उत्तराखंड की सांसें रोकता पर्यटन: क्या अब “पर्यटक टैक्स” की जरूरत है?

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उत्तराखंड भारत के मैदानी इलाकों में जैसे ही गर्मी अपने चरम की ओर बढ़ती है, वैसे ही लोगों का रुख पहाड़ों की ओर मुड़ जाता है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य लाखों पर्यटकों की पहली पसंद बन जाते हैं। उत्तराखंड में मसूरी, नैनीताल, औली, धनौल्टी, चकराता, रानीखेत और चारधाम यात्रा मार्गों पर इन दिनों जिस तरह का दबाव देखने को मिल रहा है, वह केवल पर्यटन की बढ़ती लोकप्रियता की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे संकट का संकेत भी है जो धीरे-धीरे पहाड़ों की मूल आत्मा को निगल रहा है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


उत्तराखंड की सड़कों पर आज जो दृश्य दिखाई दे रहे हैं, वे किसी पर्यटन राज्य की सफलता के प्रतीक कम और अव्यवस्था के प्रतीक अधिक बनते जा रहे हैं। घंटों लंबा जाम, सड़क किनारे फेंका गया कूड़ा, पहाड़ों की शांत वादियों में गाड़ियों के हॉर्न का शोर, और स्थानीय लोगों की दिनचर्या का ठप हो जाना—यह सब मिलकर एक गंभीर प्रश्न खड़ा करते हैं कि क्या उत्तराखंड अनियंत्रित पर्यटन का बोझ उठाने के लिए बना है?
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि उत्तराखंड में और अधिक पर्यटक आएं, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि जो पर्यटक आएं, वे जिम्मेदार हों, नियमों का पालन करें और राज्य की अर्थव्यवस्था में वास्तविक योगदान दें। इसी संदर्भ में अब समय आ गया है कि उत्तराखंड सरकार “प्रति व्यक्ति पर्यटन टैक्स” और “अनिवार्य पर्यटन पास” जैसी व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करे।
पर्यटन या यातायात का आतंक?
गर्मी की शुरुआत होते ही उत्तराखंड के पहाड़ी शहरों का हाल किसी महानगर से भी बदतर हो जाता है। मसूरी में प्रवेश करने के लिए कई-कई घंटे लग जाते हैं। नैनीताल की सड़कों पर वाहन रेंगते हुए दिखाई देते हैं। चारधाम यात्रा मार्गों पर स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि स्थानीय लोग अस्पताल तक समय पर नहीं पहुंच पाते।
विडंबना यह है कि जिन पहाड़ों में शांति खोजने लोग आते हैं, वहीं वे स्वयं अशांति का कारण बन जाते हैं।
उत्तराखंड की भौगोलिक संरचना मैदानी राज्यों जैसी नहीं है। यहां सड़कें सीमित हैं, पार्किंग सीमित है, जल संसाधन सीमित हैं और पर्यावरण अत्यंत संवेदनशील है। ऐसे में यदि लाखों वाहन एक साथ पहाड़ों पर चढ़ेंगे, तो अव्यवस्था स्वाभाविक है।
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इस भारी भीड़ से उत्तराखंड को वास्तव में क्या लाभ हो रहा है?
क्या हर पर्यटक राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान देता है?
यह प्रश्न असहज जरूर है, लेकिन बेहद जरूरी भी।
उत्तराखंड में हर साल लाखों पर्यटक आते हैं, लेकिन उनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी होती है जो अपने साथ पूरा “चलता-फिरता घर” लेकर आते हैं। बसों में भरकर आने वाले कई समूह अपना गैस सिलेंडर, राशन, बर्तन और टेंट साथ लेकर आते हैं। कई लोग अपनी कारों में रात गुजारते हैं। वे न होटल लेते हैं, न स्थानीय भोजन करते हैं, न स्थानीय व्यापारियों से खरीदारी करते हैं।
ऐसे पर्यटकों से राज्य को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ लगभग शून्य मिलता है।
इसके उलट वे सड़कें जाम करते हैं, प्राकृतिक स्थलों पर गंदगी फैलाते हैं, जंगलों और नदी किनारों पर प्लास्टिक छोड़ते हैं और प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं।
जब कोई पर्यटक स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान नहीं दे रहा, तो फिर उत्तराखंड उसकी अव्यवस्था का बोझ क्यों उठाए?
