चार साल बेमिसाल या शिलान्यास का जाल? 2027 से पहले वादों की बाढ़ पर सवाल”

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पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में परेड ग्राउंड में “जन-जन की सरकार, चार साल बेमिसाल” कार्यक्रम भले ही आंकड़ों की चमक से सजा मंच हो, लेकिन क्या यह जमीनी हकीकत का आईना भी है—या फिर 2027 चुनाव से पहले सजाया गया एक राजनीतिक मेला?
देहरादून के परेड ग्राउंड से एक साथ 99.44 करोड़ के शिलान्यास और 302.42 करोड़ के लोकार्पण की घोषणाएं सुनने में भले ही विकास का महाकाव्य लगें, पर सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की जनता अब सिर्फ घोषणाओं से संतुष्ट हो जाएगी? या फिर इन “लोकार्पणों” की परतें हटाने पर अधूरे कामों की सच्चाई सामने आएगी?
नमामि गंगे के तहत एसटीपी निर्माण से लेकर सीवर लाइन, बाढ़ सुरक्षा, नहरों के जीर्णोद्धार और सड़कों के अपग्रेडेशन तक—कागजों में सब कुछ व्यवस्थित और प्रभावशाली दिखता है। लेकिन देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोग जानते हैं कि सीवर योजनाएं सालों तक अधूरी पड़ी रहती हैं, बरसात में सड़कें बह जाती हैं और बाढ़ सुरक्षा के नाम पर हर साल नई योजनाएं बनती हैं, लेकिन खतरा जस का तस बना रहता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


सबसे बड़ा सवाल शिलान्यास पर है। हर चुनाव से पहले शिलान्यास की बाढ़ आ जाती है। पत्थर लग जाते हैं, फोटो खिंच जाती हैं, लेकिन जमीन पर काम शुरू भी होता है या नहीं—यह कोई नहीं पूछता। जनता के बीच अब यह धारणा बन चुकी है कि “शिलान्यास” का मतलब विकास नहीं, बल्कि एक राजनीतिक लॉलीपॉप है—जिसे चुनाव तक चूसते रहो, बाद में भूल जाओ।
क्या कारण है कि जिन नहरों के जीर्णोद्धार का शिलान्यास आज हो रहा है, उन्हीं नहरों के लिए पहले भी योजनाएं बनी थीं? क्या कारण है कि हर साल बाढ़ सुरक्षा के नाम पर करोड़ों खर्च होते हैं, लेकिन गांवों में हर मानसून में डर कायम रहता है? क्या कारण है कि सड़कों का “अपग्रेडेशन” बार-बार होता है, लेकिन गड्ढे कभी खत्म नहीं होते?
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी यही कहानी है। नए भवनों का निर्माण जरूर हो रहा है, लेकिन क्या शिक्षकों की कमी दूर हुई? क्या अस्पतालों में डॉक्टर और संसाधन पर्याप्त हैं? 100 बेड के अस्पताल की घोषणा से क्या स्वास्थ्य सेवाएं सुधर जाएंगी, या वह भी एक अधूरी इमारत बनकर रह जाएगी?
असल सवाल यह नहीं है कि कितनी योजनाओं का लोकार्पण हुआ—बल्कि यह है कि कितनी योजनाएं समय पर पूरी हुईं, कितनी गुणवत्तापूर्ण हैं, और कितनी वास्तव में जनता के जीवन को बदल रही हैं।
2027 के चुनाव नजदीक हैं, और यह दौर शिलान्यासों का स्वर्णकाल बनने वाला है। हर गांव, हर शहर में नई घोषणाएं होंगी, नए पत्थर लगेंगे, नए वादे किए जाएंगे। लेकिन जनता अब जागरूक है। वह पूछेगी—पिछले शिलान्यासों का क्या हुआ?
अगर विकास सिर्फ मंचों और भाषणों तक सीमित रहेगा, तो यह “चार साल बेमिसाल” नहीं बल्कि “चार साल सवालों के जाल” बन जाएगा।
सरकार के लिए यह आत्ममंथन का समय है—क्योंकि अब जनता को लॉलीपॉप नहीं, जवाब चाहिए।


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