गुरुग्राम में साहित्यिक सचेतना का तृतीय वार्षिकोत्सव “सनातन साहित्य सम्मान एवं समागम” संपन्न

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250 से अधिक साहित्यकारों, विचारकों और सनातन प्रेमियों की गरिमामयी उपस्थिति
गुरुग्राम की पावन भूमि पर रविवार, 15 मार्च 2026 को साहित्यिक सचेतना एवं स्वास्तिक मासिक पत्रिका के तत्वावधान में “सचेतना तृतीय वार्षिकोत्सव- सनातन साहित्य सम्मान एवं समागम” का भव्य आयोजन यादव कल्याण परिषद, श्रीकृष्ण मंदिर परिसर, सेक्टर-10A में सम्पन्न हुआ। इस गरिमामयी आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों, कवियों, चिंतकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा सनातन संस्कृति के प्रति समर्पित नागरिकों सहित लगभग 250 से अधिक लोगों ने सहभागिता की, जिसमें सभी को टीका, स्वास्तिकचिन्ह वाला कलावा, मोरपँख वाला बैज आदि से स्वागत गया।

कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय सनातन संस्कृति के वैदिक सिद्धांतों, अद्वैत दर्शन और यथार्थ ज्ञान को साहित्यिक अभिव्यक्ति तथा वैचारिक संवाद के माध्यम से समाज तक पहुँचाना था। साहित्यिक सचेतना मंच को विश्व का पहला ऐसा साहित्यिक मंच बताया गया जो सनातन दर्शन, अध्यात्म, विज्ञान और सतधर्म के सिद्धांतों पर आधारित दैनिक लेखन, साप्ताहिक वैचारिक संवाद और स्वास्तिक मासिक पत्रिका के प्रकाशन के माध्यम से इस विचारधारा को निरंतर आगे बढ़ा रहा है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

कार्यक्रम का शुभारम्भ मंचासीन अतिथियों में विशिष्ट अतिथि श्री ज्ञानसिंह रावत जी एवं साहित्यकारों द्वारा दीप प्रज्वलन, शंखनाद और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुआ। इसके उपरांत गणेश वंदना और सरस्वती वंदना की प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम का संचालन संस्था की राष्ट्रीय महासचिव प्रीति डिमरी ‘प्रीत’ जी ने क्रमबद्ध रूप से किया, जिसमें देशभर से आए साहित्यकारों ने काव्यपाठ और वैचारिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया।

कार्यक्रम में अनेक साहित्यकारों को उनके साहित्यिक योगदान के लिए आत्मज्ञान सम्मान का “ॐचिन्ह का सुन्दर मोमेंटो, प्रशस्ति-पत्र, मोती माला, फूलमाला और शॉल देकर सम्मानित किया गया। सम्मानित साहित्यकारों में प्रमुख रूप से शारदा ओझा, शारदा कनोरिया, राम सिंह भंडारी, राय सिंह भंडारी, मोहन सिंह, निशा अतुल्य, डॉ. नीरजा मेहता ‘कमलिनी’, डॉ. नेहा शर्मा ‘नेह’, सावित्री भारतीय, श्रवण कुमार बाजपेयी,, यशोदा मैठाणी ‘चेतना’, योगेश गहतोड़ी ‘यश’, मीरा मोहन, सतेंद्र शर्मा ‘तरंग’, रानी रावल ‘रुद्रश्री’, किरण कांडपाल ‘काव्या’, अंजनी कुमार, नीलम कौशिक, उर्मिला पपनोई ‘श्रीजा’, जयश्री सिंघल ‘कृति’, मंगेश सिंह ‘आशुकवि’ योगेश्वरी भारद्वाज जी तथा देवेंद्र राघव ‘देव’ सहित अनेक साहित्यकार शामिल रहे।

कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण चरण “सृष्टिदर्शन” ग्रंथ के विमोचन का रहा। यह ग्रंथ साहित्यिक सचेतना के संस्थापक एवं मार्गदर्शक नरेंद्र रावत ‘नरेन’ द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण दार्शनिक कृति है, जिसमें सनातन दर्शन, अध्यात्म, विज्ञान और सतधर्म के सिद्धांतों को समन्वित दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। ग्रंथ विमोचन के उपरांत अपने उद्बोधन में उन्होंने “ॐ तत् सत्” के वैदिक और दार्शनिक महत्व को विस्तार से समझाते हुए कहा कि यह त्रिवचन ब्रह्म के रहस्यमय संकेत हैं, जिनके माध्यम से वेद, यज्ञ और ब्रह्मज्ञान की परंपरा का आधार निर्मित हुआ।
उन्होंने बताया कि ‘ॐ’ सृष्टि की मूल ध्वनि है, ‘तत्’ परम तत्त्व का संकेत है और ‘सत्’ उस अंतिम सत्य का प्रतीक है जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। उन्होंने उपनिषदों और वेदों के उदाहरण देते हुए सनातन दर्शन की अद्वैत अवधारणा को स्पष्ट किया तथा कहा कि साहित्यिक सचेतना का उद्देश्य इसी यथार्थज्ञान को समाज तक पहुँचाना है।

