उत्तराखंड में टीबी का विस्फोट: दावों की चमक के पीछे सड़ती हकीकत?पहाड़ों में बीमारी का साम्राज्य: जिम्मेदार कौन? “टीबी मुक्त उत्तराखंड” सिर्फ एक नारा

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उत्तराखंड में टीबी का बढ़ता खतरा, 4216 गांवों में स्वास्थ्य संकट गहराया
उत्तराखंड में ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। राज्य के 4216 गांवों को उच्च जोखिम श्रेणी में चिन्हित किया गया है, जहां हर साल लगभग 28 हजार नए मरीज सामने आ रहे हैं। हरिद्वार, चमोली, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, नैनीताल और पिथौरागढ़ जैसे जिले विशेष रूप से प्रभावित हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


स्थिति को नियंत्रित करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने व्यापक स्क्रीनिंग अभियान शुरू किया है। 14 लाख ग्रामीणों की जांच का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें अब तक करीब 5 लाख लोगों की स्क्रीनिंग पूरी हो चुकी है। इसके लिए 33 पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें भेजी गई हैं और 19 और जल्द उपलब्ध होंगी।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 91 प्रतिशत मरीजों को इलाज मिलने का दावा किया गया है, साथ ही मरीजों को हर माह 1000 रुपये की पोषण सहायता दी जा रही है। राज्य में 13 जिला टीबी केंद्र, 98 ब्लॉक यूनिट और 157 जांच केंद्र संचालित हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि कुपोषण, कमजोर स्वास्थ्य सेवाएं और समय पर जांच की कमी इस बीमारी के फैलाव के प्रमुख कारण हैं। सरकार ने “टीबी मुक्त पंचायत” अभियान भी शुरू किया है, लेकिन बढ़ते आंकड़े व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

उत्तराखंड की वादियों को अक्सर “देवभूमि” कहकर उसकी सुंदरता का गुणगान किया जाता है, लेकिन इन्हीं पहाड़ों के बीच एक खामोश महामारी जड़ें जमा चुकी है—ट्यूबरक्लोसिस (टीबी)। हर साल करीब 28 हजार नए मरीजों का सामने आना और 4216 गांवों का जोखिम के दायरे में आना सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की पोल खोलने वाला कड़वा सच है।
सरकार जहां एक ओर “टीबी मुक्त भारत” के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड के हालात यह सवाल खड़ा करते हैं—
क्या ये योजनाएं कागजों तक सीमित हैं?
क्या पहाड़ों की जनता सिर्फ आंकड़ों का हिस्सा बनकर रह गई है?
पहाड़ों में बीमारी का साम्राज्य: जिम्मेदार कौन?
हरिद्वार से लेकर चमोली, पौड़ी, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ तक—लगभग पूरा उत्तराखंड टीबी के शिकंजे में है। सवाल यह नहीं कि बीमारी क्यों फैल रही है, बल्कि सवाल यह है कि सरकार अब तक सो क्यों रही थी?
विशेषज्ञ जिन कारणों की बात कर रहे हैं, वो कोई नई खोज नहीं हैं—
कुपोषण
स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
दुर्गम क्षेत्रों में डॉक्टरों की अनुपलब्धता
शुरुआती लक्षणों की अनदेखी
जांच और इलाज में देरी
लेकिन यह सब तो सालों से है।
फिर सरकार ने पहले क्या किया?
“91% इलाज” का दावा या आंकड़ों का खेल?
सरकार यह दावा कर रही है कि 91% मरीजों को समय पर इलाज मिल रहा है।
लेकिन जमीनी सच्चाई इससे अलग कहानी कहती है—
गांवों में आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डॉक्टर विहीन हैं
कई जगहों पर एक्स-रे मशीनें धूल खा रही हैं
मरीजों को इलाज के लिए किलोमीटरों पैदल चलना पड़ता है
ऐसे में 91% इलाज का आंकड़ा कहीं फाइलों में तैयार की गई सफलता तो नहीं?
14 लाख जांच का लक्ष्य: अब जागी सरकार?
जब हालात हाथ से निकलने लगे, तब सरकार ने 14 लाख लोगों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य रखा।
अब तक केवल 5 लाख की जांच हो पाई है—यानी अभी भी 10 लाख लोग इंतजार में हैं।
सवाल यह है कि:
क्या यह अभियान समय रहते शुरू नहीं हो सकता था?
क्या सरकार को महामारी का इंतजार था?
पोषण सहायता: राहत या दिखावा?
टीबी मरीजों को हर महीने 1000 रुपये देने की योजना सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन—
क्या 1000 रुपये में आज के समय में पोषण संभव है?
क्या यह राशि समय पर मिलती भी है?
ग्रामीण क्षेत्रों में कई मरीज बताते हैं कि भुगतान में देरी आम बात है, जिससे इलाज प्रभावित होता है।
 ढांचा है, लेकिन असर नहीं
सरकार गिनाती है—
13 जिला टीबी केंद्र
98 ब्लॉक यूनिट
157 जांच केंद्र
131 आधुनिक मशीनें
लेकिन असली सवाल:
अगर सिस्टम इतना मजबूत है, तो मरीज बढ़ क्यों रहे हैं?
यह साफ संकेत है कि समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि प्रबंधन और इच्छाशक्ति की है।
‘टीबी मुक्त पंचायत’—जमीन पर या सिर्फ नारे में?
“टीबी मुक्त पंचायत” अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन—
क्या पंचायत स्तर पर जागरूकता है?
क्या स्थानीय प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित किया गया है?
क्या निगरानी की कोई मजबूत व्यवस्था है?
अक्सर ऐसे अभियान फोटो और प्रेस रिलीज तक सीमित रह जाते हैं।
सरकार पर सीधा सवाल
उत्तराखंड सरकार को अब जवाब देना होगा—
आखिर क्यों हजारों गांव टीबी की चपेट में हैं?
क्यों स्वास्थ्य ढांचा होने के बावजूद बीमारी फैल रही है?
क्यों पहाड़ों में आज भी इलाज एक चुनौती है?
यह सिर्फ स्वास्थ्य विभाग की नाकामी नहीं, बल्कि
पूरे शासन तंत्र की विफलता है।

✍️ देवभूमि या बीमारभूमि?
उत्तराखंड आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे यह तय करना होगा कि—
वह सिर्फ पर्यटन और धार्मिक छवि तक सीमित रहेगा
या
अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को भी प्राथमिकता देगा
अगर अब भी सरकार नहीं जागी, तो आने वाले वर्षों में टीबी का यह संकट
महामारी का रूप ले सकता है।
(संपादकीय टिप्पणी)
सरकार को आंकड़ों की बाजीगरी छोड़कर जमीनी सच्चाई स्वीकार करनी होगी।
पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाओं का वास्तविक सुदृढ़ीकरण, पोषण पर ठोस नीति, और जवाबदेही तय किए बिना

“टीबी मुक्त उत्तराखंड” सिर्फ एक नारा बनकर रह जाएगा।


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