दिल्ली के कश्मीरी गेट इलाके में यमुना बाजार में रह रहे 310 परिवार के लोगों की नींद उड़ गई है. यमुना किनारे निगम बोध घाट के पास इस बस्ती में 310 परिवार के सैकड़ों लोग रहते हैं.

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इन लोगों को दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से घर खाली करने का नोटिस करने मिला है. लोगों को 15 दिनों का समय दिया गया है. अब लोगों की चिंता यह है कि मात्र 15 दिन में वो अपना घर छोड़कर कहां जाएंगे. इस इलाके के ज्यादातर लोग श्मशान घाट पर कर्मकांड कराने वाले पुरोहित हैं. कुछ अन्य लोग भी है. इन लोगों का कहना है कि वो पीढ़ियों से यहां रहते आए हैं.

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

DDMA ने 15 दिनों में घर खाली करने का दिया नोटिस

दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) ने गुरुवार को कश्मीरी गेट इलाके में यमुना बाजार के निवासियों को बेदखली नोटिस जारी किए. बेदखली नोटिस के मुताबिक निवासियों को अपना सामान हटाने और स्वेच्छा से क्षेत्र खाली करने के लिए 15 दिन समय दिया गया है. साथ ही चेतावनी दी गई है कि ऐसा न करने पर, ‘अतिक्रमण’ हटाने के लिए ध्वस्तीकरण अभियान चलाया जाएगा.

नोटिस जारी होने के बीच निवासियों का कहना है कि उन्हें न केवल अपने घर खोने का डर है, बल्कि बेदखली के साथ सदियों से चली आ रही नदी तट की पूरी संस्कृति के लुप्त हो जाने का भी डर है. दूसरी ओर सरकार का कहना है कि यह दिल्ली का सबसे निचला इलाका है. यहां डीडीए की जमीन पर अवैध कब्जा किया गया था. बाढ़ आने पर सबसे पहले यह इलाका डूब जाता है.

DDMA द्वारा जारी किया गया नोटिस.

पुरोहित सुनील शर्मा बोले- 200 साल से यहां रह रहा हमारा परिवार

यमुना बाजार के पास निगमबोध घाट पर पुरोहित सुनील शर्मा ने कहा, ”मेरा परिवार लगभग 200 वर्षों से यहां रह रहा है, और हमारे पास ऐसे नक्शे और अभिलेख भी हैं जो एक सदी से अधिक समय से यहां हमारी उपस्थिति को प्रमाणित करते हैं. हमने अपने पूर्वजों से सुना है कि ये घाट कभी जाति के आधार पर विभाजित थे और परिवारों की यमुना से जुड़ी अपनी पारंपरिक भूमिकाएं थीं.”

शर्मा ने बताया कि उनका परिवार घाटों के पास ही पुरोहित के रूप में यमुना की आरती करता है, निगमबोध घाट पर अंतिम संस्कार कराता है और नदी से जुड़े अन्य अनुष्ठान करता है.

महिला बोलीं- दशकों से यहां रहता आया है परिवार

निगम बोध घाट की सातवीं पीढ़ी की निवासी पुष्पा रानी ने बताया कि उनका परिवार दशकों से यहीं रह रहा है. पिछले दो सालों में ही यमुना का जलस्तर खतरनाक रूप से बढ़ा है, जिसके कारण उन्हें अपना सामान घरों की छतों या अन्य सुरक्षित जगहों पर ले जाना पड़ा है. उन्होंने आगे कहा कि 15 दिनों के भीतर इस जगह को खाली करना बेहद मुश्किल काम है. यहां के बच्चे पास के ही स्कूलों में पढ़ने जाते हैं, और घर के पुरुष सदस्य घाट पर पंडित का काम करते हैं; इस तरह, उनका जीवन कई मायनों में यमुना से ही जुड़ा हुआ है. उनका कहना है कि लोगों को बेदखल करने से पहले, सरकार को सबसे पहले यमुना के पुनरुद्धार (साफ़-सफ़ाई और सुधार) पर ध्यान देना चाहिए.

स्थानीय विधायक के साथ उपराज्यपाल से मिलेंगे लोग

घाट की देख-रेख करने वाले 10 सदस्यों के एक परिवार से ताल्लुक रखने वाले भारत लाल शर्मा (78) ने सरकार से बेहतर पुनर्वास की मांग की है. उन्होंने बताया कि कल, स्थानीय निवासी MLA परमजीत सैनी के साथ मिलकर उपराज्यपाल (Lieutenant Governor) से मुलाक़ात करेंगे, ताकि दिल्ली सरकार के इस आदेश के संबंध में अपनी चिंताओं और मुद्दों को उनके सामने रख सकें.

नोटिस दिखाते यमुना बाजार के स्थानीय निवासी.

’60 परिवार ऐसे, जिनका इतिहास 100 साल से अधिक पुराना’

उन्होंने कहा, ”यह सिर्फ हमारे लिए एक जगह नहीं है, यह हमारी और शहर की विरासत है.” सुनील शर्मा, जो यमुना घाट पंडा एसोसिएशन से भी जुड़े हुए हैं. उन्होंने कहा कि लगभग 60 परिवार ऐसे हैं जिनका इतिहास 100 साल से भी अधिक पुराना है और वे अब भी इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं.


