पौड़ी गढ़वाल। हिमालय की गोद में बसी देवभूमि उत्तराखंड एक बार फिर अपनी गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत के कारण चर्चा में है। कण्व आश्रम में जुड़ी चक्रवर्ती सम्राट भरत की पावन गाथा आज भी श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के लिए आस्था का केंद्र बनी हुई है। मान्यता है कि इसी तपोभूमि से “भारत” नाम की प्रेरणा उत्पन्न हुई, जिसने पूरे राष्ट्र की पहचान को आकार दिया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
मालिनी नदी के शांत तट पर स्थित कण्व आश्रम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत प्रयोगशाला रहा है। यहीं शकुंतला का पालन-पोषण कण्व ऋषि के सान्निध्य में हुआ। इसी पावन भूमि पर राजा दुष्यंत और शकुंतला का मिलन हुआ, जिसने इतिहास को एक नया आयाम दिया।
गंधर्व विवाह से जन्मे बालक भरत ने इसी आश्रम में अपने प्रारंभिक वर्ष बिताए। पौराणिक कथाओं के अनुसार, बालक भरत बचपन से ही अद्भुत साहस के प्रतीक थे। वे जंगलों में निडर होकर शेरों के साथ खेलते और उनके दांत गिनते थे, जिसके कारण उन्हें ‘सर्वदमन’ की उपाधि मिली। यह प्रसंग केवल एक कथा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की उस संस्कृति का प्रतीक है, जहां तप, त्याग और शौर्य का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
समय के साथ जब राजा दुष्यंत को अपनी स्मृतियां लौटीं, तो वे कण्व आश्रम पहुंचे और शकुंतला व भरत को ससम्मान हस्तिनापुर ले गए। आगे चलकर भरत ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की और अपनी न्यायप्रियता व धर्मनिष्ठा से पूरे आर्यावर्त को एक सूत्र में बांध दिया। उनके ही नाम पर इस देश को “भारतवर्ष” कहा गया, जो आज भी हमारी राष्ट्रीय पहचान का मूल आधार है।
धार्मिक ग्रंथ महाभारत और विष्णु पुराण में इस कथा का विस्तार से उल्लेख मिलता है, जो इस बात को प्रमाणित करता है कि “भारत” नाम केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है।
देवभूमि उत्तराखंड की महत्ता केवल इस कथा तक सीमित नहीं है। यही वह भूमि है जहां बद्रीनाथ धाम, केदारनाथ धाम, गंगोत्री धाम और यमुनोत्री धाम जैसे विश्वप्रसिद्ध तीर्थ स्थित हैं। यहां की हर नदी, हर पर्वत और हर वन किसी न किसी दिव्य कथा से जुड़ा हुआ है।
स्थानीय श्रद्धालुओं और विद्वानों का मानना है कि कण्व आश्रम केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी एक मार्गदर्शक है। यह स्थल हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और यह संदेश देता है कि सच्चा राष्ट्र निर्माण केवल शक्ति से नहीं, बल्कि संस्कार, न्याय और एकता से होता है।
आज जब कण्व आश्रम को पर्यटन और धार्मिक आस्था के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, तब इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करना समय की आवश्यकता है। यह केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की पहचान से जुड़ा हुआ विषय है।
देवभूमि की यह पावन कथा एक बार फिर यह स्मरण कराती है कि उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का केंद्र है—जहां से न केवल धर्म और अध्यात्म, बल्कि राष्ट्र की पहचान भी जन्म लेती है।

