Rudrapur में सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच खेड़ा बस्ती क्षेत्र में सामने आए एक मामले ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। महापौर Vikas Sharma के औचक निरीक्षण के दौरान सरकारी भूमि पर बने एक मकान के भीतर कथित रूप से अवैध मजार बनाए जाने का मामला सामने आया, जिसके बाद प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए निर्माण को सीज कर दिया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
गुरुवार को महापौर विकास शर्मा, एडीएम Pankaj Upadhyay, नगर आयुक्त Shipra Joshi Pandey तथा नगर निगम और प्रशासनिक अधिकारियों की टीम के साथ खेड़ा बस्ती क्षेत्र का निरीक्षण कर रहे थे। इसी दौरान चांद मस्जिद के निकट नदी किनारे सरकारी भूमि पर अतिक्रमण की शिकायत मिलने पर टीम मौके पर पहुंची। निरीक्षण के दौरान पाया गया कि सरकारी भूमि पर बने मकान के भीतर एक मजारनुमा संरचना बनाई गई थी।
प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार पूछताछ में यह जानकारी सामने आई कि संबंधित व्यक्ति ने अपने पिता के निधन के बाद शव को घर के भीतर दफनाकर वहां मजार जैसा स्वरूप दे दिया। साथ ही यह आरोप भी सामने आया कि सरकारी जमीन पर कब्जा कर आसपास प्लॉटिंग और बिक्री का कार्य भी किया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने तत्काल निर्माण को सीज कर आगे की जांच शुरू कर दी।
महापौर विकास शर्मा ने मौके पर कहा कि सरकारी भूमि पर धार्मिक संरचना के नाम पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार अवैध अतिक्रमण के खिलाफ व्यापक अभियान चला रही है और रुद्रपुर में भी ऐसी गतिविधियों पर सख्ती से कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक भावनाओं की आड़ में सरकारी संपत्तियों पर कब्जा करने का प्रयास करेगा तो उसके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
एडीएम पंकज उपाध्याय ने कहा कि पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच कराई जाएगी और यदि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे की पुष्टि होती है तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर विधिक कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि सीज की गई संरचना के ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया भी जल्द शुरू की जा सकती है।
हालांकि इस मामले को लेकर क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। कुछ लोग इसे सरकारी जमीन पर संगठित अतिक्रमण का मामला बता रहे हैं, जबकि कुछ सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग की है ताकि किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक तनाव की स्थिति उत्पन्न न हो।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल अलग राज्य की मांग नहीं था, बल्कि देवभूमि की सांस्कृतिक पहचान, भू-संपदा और मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा का संकल्प भी था। लेकिन विडंबना यह है कि आज प्रदेश की अरबों रुपये मूल्य की सरकारी भूमि अतिक्रमण, भू-माफियाओं और कथित “लैंड जिहाद” जैसी प्रवृत्तियों की भेंट चढ़ती दिखाई दे रही है। धार्मिक ढांचे, फर्जी दस्तावेजों और राजनीतिक संरक्षण के सहारे जमीनों पर कब्जे की घटनाएं राज्य की मूल परिकल्पना पर गंभीर चोट हैं। यदि समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो उत्तराखंड की जनसांख्यिकीय, सांस्कृतिक और भौगोलिक अस्मिता पर गहरा संकट खड़ा हो सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि खेड़ा क्षेत्र में लंबे समय से सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों की शिकायतें उठती रही हैं और अब प्रशासन की कार्रवाई के बाद कई अन्य अतिक्रमणों पर भी जांच की तलवार लटक सकती है।