दिल्ली के यमुना बाजार में 310 परिवारों को डीडीएमए द्वारा 15 दिनों में घर खाली करने का नोटिस दिए जाने के बाद पूरे देश में अतिक्रमण और बुलडोजर कार्रवाई को लेकर बहस तेज हो गई है। निगमबोध घाट के पास रहने वाले कई परिवारों का दावा है कि वे 100 से 200 वर्षों से यहां रह रहे हैं और उनका जीवन यमुना घाटों से जुड़ी धार्मिक परंपराओं पर आधारित है। दूसरी ओर प्रशासन इसे बाढ़ प्रभावित और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा बता रहा है। यह मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं, बल्कि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में चल रही अतिक्रमण विरोधी कार्रवाइयों की व्यापक तस्वीर को सामने लाता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बिना उचित प्रक्रिया और पुनर्वास पर विचार किए बेदखली नहीं होनी चाहिए, लेकिन सरकारी भूमि पर स्थायी अधिकार भी मान्य नहीं है। लेख यह सवाल उठाता है कि दशकों से बसे लोगों का भविष्य क्या होगा और क्या आने वाले समय में देशभर की मलिन बस्तियों पर बुलडोजर कार्रवाई और तेज होगी।

भारत में बुलडोजर अब केवल अतिक्रमण हटाने की मशीन नहीं, बल्कि सख्त प्रशासन और राजनीतिक शक्ति का प्रतीक बन चुका है। दिल्ली के यमुना बाजार में 310 परिवारों को मिले बेदखली नोटिस ने उन लाखों लोगों की चिंता बढ़ा दी है जो वर्षों से सरकारी भूमि पर बसे हुए हैं। उत्तराखंड के रुद्रपुर, खेड़ा, शिवनगर, बिंदुखत्ता और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में पहले भी ऐसी कार्रवाइयां हो चुकी हैं। सरकारों का तर्क है कि अवैध कब्जों वाली बस्तियां अक्सर अपराध, नशे और माफियाओं का अड्डा बन जाती हैं, जबकि स्थानीय लोग इसे अपने अस्तित्व और आजीविका पर हमला मानते हैं। लेख में राजनीतिक पाखंड पर भी सवाल उठाया गया है कि दशकों तक वोट बैंक की राजनीति करने के बाद अचानक लोगों को अवैध घोषित करना कितना न्यायसंगत है। लेख का केंद्रीय संदेश यही है—अगर आपके पास जमीन का कानूनी अधिकार नहीं है, तो “अगली बारी आपकी भी हो सकती है।”

दिल्ली के निगमबोध घाट स्थित यमुना बाजार में रहने वाले परिवारों को जब डीडीएमए ने घर खाली करने का नोटिस दिया, तब यह मामला केवल अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं रहा, बल्कि विरासत, आजीविका और मानवीय संकट का मुद्दा बन गया। यहां रहने वाले पुरोहित परिवार पीढ़ियों से अंतिम संस्कार, यमुना आरती और धार्मिक कर्मकांड से जुड़े हैं। लेकिन प्रशासन का कहना है कि यह इलाका बाढ़ के लिहाज से बेहद संवेदनशील है और सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा है। लेख में बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट कानून के अनुसार पुनर्वास और मानवीय दृष्टिकोण की बात करता है, लेकिन साथ ही सरकारी भूमि पर कब्जे को वैध अधिकार नहीं मानता। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में चल रही बुलडोजर कार्रवाइयों के संदर्भ में यह चेतावनी दी गई है कि आने वाले वर्षों में देशभर की अनियमित कॉलोनियां और मलिन बस्तियां प्रशासनिक कार्रवाई के दायरे में आ सकती हैं। यह बदलते भारत की कठोर सच्चाई को सामने लाता है।

एक स्थानीय ने अकबर के समय से जोड़ा इतिहास

नदी किनारे जीवनरक्षक के तौर पर काम करने वाले स्थानीय निवासी सुरेंद्र (47) ने बताया कि यमुना से उनके परिवार का रिश्ता पीढ़ियों पुराना है. उन्होंने कहा, ”हमारे पूर्वज हमें बताते थे कि हमारा परिवार राजा अकबर के समय से यहां रह रहा है और हमारे पास कम से कम 150 वर्षों से यहां हमारी उपस्थिति के प्रमाण हैं. मेरे पिता पूरे देश में प्रसिद्ध हो गए थे, क्योंकि उन्होंने दिल्ली से मथुरा तक तैरकर यात्रा की थी, जो उस समय कोई और नहीं कर सकता था.”

नीली छतरी मंदिर का ऐतिहासिक महत्व

इस क्षेत्र के इतिहास के संबंध में, इतिहासकार स्वप्ना लिडल ने कहा कि निगमबोध घाट के पास स्थित नीली छतरी मंदिर का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है और इस स्थल के आसपास लंबे समय से मानवीय गतिविधियों का प्रमाण है. उन्होंने कहा, ”निगमबोध घाट के पास स्थित नीली छतरी मंदिर एक बहुत प्राचीन स्थल है. इस क्षेत्र से जुड़े सबसे पुराने ठोस ऐतिहासिक प्रमाण मुगल काल के हैं.”

दिल्ली के निगम बोध घाट की यमुना बाजार कॉलोनी को खाली करने का नोटिस, 310 परिवार हटाए जाएंगे


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