

उत्तराखंड “सृष्टिदर्शन” —आध्यात्म, विज्ञान और सनातन दर्शन के संगम को समर्पित ग्रंथ “सृष्टिदर्शन” ने प्रकाशन के पहले ही सप्ताह में एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल कर ली है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म Amazon पर यह पुस्तक इतनी तेजी से लोकप्रिय हुई कि इसका Paperback संस्करण पूरी तरह OUT OF STOCK हो गया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
यह केवल एक पुस्तक की बिक्री का मामला नहीं, बल्कि बदलती बौद्धिक और आध्यात्मिक चेतना का संकेत भी है। ऐसे समय में जब समाज विज्ञान और अध्यात्म को अक्सर विरोधी ध्रुवों के रूप में देखता है, “सृष्टिदर्शन” ने दोनों को एक ही सत्य की अलग-अलग अभिव्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत कर नई बहस को जन्म दिया है।
विचार से चेतना तक की यात्रा
लेखक Narendra Rawat ‘नरेन’ द्वारा रचित यह ग्रंथ सृष्टि को केवल धार्मिक या वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि चेतना के समग्र विकास के रूप में समझने का प्रयास करता है। इसमें ईश्वर से जीव, प्रकृति, पदार्थ, वनस्पति, पशु और मानव तक की यात्रा को एक सतत चेतनात्मक प्रवाह के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक यह भी स्पष्ट करती है कि सच्चा धर्म, विज्ञान और अध्यात्म — तीनों अंततः एक ही सत्य के विभिन्न आयाम हैं, जो मनुष्य को बाहरी संसार से जोड़ते हुए अंततः ब्रह्म तक ले जाते हैं।
पाठकों की उत्सुकता और बढ़ती मांग
“सृष्टिदर्शन” को पाठकों से मिले अभूतपूर्व प्रेम ने इसे एक विचार-आंदोलन का रूप दे दिया है। विशेषकर युवा वर्ग, शोधकर्ता और आध्यात्मिक जिज्ञासु इस पुस्तक को लेकर उत्साहित नजर आ रहे हैं। यही कारण है कि बाजार में आते ही इसकी सभी प्रतियां समाप्त हो गईं।
eBook बना विकल्प
Paperback फिलहाल उपलब्ध नहीं है, लेकिन प्रकाशक ने आश्वासन दिया है कि नया स्टॉक जल्द ही उपलब्ध कराया जाएगा। तब तक पाठकों के लिए इसका eBook संस्करण उपलब्ध है, जिसे पढ़कर इस ज्ञानयात्रा से जुड़ा जा सकता है।
संपादकीय दृष्टि
“सृष्टिदर्शन” की सफलता यह संकेत देती है कि भारतीय समाज में आज भी गहराई से सोचने, समझने और अपनी जड़ों से जुड़ने की ललक मौजूद है। यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि उस आंतरिक जागरण का प्रतीक बनती जा रही है, जिसकी आवश्यकता आज के भौतिकवादी दौर में पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।
यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले समय में ऐसे साहित्य न केवल बाजार में सफल होंगे, बल्कि समाज की वैचारिक दिशा को भी प्रभावित करेंगे।
“सृष्टिदर्शन” — सच में केवल ग्रंथ नहीं, चेतना का दर्पण बनता नजर आ रहा है।




