हरदा की “खांसी” या कांग्रेस की चेतावनी? उत्तराखंड कांग्रेस में उभरता अंतर्विरोध

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उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर हरीश रावत (हरदा) केंद्र में हैं—और इस बार वजह कोई चुनावी रैली नहीं, बल्कि उनका एक भावनात्मक लेकिन तीखा फेसबुक पत्र है। यह पत्र सिर्फ व्यक्तिगत पीड़ा का इज़हार नहीं, बल्कि प्रदेश कांग्रेस के भीतर simmer कर रहे असंतोष का सार्वजनिक विस्फोट भी है।
हरदा ने अपने “अर्जित अवकाश” को लेकर खड़े हुए विवाद पर दुख जताते हुए साफ कहा कि वे पार्टी पर बोझ नहीं बनना चाहते, लेकिन उनकी राजनीतिक सक्रियता और मुद्दों पर बेबाक राय देने की आदत खत्म नहीं होगी।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

उनके शब्द—“यह एक ऐसा बूढ़ा है, जो गलत होने पर खांसेगा ही”—दरअसल एक चेतावनी हैं, उन नेताओं के लिए जो उन्हें हाशिये पर धकेलने की कोशिश कर रहे हैं।
त्याग, अनुभव और आखिरी चुनावी संकल्प
हरीश रावत ने अपने पत्र में यह भी दोहराया कि वे पहले ही 2027 का विधानसभा चुनाव न लड़ने का निर्णय ले चुके हैं। बढ़ती उम्र को स्वीकारते हुए उन्होंने खुद को सीमित करने की बात कही, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस की जीत के लिए वे अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे। उनके अनुसार, 2027 उनके लिए कांग्रेस को सत्ता में लाने का “अंतिम अवसर” है।
यह बयान महज भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि पार्टी नेतृत्व के लिए एक संकेत है कि अनुभव और जनाधार को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
अंदरूनी घमासान: दो खेमों में बंटी कांग्रेस
वर्तमान घटनाक्रम ने उत्तराखंड कांग्रेस को स्पष्ट रूप से दो खेमों में बांट दिया है। एक तरफ हरदा समर्थक हैं, तो दूसरी ओर प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, चुनाव प्रचार और प्रबंधन से जुड़े नेता हरक सिंह रावत जैसे चेहरे खुलकर सामने आ गए हैं।
हरक सिंह रावत द्वारा की गई तीखी टिप्पणियों ने विवाद को और हवा दी है। परिणामस्वरूप, पार्टी की “छीछालेदर” सार्वजनिक मंचों और मीडिया में साफ दिखाई दे रही है—जो चुनावी साल के पहले किसी भी विपक्षी दल के लिए खतरनाक संकेत है।
“सिपाही को गाली नहीं दी जाती” – हरदा का तंज
हरदा ने अपने आलोचकों को जवाब देते हुए लिखा कि “मोर्चे पर लड़ने वाला सिपाही हार जाता है तो उसे गाली नहीं दी जाती।” यह पंक्ति सीधे उन नेताओं पर निशाना है जो उनके अनुभव और योगदान पर सवाल उठा रहे हैं।
साथ ही उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि मीडिया या सोशल मीडिया में उनका “सार्वजनिक ट्रायल” जारी रहा, तो वे घर बैठने को मजबूर हो सकते हैं—जो कांग्रेस के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।
मान-मनौव्वल की राजनीति: डैमेज कंट्रोल शुरू
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पार्टी के भीतर डैमेज कंट्रोल की कवायद तेज हो गई है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने हरदा से मुलाकात कर हालात पर चर्चा की। उन्होंने साफ कहा कि वर्तमान घटनाक्रम से पार्टी को नुकसान हो रहा है और सभी को सामूहिक निर्णयों का सम्मान करना चाहिए।
अब निगाहें कुमारी सैलजा के उत्तराखंड दौरे पर टिकी हैं, जिनसे हरदा की मुलाकात प्रस्तावित है। यह मुलाकात तय करेगी कि पार्टी भीतर के इस संकट से उबर पाएगी या नहीं।
परिवारवाद और नई पीढ़ी का सवाल
हरदा ने अपने ऊपर लगे परिवारवाद के आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वे लगातार नए खून को पार्टी में जोड़ने और युवाओं को आगे बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं। रामनगर के नेता संजय नेगी को लेकर भी उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट की।
यहां एक दिलचस्प विरोधाभास दिखता है—एक ओर उन्हें “पुराना चेहरा” बताकर किनारे करने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी ओर वे खुद युवाओं को आगे लाने की बात कर रहे हैं।
चेतावनी को समझे कांग्रेस
यह पूरा प्रकरण सिर्फ एक नेता की नाराजगी नहीं है, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी का आईना है। हरीश रावत का पत्र कांग्रेस के लिए एक चेतावनी है—अगर समय रहते आंतरिक मतभेद नहीं सुलझाए गए, तो 2027 की लड़ाई शुरू होने से पहले ही कमजोर पड़ सकती है।
हरदा की “खांसी” को नजरअंदाज करना शायद कांग्रेस के लिए आसान हो, लेकिन उसके राजनीतिक परिणामों को नजरअंदाज करना संभव नहीं होगा।


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