संपादकीय: भक्त बनाम अंधभक्त — उत्तराखंड की राजनीति का आत्ममंथन

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उत्तराखंड, जिसे देवभूमि कहा जाता है, वहां की राजनीति में “भक्ति” और “अंधभक्ति” का प्रश्न केवल राजनीतिक बहस  सामाजिक और आध्यात्मिक चिंतन का विषय बन चुका है। यहां के जनमानस में धर्म, आस्था और नैतिकता की गहरी जड़ें हैं, इसलिए राजनीतिक निष्ठा भी अक्सर भावनात्मक रूप ले लेती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


भारतीय परंपरा में भगवान राम और भगवान कृष्ण ने स्पष्ट किया कि सच्ची भक्ति वह है, जिसमें सत्य, धर्म और न्याय के प्रति समर्पण हो। लेकिन जब यही भक्ति विवेकहीन समर्थन में बदल जाती है, तो वह “अंधभक्ति” बन जाती है—जो व्यक्ति, दल या नेता की हर सही-गलत बात को बिना सवाल स्वीकार कर लेती है।
उत्तराखंड की मौजूदा राजनीति में यह प्रवृत्ति विभिन्न दलों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। भारतीय जनता पार्टी हो, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस या क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल—हर जगह समर्थकों का एक वर्ग ऐसा है जो पार्टी से ऊपर उठकर विचार नहीं करता। यह स्थिति लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करती है, क्योंकि सवाल पूछने की संस्कृति ही खत्म होने लगती है।
राजनीति में “भक्त” होना गलत नहीं है। किसी विचारधारा, नीति या नेता के प्रति विश्वास लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन जब यही विश्वास आलोचना की क्षमता को खत्म कर देता है, तब वह लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाता है। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में, जहां पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे गंभीर मुद्दे हैं, वहां अंधभक्ति इन समस्याओं से ध्यान भटका देती है।
आज जरूरत इस बात की है कि जनता खुद से सवाल पूछे—क्या हम विचारों के समर्थक हैं या व्यक्तियों के? क्या हम अपने नेताओं से जवाबदेही मांगते हैं या केवल उनके समर्थक बने रहते हैं?
देवभूमि की पहचान आस्था विवेक से  है। यदि जनता जागरूक “भक्त” बनेगी, तो राजनीति में पारदर्शिता और जवाबदेही स्वतः आएगी। अन्यथा “अंधभक्ति” का अंधकार लोकतंत्र की मूल आत्मा को कमजोर करता रहेगा।


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