रुद्रपुर। चंपावत के बहुचर्चित नाबालिग दुष्कर्म प्रकरण में जिस प्रकार प्रारंभिक आरोपों के आधार पर माहौल गर्माया गया, सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बिना तथ्यों की पुष्टि किए जिस तरह एकतरफा नैरेटिव खड़ा किया गया, अब पुलिस की वैज्ञानिक एवं तकनीकी जांच ने उस पूरे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
चंपावत के चर्चित कथित दुष्कर्म प्रकरण में पुलिस जांच के दौरान साजिश का खुलासा होने का दावा किया गया है। 6 मई 2026 को दर्ज पोक्सो एक्ट के मुकदमे की जांच हेतु एसपी रेखा यादव के निर्देशन में 10 सदस्यीय एसआईटी गठित की गई। पुलिस के अनुसार विवेचना में सामने आया कि नाबालिग युवती विवाह समारोह में अपनी इच्छा से एक दोस्त के साथ गई थी। सीसीटीवी फुटेज, सीडीआर और तकनीकी साक्ष्यों से घटनाक्रम की पुष्टि की गई।
मेडिकल परीक्षण में किसी प्रकार की चोट या जबरदस्ती के संकेत नहीं मिले। साथ ही नामजद आरोपी विनोद सिंह रावत, नवीन सिंह रावत और पूरन सिंह रावत की घटना स्थल पर मौजूदगी भी प्रमाणित नहीं हुई। जांच में कमल रावत द्वारा बदले की भावना से नाबालिग को बहला-फुसलाकर झूठा षड्यंत्र रचने की बात सामने आई है। पुलिस ने बताया कि फॉरेंसिक और डिजिटल साक्ष्यों की जांच जारी है तथा भ्रामक सूचना पाए जाने पर विधिक कार्रवाई की जाएगी।
जिलाधिकारी चंपावत और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रेखा यादव की संयुक्त प्रेसवार्ता ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि मामला जितना दिखाई दे रहा था, वास्तविकता उससे कहीं अधिक जटिल और सुनियोजित हो सकती है।
यह उत्तराखंड पुलिस की पेशेवर कार्यशैली का उदाहरण है कि संवेदनशील मामला होने के बावजूद पुलिस ने भीड़, राजनीति और सोशल मीडिया ट्रायल के दबाव में आकर किसी निर्दोष को अपराधी घोषित नहीं किया। बल्कि तकनीकी साक्ष्य, सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, मेडिकल परीक्षण और परिस्थितिजन्य तथ्यों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया गया।
एसएसपी रेखा यादव ने जिस स्पष्टता के साथ बताया कि नामजद व्यक्तियों की घटना स्थल पर मौजूदगी तक प्रमाणित नहीं हुई, वह उन लोगों के लिए करारा जवाब है जिन्होंने बिना जांच पूरी हुए समाज में जहर घोलने का प्रयास किया।
आज सबसे बड़ा प्रश्न उन तथाकथित सामाजिक ठेकेदारों, राजनीतिक अवसरवादियों और सोशल मीडिया के स्वयंभू न्यायाधीशों पर खड़ा होता है जिन्होंने मामले को हवा देकर लोगों की भावनाओं को भड़काने का काम किया।
यह अत्यंत गंभीर विषय है कि महिला सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों को भी कुछ लोग निजी बदले, राजनीतिक एजेंडे या सामाजिक प्रतिशोध का हथियार बनाने से नहीं चूकते। यदि पुलिस की जांच में यह सिद्ध होता है कि किसी निर्दोष को फंसाने के लिए सुनियोजित षड्यंत्र रचा गया, तो यह केवल कानून के साथ खिलवाड़ नहीं बल्कि वास्तविक पीड़िताओं के संघर्ष को भी कमजोर करने वाला अपराध माना जाएगा।
इस पूरे प्रकरण में चंपावत जिला प्रशासन की भूमिका भी सराहनीय रही। जिलाधिकारी द्वारा पीड़िता की सुरक्षा और देखरेख हेतु मजिस्ट्रेट नियुक्त करना, काउंसिलिंग की व्यवस्था कराना तथा जांच प्रक्रिया को संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाना यह दर्शाता है कि प्रशासन ने महिला एवं बाल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
साथ ही पुलिस प्रशासन ने भी यह स्पष्ट संदेश दिया कि उत्तराखंड में महिला अपराधों पर “जीरो टॉलरेंस” नीति लागू है, लेकिन झूठे और मनगढ़ंत आरोपों को भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज किसी भी घटना पर प्रतिक्रिया देने से पहले तथ्यों की प्रतीक्षा करना सीखे। मीडिया संस्थानों की भी जिम्मेदारी है कि टीआरपी और सनसनी से ऊपर उठकर सत्यापित तथ्यों को ही सामने रखें। क्योंकि बिना पुष्टि के प्रसारित खबरें कई परिवारों की सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य को बर्बाद कर सकती हैं।
यह मामला केवल एक जांच नहीं, बल्कि समाज के लिए आईना भी है।
एक ओर पुलिस और प्रशासन निष्पक्षता से सच्चाई तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग अफवाहों की राजनीति कर सामाजिक तनाव पैदा करने में लगे रहते हैं। ऐसे तत्वों पर भी कानूनी कार्रवाई उतनी ही जरूरी है जितनी किसी वास्तविक अपराधी पर।
यदि उत्तराखंड को न्यायप्रिय और संवेदनशील राज्य बनाना है, तो कानून पर भरोसा रखना होगा, न कि भीड़तंत्र और अफवाहों पर। चंपावत प्रकरण में अब तक सामने आए तथ्य यही बताते हैं कि सत्य देर से सही, लेकिन सामने अवश्य आता है।

