

उत्तराखंड की राजनीति में 20 मार्च का दिन एक अहम मोड़ लेकर आया, जब पुष्कर सिंह धामी की मौजूदगी में राज्यपाल गुरमीत सिंह ने पांच नए मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। लंबे इंतजार के बाद हुआ यह मंत्रिमंडल विस्तार केवल प्रशासनिक जरूरत भर नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपे राजनीतिक संकेत कहीं अधिक गहरे नजर आते हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
खाली पदों से भरा गया राजनीतिक समीकरण
संवैधानिक प्रावधानों के तहत 12 मंत्रियों की सीमा वाले कैबिनेट में अब तक केवल 7 मंत्री ही कार्यरत थे। चंदन रामदास के निधन और प्रेमचंद अग्रवाल के इस्तीफे के बाद पांच पद खाली थे। सवाल यह है कि जब ये पद लंबे समय से खाली थे, तो इन्हें भरने में इतनी देर क्यों की गई? क्या शासन को गति देने की जरूरत अब अचानक महसूस हुई, या फिर यह निर्णय सीधे तौर पर 2027 के विधानसभा चुनाव से जुड़ा हुआ है?
चेहरों के पीछे का गणित
नए मंत्रियों—खजान दास, भारत चौधरी, राम सिंह कैड़ा, मदन कौशिक और प्रदीप बत्रा—का चयन केवल उनके अनुभव के आधार पर नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखकर किया गया प्रतीत होता है। दलित, ब्राह्मण, ठाकुर और व्यापारी वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर भाजपा ने एक व्यापक सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश की है।
मगर यहां एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या यह चयन विकास की जरूरतों के आधार पर हुआ, या फिर वोट बैंक की मजबूती के लिए?
देरी से मिला अवसर या सीमित कार्यकाल?
इन मंत्रियों को अब ऐसे समय पर जिम्मेदारी सौंपी गई है, जब चुनाव में लगभग एक वर्ष का समय शेष है। ऐसे में यह तर्क भी उठता है कि यदि इन्हें पहले अवसर दिया जाता, तो वे अपने-अपने विभागों में ठोस कार्य कर सकते थे। अब जबकि समय सीमित है, तो क्या यह कार्यकाल केवल उद्घाटन, दौरे और स्वागत-सम्मानों तक सीमित रह जाएगा?
जनता के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि आने वाले महीनों में ये मंत्री पूरे प्रदेश में भ्रमण, बधाई समारोह और राजनीतिक नेटवर्क मजबूत करने में व्यस्त रहेंगे, जबकि वास्तविक विकास कार्य पीछे छूट सकते हैं।
विकास बनाम ‘व्यवस्था का विस्तार’
उत्तराखंड आज जिन समस्याओं से जूझ रहा है—बेरोजगारी, पलायन, अवैध खनन, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली—क्या यह मंत्रिमंडल विस्तार इन मुद्दों का समाधान देगा?
राज्य में भर्ती घोटालों, युवाओं के रोजगार संकट, और चर्चित आपराधिक घटनाओं जैसे अंकिता भंडारी हत्याकांड ने पहले ही सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि क्या नए मंत्री इन मुद्दों पर ठोस कार्रवाई करेंगे, या फिर यह विस्तार केवल राजनीतिक प्रबंधन तक सीमित रहेगा।
जनता की भूमिका और राजनीतिक यथार्थ
सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि उत्तराखंड की राजनीति में जनता भी एक चक्र का हिस्सा बन चुकी है—चुनाव के समय भावनाओं में बहकर समर्थन देना और फिर पांच साल तक शिकायत करना। यह प्रवृत्ति न केवल लोकतंत्र को कमजोर करती है, बल्कि राजनीतिक दलों को भी जवाबदेही से दूर कर देती है।
विकास की उम्मीद या राजनीतिक निवेश?
मंत्रिमंडल विस्तार को यदि सकारात्मक नजरिए से देखा जाए, तो यह प्रशासनिक मजबूती की दिशा में एक कदम हो सकता है। लेकिन समय, परिस्थितियां और चयन की प्रक्रिया इसे एक “चुनावी निवेश” के रूप में भी प्रस्तुत करती हैं।
इन पांचों मंत्रियों को शुभकामनाएं—लेकिन असली कसौटी अब शुरू होती है।
क्या वे सीमित समय में जनता के विश्वास पर खरे उतरेंगे, या फिर यह कार्यकाल केवल राजनीतिक लाभ और व्यक्तिगत विकास तक सिमट कर रह जाएगा?
उत्तराखंड की जनता को अब केवल घोषणाओं नहीं, बल्कि परिणामों का इंतजार है।




