परंपरा, संस्कृति और सामूहिक उल्लास का संगम — विजयलक्ष्मी एनक्लेव में पुरुष खड़ी होली एवं महिला होली का भव्य आयोजन

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रुद्रपुर। उत्तराखंड की सांस्कृतिक परंपराओं में होली  लोकजीवन की आत्मा का उत्सव , विशेष रूप से कुमाऊं अंचल की खड़ी होली अपनी विशिष्ट शैली, शास्त्रीयता और सामूहिकता के कारण देशभर में अलग पहचान रखती है। इसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए रुद्रपुर के विजयलक्ष्मी एनक्लेव, गंगापुर रोड (नैनीताल बैंक के सामने) में 2 मार्च 2026, सोमवार को खड़ी होली एवं महिला होली का भव्य आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन को लेकर क्षेत्रवासियों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है।
कार्यक्रम के आयोजक त्रिभुवन जोशी एवं कमल जोशी ने समस्त होली प्रेमियों को व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित करते हुए इसे सांस्कृतिक एकता का पर्व बताया है। उन्होंने कहा कि खड़ी होली केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हमारी जड़ों से जुड़ने का माध्यम है। यह वह अवसर है जब समाज का हर वर्ग—बच्चे, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं—एक साथ बैठकर संगीत, भक्ति और पारंपरिक लोकधुनों के माध्यम से आपसी प्रेम और भाईचारे को सुदृढ़ करते हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


महिला होली: सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का सशक्त मंच
2 मार्च को दोपहर 3 बजे विजयलक्ष्मी एनक्लेव स्थित मटका पार्क में महिला होली कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी महिला होली को विशेष स्वरूप दिया गया है। महिला होली  सांस्कृतिक प्रस्तुति , महिलाओं की रचनात्मकता, आत्मविश्वास और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक बन चुकी है।
कुमाऊं क्षेत्र में महिला होली की परंपरा वर्षों पुरानी है, जिसमें महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सुसज्जित होकर बैठकी शैली में होली गीत गाती हैं। इन गीतों में राधा-कृष्ण की लीलाएं, ऋतु परिवर्तन का उल्लास और सामाजिक सरोकारों की झलक मिलती है। विजयलक्ष्मी एनक्लेव में होने वाला यह आयोजन भी उसी परंपरा को जीवंत करेगा।
आयोजकों ने सभी होली प्रेमी भाई-बहनों से समय पर उपस्थित होकर इस सांस्कृतिक आयोजन को सफल बनाने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि महिला होली का यह मंच समाज में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को सम्मान देने का भी अवसर है।
खड़ी होली: लोक परंपरा का जीवंत रूप
इसी दिन सायं 7 बजे से खड़ी होली का आयोजन त्रिभुवन जोशी के निवास स्थान पर किया जाएगा। कुमाऊं की खड़ी होली की विशेषता यह है कि इसमें प्रतिभागी एक गोल घेरे में खड़े होकर ढोलक और मंजीरे की ताल पर सामूहिक रूप से होली गीत गाते हैं। गीतों की प्रस्तुति में शास्त्रीय रागों की झलक भी दिखाई देती है, जो इसे अन्य होली शैलियों से अलग बनाती है।
खड़ी होली की शुरुआत पारंपरिक रूप से भगवान श्रीकृष्ण के स्मरण से होती है। फाल्गुन मास की मादकता और बसंत की सुगंध के साथ जब “आज बिरज में होली रे रसिया” जैसे गीत गूंजते हैं, तो वातावरण भक्तिमय और उल्लासपूर्ण हो उठता है। यह आयोजन न केवल सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का प्रयास है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी लोकपरंपराओं से जोड़ने का भी माध्यम है।
प्रवास में संस्कृति का संरक्षण
रुद्रपुर जैसे औद्योगिक नगर में जहां विभिन्न राज्यों और संस्कृतियों के लोग आकर बसे हैं, वहां अपनी क्षेत्रीय परंपराओं को जीवित रखना चुनौतीपूर्ण कार्य है। ऐसे में विजयलक्ष्मी एनक्लेव का यह आयोजन एक प्रेरणास्पद उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह कार्यक्रम दर्शाता है कि प्रवास में भी अपनी जड़ों से जुड़ाव संभव है, यदि समाज सामूहिक प्रयास करे।
उत्तराखंड की खड़ी होली की परंपरा विशेष रूप से कुमाऊं क्षेत्र में विकसित हुई है। अल्मोड़ा, नैनीताल और पिथौरागढ़ जैसे क्षेत्रों में यह लोकपरंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। आज रुद्रपुर में भी उसी सांस्कृतिक विरासत की गूंज सुनाई दे रही है।
सामाजिक समरसता का संदेश
होली का पर्व सामाजिक समरसता और भाईचारे का प्रतीक है। यह वह अवसर है जब मन के मैल को धोकर आपसी कटुता को समाप्त किया जाता है। खड़ी होली की सामूहिक गायन शैली स्वयं में लोकतांत्रिक भाव को प्रकट करती है—जहां सभी एक स्वर में गाते हैं और कोई ऊंच-नीच का भेद नहीं रहता।
वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे सांस्कृतिक आयोजन लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करते हैं। यह आयोजन केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि संवाद, सहभागिता और सामूहिक आनंद का माध्यम है।
नई पीढ़ी के लिए सीख
आज की युवा पीढ़ी तेजी से आधुनिकता की ओर अग्रसर है। डिजिटल युग में लोकसंस्कृति का संरक्षण तभी संभव है जब ऐसे आयोजनों के माध्यम से युवाओं को अपनी परंपराओं से जोड़ा जाए। खड़ी होली और महिला होली जैसे कार्यक्रम युवाओं को यह संदेश देते हैं कि आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ चल सकते हैं।
आयोजकों ने विशेष रूप से युवाओं से आग्रह किया है कि वे इस आयोजन में बढ़-चढ़कर भाग लें और अपने बुजुर्गों से होली गीतों की परंपरा को सीखें। यह सांस्कृतिक धरोहर तभी जीवित रह सकती है जब नई पीढ़ी इसे आत्मसात करे।
सामूहिक प्रयास से बने यादगार आयोजन
त्रिभुवन जोशी और कमल जोशी ने इस आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी सहयोगियों का आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। सभी से निवेदन है कि इस निमंत्रण को व्यक्तिगत समझें और अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर आयोजन को यादगार बनाएं।
उन्होंने यह भी अपील की है कि कार्यक्रम में समय का विशेष ध्यान रखा जाए, ताकि सभी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां सुचारू रूप से संपन्न हो सकें। महिला होली दोपहर 3 बजे और खड़ी होली सायं 7 बजे से आरंभ होगी।