यही कारण है कि अब “वाहन आधारित टैक्स” की जगह “प्रति व्यक्ति टैक्स” प्रणाली लागू करने की जरूरत महसूस होने लगी है।
वाहन नहीं, व्यक्ति के हिसाब से हो टैक्स
वर्तमान व्यवस्था में अधिकतर शुल्क वाहन आधारित होते हैं। लेकिन यह मॉडल पहाड़ी राज्यों के लिए पर्याप्त नहीं है।
यदि एक बड़ी बस में 50 लोग आ रहे हैं और वे पूरा खाना-पीना साथ लाकर मुफ्त में प्राकृतिक स्थलों का उपयोग कर रहे हैं, तो केवल वाहन शुल्क लेकर राज्य को क्या हासिल होगा?
इसके बजाय यदि प्रत्येक बाहरी पर्यटक पर एक निश्चित “पर्यटन संरक्षण शुल्क” लगाया जाए, तो उससे राज्य को बड़ा राजस्व प्राप्त हो सकता है।
उदाहरण के तौर पर—
सामान्य पर्यटक से 300 से 500 रुपये
चारधाम यात्रियों के लिए अलग श्रेणी
विदेशी पर्यटकों के लिए अधिक शुल्क
पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्रों के लिए विशेष शुल्क
ऐसी व्यवस्था से दो बड़े लाभ होंगे—
अनावश्यक भीड़ नियंत्रित होगी
राज्य को राजस्व मिलेगा
यह टैक्स केवल पैसे वसूलने का माध्यम नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे “उत्तराखंड संरक्षण शुल्क” के रूप में देखा जाना चाहिए।
पर्यटन पास व्यवस्था क्यों जरूरी है?
उत्तराखंड में आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि सरकार को वास्तविक समय में यह पता ही नहीं होता कि किस क्षेत्र में कितने लोग पहुंच चुके हैं।
यदि प्रत्येक पर्यटक के लिए ऑनलाइन पास व्यवस्था लागू हो जाए, तो सरकार यह तय कर सकती है कि किसी दिन मसूरी, नैनीताल या केदारनाथ क्षेत्र में कितने लोगों को प्रवेश दिया जाए।
इससे कई लाभ होंगे—
जाम की समस्या कम होगी
आपदा के समय लोगों की पहचान आसान होगी
पर्यावरणीय क्षमता के अनुसार भीड़ नियंत्रित होगी
अवैध कैंपिंग और अतिक्रमण रोका जा सकेगा
पर्यटकों की सुरक्षा बेहतर होगी
दुनिया के कई देशों में “कैरीइंग कैपेसिटी मॉडल” पर पर्यटन संचालित होता है। लेकिन उत्तराखंड में अभी भी “जितनी भीड़ आए, आने दो” वाला दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है।
यह नीति लंबे समय में राज्य के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है।
सबसे ज्यादा पीड़ित कौन? स्वयं उत्तराखंडी
यह विडंबना ही है कि पर्यटन के नाम पर सबसे अधिक परेशानी उत्तराखंड के लोगों को ही झेलनी पड़ रही है।
गर्मी शुरू होते ही देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी जैसे मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले उत्तराखंडी परिवार अपने गांव या पहाड़ी शहरों की ओर जाना चाहते हैं। लेकिन भारी जाम और भीड़ के कारण उनका अपना ही राज्य उनसे दूर हो जाता है।
जो यात्रा पहले चार घंटे में पूरी हो जाती थी, वह अब दस-दस घंटे में पूरी होती है।
स्थानीय लोग अस्पताल, स्कूल, बाजार और जरूरी कामों के लिए घंटों जाम में फंसे रहते हैं। कई बार एंबुलेंस तक रास्ता नहीं बना पाती।
क्या यह स्थिति किसी भी संवेदनशील राज्य के लिए स्वीकार्य हो सकती है?
पर्यटन बनाम तीर्थ यात्रा: आस्था के नाम पर अव्यवस्था
उत्तराखंड केवल पर्यटन राज्य नहीं है, यह देवभूमि भी है। चारधाम यात्रा करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ी है। लेकिन आस्था के नाम पर जो अव्यवस्था फैल रही है, उस पर भी गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
तीर्थ यात्रा का अर्थ केवल संख्या बढ़ाना नहीं है। यदि श्रद्धालु घंटों जाम में फंसे रहें, रास्तों पर गंदगी फैले, नदियां प्रदूषित हों और स्थानीय जीवन अस्त-व्यस्त हो जाए, तो यह आस्था का सम्मान नहीं बल्कि उसका व्यावसायीकरण है।
सरकार को यह समझना होगा कि धार्मिक पर्यटन का अर्थ “असीमित भीड़” नहीं हो सकता।
यदि केदारनाथ जैसे संवेदनशील क्षेत्र में प्रतिदिन सीमित संख्या तय की जा सकती है, तो अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी व्यवस्था लागू हो सकती है।
पर्यावरणीय संकट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
उत्तराखंड पहले ही भूस्खलन, बादल फटने और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है।
ऐसे में अनियंत्रित पर्यटन इन खतरों को और बढ़ा रहा है।
पहाड़ काटकर पार्किंग बनाई जा रही है
जंगलों में अवैध कैंपिंग हो रही है
नदियों में प्लास्टिक और कचरा फेंका जा रहा है
जल स्रोतों पर दबाव बढ़ रहा है
यदि यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड का प्राकृतिक संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।
पर्यटन यदि प्रकृति को नष्ट करने लगे, तो वह विकास नहीं बल्कि आत्मघाती नीति बन जाता है।
क्या “पर्यटक टैक्स” से पर्यटन घट जाएगा?
कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि टैक्स लगाने से पर्यटक कम हो जाएंगे।
लेकिन यह तर्क अधूरा है।
दुनिया के कई लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर प्रवेश शुल्क, पर्यावरण शुल्क और पर्यटक टैक्स पहले से लागू हैं। लोग वहां फिर भी जाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि वे एक विशेष और संवेदनशील स्थान पर जा रहे हैं।
असल प्रश्न संख्या का नहीं, गुणवत्ता का है।
उत्तराखंड को “सस्ता और अव्यवस्थित पर्यटन” नहीं चाहिए, बल्कि “जिम्मेदार और संतुलित पर्यटन” चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति हजारों रुपये पेट्रोल और यात्रा पर खर्च कर सकता है, तो वह पर्यावरण संरक्षण के नाम पर कुछ सौ रुपये टैक्स भी दे सकता है।
सरकार के लिए बड़ा राजस्व अवसर
यदि उत्तराखंड सरकार प्रति व्यक्ति मामूली शुल्क भी लागू करती है, तो इससे हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सकता है।
उस धन का उपयोग किया जा सकता है—
बेहतर सड़क व्यवस्था
मल्टीलेवल पार्किंग
स्वच्छता अभियान
पर्वतीय आपदा प्रबंधन
स्थानीय युवाओं को रोजगार
पर्यावरण संरक्षण
शटल सेवा और सार्वजनिक परिवहन
आज उत्तराखंड को सबसे ज्यादा जरूरत “सतत पर्यटन मॉडल” की है।
राज्य केवल भीड़ बढ़ाकर समृद्ध नहीं बन सकता।
स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने का समय
उत्तराखंड में पर्यटन नीति बनाते समय सबसे पहले स्थानीय लोगों के हितों को केंद्र में रखा जाना चाहिए।
स्थानीय टैक्सी चालकों को प्राथमिकता
स्थानीय होटलों और होमस्टे को बढ़ावा
बाहरी कैंपिंग माफिया पर नियंत्रण
कूड़ा फैलाने वालों पर भारी जुर्माना
सीमित वाहन प्रवेश नीति
ऐसी नीतियां ही पहाड़ों की असली संस्कृति और अर्थव्यवस्था को बचा सकती हैं।
उत्तराखंड कोई “पिकनिक स्पॉट” नहीं
उत्तराखंड केवल घूमने की जगह नहीं है। यह करोड़ों लोगों की आस्था, लाखों लोगों का घर और हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यदि यहां केवल भीड़ बढ़ती रही और नियंत्रण नहीं हुआ, तो आने वाले समय में पहाड़ों की पहचान ही खतरे में पड़ जाएगी।
सरकार को अब साहसिक निर्णय लेने होंगे।
“प्रति व्यक्ति पर्यटन टैक्स”, “अनिवार्य ऑनलाइन पास”, “सीमित प्रवेश नीति” और “कठोर पर्यावरण नियम” अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं।

उत्तराखंड आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक रास्ता वह है जहां बिना योजना के भीड़ बढ़ती रहे, जाम बढ़ता रहे, पर्यावरण बिगड़ता रहे और स्थानीय लोग परेशान होते रहें। दूसरा रास्ता वह है जहां नियंत्रित, जिम्मेदार और राजस्व आधारित पर्यटन मॉडल अपनाया जाए।
सरकार को समझना होगा कि केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाना विकास नहीं कहलाता। वास्तविक विकास वह है जिसमें प्रकृति सुरक्षित रहे, स्थानीय लोग सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें और राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत हो।
अब समय आ गया है कि उत्तराखंड अपने पर्यटन मॉडल पर पुनर्विचार करे।
क्योंकि यदि पहाड़ ही नहीं बचेंगे, तो पर्यटन भी नहीं बचेगा।


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