं बनाई गई, तो आने वाले समय में स्थिति और भयावह होगी।
उनकी मांग बिल्कुल उचित है कि शांतिपुरी, धारनगर और किच्छा क्षेत्र में तत्काल एक स्थायी गौशाला बनाई जाए, जहां घायल और आवारा गोवंशों को सुरक्षित आश्रय मिल सके। यह केवल धार्मिक दायित्व नहीं बल्कि सामाजिक और मानवीय जिम्मेदारी भी है।
जनता अब जवाब चाहती है
अब सवाल केवल एक गौशाला का नहीं है। सवाल यह है कि क्या सरकार और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही केवल चुनाव तक सीमित है? क्या धार्मिक मुद्दे केवल वोट लेने का माध्यम बन चुके हैं? क्या प्रशासन तब जागेगा जब कोई बड़ी दुर्घटना होगी?
किच्छा विधानसभा की जनता अब जवाब चाहती है।
जनता जानना चाहती है—
गौशाला निर्माण की घोषणाएं अब तक अधूरी क्यों हैं?
घायल गोवंशों के लिए स्थायी रेस्क्यू व्यवस्था क्यों नहीं है?
पशुपालन विभाग और स्थानीय निकाय कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे?
किसानों को आवारा पशुओं से राहत कब मिलेगी?
और सबसे महत्वपूर्ण — गौ माता के नाम पर राजनीति कब बंद होगी?
यदि अब भी सरकार और प्रशासन नहीं जागे, तो आने वाले समय में जनता का आक्रोश और बड़ा रूप ले सकता है। क्योंकि यह केवल पशुओं का मामला नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और व्यवस्था की सच्चाई का प्रश्न बन चुका है।


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