रुद्रपुर में खड़ी होली की परंपरा और पटवाल दंपति का स्नेहिल निमंत्रण

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रुद्रपुर,उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर में यदि किसी उत्सव ने लोकजीवन, संगीत और सामाजिक एकता को एक सूत्र में पिरोया है, तो वह है खड़ी होली।  खड़ी होली केवल रंगों का उत्सव ,  सुरों, संस्कारों और सामूहिक आनंद का अद्भुत संगम है। रुद्रपुर जैसे मैदानी शहर में भी जब पहाड़ की यह परंपरा जीवंत होती है, तो प्रवासी उत्तराखंडवासियों के हृदय में अपने गांव, अपने देवता और अपनी बोली की स्मृतियाँ हिलोरें मारने लगती हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड) एक


इसी सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखने का सुंदर प्रयास हर वर्ष 28 फरवरी को शाम 7 बजे से विजडम पब्लिक स्कूल के परिसर में देखने को मिलता है। लोकसंस्कृति के पुनर्जीवन का एक उत्सव है। इस वर्ष भी प्रतिष्ठित समाजसेवी दंपति श्रीमती सुधा पटवाल और श्री गोपाल सिंह पटवाल ने सपरिवार सभी सम्मानित मित्रों को सादर आमंत्रित किया है। उनका यह होली मिलन समारोह रुद्रपुर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
खड़ी होली: सुरों में बसी भक्ति और उल्लास
कुमाऊँ की खड़ी होली की परंपरा सदियों पुरानी है। इसमें होली गाने वाले सफेद वस्त्र पहनकर गोल घेरा बनाते हैं और तबले, ढोलक व मंजीरे की मधुर थाप पर राग-रागिनियों में होली गाते हैं। यह परंपरा विशेष रूप से Uttarakhand के कुमाऊँ क्षेत्र में विकसित हुई और धीरे-धीरे Rudrapur जैसे नगरों तक पहुँची।
यहाँ होली केवल “अबीर-गुलाल” का खेल नहीं है, बल्कि भगवानों की स्तुति, राधा-कृष्ण की लीलाओं और शिव-पार्वती के दिव्य प्रसंगों का गायन है। खड़ी होली में भक्ति की गंभीरता और उत्सव की मस्ती का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। इसमें किसी भी प्रकार की उच्छृंखलता या भांग का स्थान नहीं होता; केवल संगीत, शालीनता और पारिवारिक आत्मीयता का वातावरण होता है।
विजडम पब्लिक स्कूल का प्रांगण: संस्कृति का संगम स्थल
रुद्रपुर के भीतर विजडम पब्लिक स्कूल का परिसर बीते कुछ वर्षों में पर्वतीय संस्कृति के एक जीवंत मंच के रूप में उभरा है। जब शाम ढलती है और मंच पर होली के पारंपरिक गीतों की धुनें गूंजती हैं, तो मानो पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठता है।
यह आयोजन इस बात का प्रतीक है कि प्रवासी समाज अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। आधुनिक शिक्षा और तकनीकी प्रगति के बीच भी जब परंपराओं को सम्मान मिलता है, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपनी संस्कृति से परिचित होती हैं।
पटवाल दंपति की आत्मीय पहल
समाज में ऐसे परिवार कम होते हैं, जो निजी स्तर पर सांस्कृतिक आयोजनों की परंपरा को जीवित रखने का संकल्प लेते हैं। श्री गोपाल सिंह पटवाल और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सुधा पटवाल का यह आयोजन केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक साधना है।
विशेष रूप से श्रीमती सुधा पटवाल द्वारा अपने हाथों से बनाए गए रसगुल्लों की चर्चा हर वर्ष होती है। होली के रंगों के साथ जब मिठास घुलती है, तो वह स्वाद केवल जिह्वा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हृदय तक उतर जाता है। पकोड़ों की गरमाहट और रसगुल्लों की कोमल मिठास इस उत्सव को और भी यादगार बना देती है।