कार्यक्रम के दौरान संगठनात्मक विस्तार से संबंधित महत्वपूर्ण घोषणाएँ भी की गईं। इस अवसर पर प्रीति डिमरी ‘प्रीत’ को औपचारिक रूप से साहित्यिक सचेतना का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया गया। इसके अतिरिक्त संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त बनाने के लिए विभिन्न पदाधिकारियों की नियुक्तियाँ भी घोषित की गईं।

इन नियुक्तियों में जयश्री सिंघल ‘कृति’ को राष्ट्रीय प्रवक्ता, यशोदा मैठाणी ‘चेतना’ को राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख और योगेश गहतोड़ी ‘यश’ को राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी बनाया गया। इसी प्रकार विभिन्न राज्यों के लिए भी प्रदेश प्रभारी, सहप्रभारी और संगठन मंत्रियों की नियुक्तियाँ की गईं ताकि संगठन की गतिविधियाँ देशभर में सक्रिय रूप से संचालित हो सकें।

कार्यक्रम में कई साहित्यकारों को उनकी रचनात्मक पहचान को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से उपनाम अलंकरण भी प्रदान किए गए। जयश्री सिंघल को ‘कृति’, यशोदा मैठाणी को ‘चेतना’, राय सिंह भंडारी को ‘चैतन्य’, योगेश गहतोड़ी को ‘यश’, किरण कांडपाल को ‘काव्या’, और नीलम कौशिक को ‘आकृति’ उपनाम प्रदान किए गए।

कार्यक्रम में विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधियों तथा पत्रकारों की उपस्थिति भी रही। अतिथियों ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्यिक सचेतना जैसे मंच वर्तमान समय में अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि वे साहित्य, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना को समाज में जीवित रखने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
समापन अवसर पर आयोजकों ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों, पत्रकारों और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि साहित्यिक सचेतना केवल एक साहित्यिक मंच नहीं बल्कि एक वैचारिक और आध्यात्मिक अभियान है जिसका उद्देश्य व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र में सकारात्मक चेतना का विस्तार करना है और राष्ट्र में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्रतिष्ठा हो।

इस अवसर पर उपस्थित सभी प्रतिभागियों ने इस आयोजन को एक प्रेरणादायक और सार्थक पहल बताते हुए भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों के निरंतर आयोजन की अपेक्षा व्यक्त की।

संपर्क :

देवेंद्र राघव ‘देव’
प्रदेश प्रभारी (हरियाणा) एवं कार्यक्रम संयोजक
मोबाइल : 8800626464

योगेश गहतोड़ी ‘यश’
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी
मोबाइल : 9810092532

नरेंद्र रावत ‘नरेन’
संस्थापक एवं मार्गदर्शक
मोबाइल : 7060099222

प्रीति डिमरी ‘प्रीत’
राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं संपादिका
मोबाइल : 9458119749

साहित्यिक सचेतना एवं स्वास्तिक मासिक पत्रिका
Email : info@sachetna.net
Website : www.sachetna.netगुरुग्राम में आयोजित “सनातन साहित्य सम्मान एवं समागम” केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का प्रयास है। ऐसे समय में जब समाज तेजी से भौतिकता की ओर बढ़ रहा है, साहित्य और सनातन दर्शन पर आधारित मंच वैचारिक संतुलन प्रदान करते हैं। 250 से अधिक साहित्यकारों और चिंतकों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि भारतीय परंपरा, अध्यात्म और वैदिक विचारधारा के प्रति आज भी गहरी आस्था मौजूद है।
“साहित्यिक सचेतना” द्वारा संवाद, लेखन और वैचारिक विमर्श के माध्यम से सनातन ज्ञान को समाज तक पहुँचाने का प्रयास सराहनीय है। विशेष रूप से “सृष्टिदर्शन” जैसे ग्रंथों का विमोचन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे मंच साहित्य को समाज और युवा पीढ़ी से और अधिक जोड़ें, ताकि सांस्कृतिक मूल्यों की निरंतरता बनी रहे।

गुरुग्राम में आयोजित “सनातन साहित्य सम्मान एवं समागम” केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का प्रयास है। ऐसे समय में जब समाज तेजी से भौतिकता की ओर बढ़ रहा है, साहित्य और सनातन दर्शन पर आधारित मंच वैचारिक संतुलन प्रदान करते हैं। 250 से अधिक साहित्यकारों और चिंतकों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि भारतीय परंपरा, अध्यात्म और वैदिक विचारधारा के प्रति आज भी गहरी आस्था मौजूद है।
“साहित्यिक सचेतना” द्वारा संवाद, लेखन और वैचारिक विमर्श के माध्यम से सनातन ज्ञान को समाज तक पहुँचाने का प्रयास सराहनीय है। विशेष रूप से “सृष्टिदर्शन” जैसे ग्रंथों का विमोचन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे मंच साहित्य को समाज और युवा पीढ़ी से और अधिक जोड़ें, ताकि सांस्कृतिक मूल्यों की निरंतरता बनी रहे।


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