विजयलक्ष्मी एनक्लेव, गंगापुर रोड, रुद्रपुर में आयोजित होने जा रहे खड़ी होली एवं महिला होली कार्यक्रम केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना का उत्सव है। यह आयोजन हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है, सामाजिक समरसता का संदेश देता है और नई पीढ़ी को अपनी लोकसंस्कृति से परिचित कराता है।
रंगों के इस पावन पर्व पर जब ढोलक की थाप और होली गीतों की मधुर स्वर लहरियां वातावरण में गूंजेंगी, तब यह आयोजन निश्चित रूप से सभी के लिए अविस्मरणीय बन जाएगा।
होली के इस शुभ अवसर पर यही कामना है कि यह आयोजन प्रेम, सौहार्द और सांस्कृतिक गौरव का संदेश पूरे नगर में प्रसारित

आजु खेलौं होली नंदलाला,
ब्रज में धूम मचाई रे…
इसमें ब्रज की होली और राधा-कृष्ण के रंगोत्सव का सुंदर चित्रण होता है।
2. “कैले बजी मुरुली मधुबन में”
यह गीत श्रृंगार और भक्ति का अद्भुत संगम है।
कैले बजी मुरुली मधुबन में,
रंग झमक्यो फागुन आयो…
3. “फागुन आयो रे”
फागुन के आगमन और प्रकृति के उल्लास को दर्शाता गीत।
फागुन आयो रे, रंग बरसाणो आयो रे…
4. बैठकी होली की एक पंक्ति
बैठकी होली प्रायः शास्त्रीय रागों जैसे भैरवी, काफी, जैजैवंती आदि में गाई जाती है—
“जोगीरा सा रा रा…” के साथ इसकी तानें वातावरण को भक्तिमय बना देती हैं।
5. खड़ी होली
ढोलक और हुड़के की थाप पर गाई जाती है—
“अरे खेलन चलो होरी ग्वाला,
रंग गुलाल उड़ायो…”


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