कल आयोजन में व्यंजनों की पूरी श्रृंखला आत्मीयता के साथ परोसी जाती है, तो वह सामाजिक समरसता को और सुदृढ़ करती है। पटवाल दंपति के यहाँ होली के अवसर पर परोसे जाने वाले व्यंजन उसी प्रेम और सम्मान का प्रतीक हैं।
पर्वतीय होली: सांस्कृतिक एकता का संदेश
रुद्रपुर में पर्वतीय समाज की संख्या बड़ी है। यहाँ विभिन्न जिलों से आए लोग रहते हैं—अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, नैनीताल और चंपावत से आए परिवार। ऐसे में खड़ी होली का आयोजन उन्हें एक मंच पर जोड़ता है।
यह आयोजन सामाजिक भेदभाव से परे एक ऐसा वातावरण बनाता है, जहाँ सभी एक साथ बैठकर सुर में सुर मिलाते हैं। न कोई ऊँच-नीच, न कोई राजनीतिक मतभेद—सिर्फ संगीत, संस्कृति और सौहार्द।
आज के समय में जब समाज कई स्तरों पर विभाजित होता दिखता है, ऐसे सांस्कृतिक आयोजन सामाजिक एकता का संदेश देते हैं। होली का असली रंग तभी चढ़ता है, जब उसमें मनों की दूरी मिटती है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और आधुनिक मनोरंजन के प्रभाव में है। ऐसे समय में खड़ी होली जैसे पारंपरिक आयोजनों का महत्व और बढ़ जाता है। जब बच्चे अपने माता-पिता और दादा-दादी के साथ बैठकर पारंपरिक होली सुनते हैं, तो उनके भीतर सांस्कृतिक गर्व की भावना विकसित होती है।
यह आवश्यक है कि विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से ऐसी परंपराओं को प्रोत्साहन मिले। विजडम पब्लिक स्कूल के परिसर में यह आयोजन होना इस बात का संकेत है कि शिक्षा और संस्कृति का समन्वय संभव है।
होली का असली अर्थ
होली का अर्थ केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि मन के विकारों को जलाकर प्रेम और सौहार्द की स्थापना करना है। खड़ी होली में जो भक्ति का स्वर गूंजता है, वह हमें यही सिखाता है कि उत्सव में भी मर्यादा और संयम का महत्व है।
पटवाल दंपति द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम इसी संदेश को सुदृढ़ करता है। यहाँ होली का रंग शालीनता के साथ चढ़ता है, मिठास रिश्तों में घुलती है और संगीत के माध्यम से आत्मिक आनंद मिलता है।
एक सामूहिक प्रतीक्षा
रुद्रपुर में पर्वतीय होली की धूम मच चुकी है। लोगों को हर वर्ष इस आयोजन का इंतजार रहता है। यह केवल एक शाम का कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूरे वर्ष की सांस्कृतिक स्मृतियों का उत्सव है।
28 फरवरी की शाम जब सात बजे विजडम पब्लिक स्कूल का प्रांगण सुरों से गूंजेगा, तब यह केवल होली नहीं होगी—यह पहाड़ की आत्मा का उत्सव होगा।
पर्वतीय  होली हमारी पहचान, हमारी जड़ों और हमारे सामाजिक संबंधों को मजबूत करते हैं। श्रीमती सुधा पटवाल और श्री गोपाल सिंह पटवाल का यह प्रयास निश्चय ही सराहनीय है।
जो लोग पर्वतीय संस्कृति की मिठास, रसगुल्लों का स्वाद और खड़ी होली का असली रंग अनुभव करना चाहते हैं, उनके लिए यह आयोजन एक अवसर है—अपनों के बीच बैठकर संस्कृति के सुरों में डूब जाने का।
होली का यह रंग वर्षों तक यूँ ही खिलता रहे, यही शुभकामना है।


“राधा संग खेलन लागी होली”

रंगीलो फागुन आयो रे,
बरसाणौं मैं ढोल बजायो रे।
नंदलाला बाँसुरी बजाय,
राधा संग खेलन लागी होली रे॥
अरी राधा हँसदी-खेलदी,
गालां मैं गुलाल सजेदी।
श्याम रंग चढ़ो गयो चूनर मा,
ब्रज मैं छाई ग्यो ठिठोली रे॥
सुधा भाभी गुनगुन गावे,
कृष्ण नाम रस बरसावे।
मन मन्दिर दीया जळावा,
प्रेम की होली खेळो न्योली रे॥
गोपाल पटवाल संग भक्ति रंग मा,
जीवन भरै आनंद ढंग मा।
राधा-कृष्ण कृपा बरसां,
घर आंगन फूली चम्पोली रे॥
फागुन आई ग्यो खुशियाली,
रंग-रस बरसै हर डाली।
जय-जय राधे, जय कन्हैया,
गूंजे गाउँ मैं होली रे॥


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