

रुद्रपुर/देहरादून।नोएडा में श्रम विभाग द्वारा लेबर कानूनों के उल्लंघन पर की गई बड़ी कार्रवाई ने औद्योगिक राज्यों में हलचल मचा दी है। मजदूरों का वेतन, बोनस और ओवरटाइम रोकने के आरोप में 25 और ठेकेदारों के लाइसेंस रद्द किए जाने के साथ ही कुल 49 ठेकेदारों पर कार्रवाई हो चुकी है। विभाग द्वारा 250 से अधिक ठेकेदारों को नोटिस जारी किए गए थे, जिनमें दोषी पाए गए या जवाब न देने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए गए हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
साथ ही इन्हें ब्लैकलिस्ट करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। अधिकारियों ने संबंधित कंपनियों को निर्देश दिए हैं कि मजदूरों का बकाया वेतन सीधे उनके बैंक खातों में जमा कराया जाए।
इस सख्त कार्रवाई के बाद उत्तराखंड के औद्योगिक क्षेत्रों, खासकर सिडकुल पंतनगर और हरिद्वार में श्रम शोषण के मुद्दे एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। यहां लंबे समय से मजदूरों द्वारा न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान, ओवरटाइम न मिलने, वेतन में कटौती और देरी, तथा ठेकेदारों की मनमानी जैसे गंभीर आरोप लगाए जाते रहे हैं।
स्थानीय श्रमिकों का कहना है कि कई कंपनियों में ठेकेदारी प्रथा के नाम पर मजदूरों का शोषण आम बात बन चुकी है। मजदूरों का आरोप है कि काम पूरा कराने के बाद भी पूरा भुगतान नहीं किया जाता और विरोध करने पर नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है।
महिला श्रमिकों की स्थिति को लेकर भी चिंताएं सामने आ रही हैं। सूत्रों के अनुसार कुछ औद्योगिक इकाइयों में कार्यरत महिलाओं के साथ उत्पीड़न के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं, जिनमें सुपरवाइजर और ठेकेदारों की मिलीभगत की बात भी कही जाती है। इसको लेकर महिला आयोग से औद्योगिक क्षेत्रों में गुप्त जांच कराने की मांग उठ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नोएडा की तर्ज पर उत्तराखंड में भी सख्त निरीक्षण और कार्रवाई की जाए, तो कई ठेकेदारों और कंपनियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
वहीं, श्रमिक संगठनों का कहना है कि श्रम विभाग को केवल नोटिस जारी करने तक सीमित न रहकर ठोस कार्रवाई करनी चाहिए। मजदूरों को उनका पूरा वेतन, ओवरटाइम और कानूनी अधिकार दिलाना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है।
अब देखना होगा कि नोएडा की इस कार्रवाई के बाद उत्तराखंड का श्रम विभाग किस तरह का रुख अपनाता है और क्या यहां के मजदूरों को भी उनके अधिकार दिलाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।




