गंगा दशहरा 2026: उत्तराखंड में आस्था, परंपरा और लोकविश्वास का महापर्वश्री श्री वैदिक पंडित त्रिलोचन पनेरु के अनुसार विशेष रिपोर्ट

Spread the love


देवभूमि उत्तराखंड में गंगा दशहरा  धार्मिक  आस्था, संस्कृति और लोक परंपराओं का जीवंत उत्सव है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 25 मई, सोमवार को मनाया जाएगा। मान्यता है कि इसी दिन मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को आने वाला यह पर्व पापों का नाश करने वाला माना जाता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


श्री श्री वैदिक महा पंडित त्रिलोचन पनेरु के अनुसार गंगा दशहरा का संबंध , स्नान और दान  आत्मशुद्धि, प्रकृति संरक्षण और लोकजीवन की आध्यात्मिक चेतना से भी जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि “गंगा नदी  भारतीय संस्कृति की जीवनधारा हैं। गंगा दशहरा हमें जल, प्रकृति और धर्म के प्रति अपने दायित्व का स्मरण कराता है।”
25 मई को रहेगा विशेष संयोग
पंडित त्रिलोचन पनेरु बताते हैं कि इस वर्ष गंगा दशहरा पर अत्यंत शुभ रवि योग का संयोग बन रहा है।
दशमी तिथि 25 मई 2026 को सुबह 4:30 बजे प्रारंभ होगी और 26 मई को सुबह 5:10 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार मुख्य स्नान, पूजा और दान 25 मई को ही किया जाएगा।
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से दस प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि इसे “दशहरा” कहा जाता है, अर्थात दस पापों का हरण करने वाला पर्व।
हरिद्वार और ऋषिकेश में उमड़ेगा श्रद्धा का सैलाब
गंगा दशहरा पर हरिद्वार और ऋषिकेश में लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। विशेष रूप से हर की पौड़ी और त्रिवेणी घाट पर सुबह से ही स्नान और पूजा का सिलसिला शुरू हो जाएगा।
शाम को होने वाली भव्य गंगा आरती इस पर्व का सबसे आकर्षक दृश्य होती है। हजारों दीपों की रोशनी, गंगा स्तुति और घंटियों की गूंज वातावरण को भक्तिमय बना देती है। श्रद्धालु मिट्टी के दीपक प्रवाहित कर मां गंगा से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
पंडित पनेरु बताते हैं कि गंगा दशहरा पर गंगा स्नान का विशेष महत्व है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति घाट तक नहीं पहुंच सकता तो वह घर में स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर भी पुण्य प्राप्त कर सकता है।
भगवान शिव की पूजा का भी विशेष महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं, तब उनकी प्रचंड धारा को भगवान शिव ने अपनी जटाओं में धारण किया था। इसलिए गंगा दशहरा पर भगवान शिव की पूजा भी अनिवार्य मानी जाती है।
पंडित त्रिलोचन पनेरु के अनुसार इस दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद तांबे के पात्र में गंगाजल भरकर मां गंगा और भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए। धूप, दीप, पुष्प, रोली और अक्षत अर्पित कर गंगा चालीसा तथा शिव मंत्रों का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
‘10’ अंक का विशेष महत्व
गंगा दशहरा में दस अंक का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन दस प्रकार के दान, दस दीपक और दस प्रकार के पुष्प अर्पित करने से विशेष पुण्य मिलता है।
पंडित पनेरु बताते हैं कि इस दिन   भारतीय परंपरा में ₹501 को शुभ और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। ₹500 स्थिरता और समृद्धि दर्शाता है, जबकि अतिरिक्त ₹1 निरंतर वृद्धि, शुभारंभ और ईश्वर कृपा का संकेत माना जाता है। इसलिए दान, पूजा, विवाह या धार्मिक अनुष्ठानों में ₹501 अर्पित करना मंगलकारी और आध्यात्मिक रूप सेअति शुभ माना जाता है।जल, घड़ा, वस्त्र, फल, गुड़, पंखा, छाता, तिल और मिठाई का दान करना शुभ माना जाता है। गर्मी के मौसम में जलदान और छाता दान को अत्यंत पुण्यकारी कहा गया है।
उत्तराखंड की  परंपरा: गंगा दशहरा द्वार-पत्र
उत्तराखंड के ज्यादातर क्षेत्र में गंगा दशहरा से जुड़ी एक अनूठी परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसे “द्वार-पत्र” कहा जाता है। यह परंपरा आज भी गांवों में जीवंत दिखाई देती है।
पंडित त्रिलोचन पनेरु बताते हैं कि गंगा दशहरा के अवसर पर घरों के मुख्य द्वार पर विशेष धार्मिक पत्र लगाए जाते हैं। इन्हें वज्रवारक अथवा दशहरा पत्र भी कहा जाता है। लोकविश्वास है कि यह पत्र घर को आकाशीय बिजली, प्राकृतिक आपदाओं और नकारात्मक शक्तियों से बचाता है।
इन पत्रों को पारंपरिक रूप से पुरोहित अपने हाथों से तैयार करते हैं। सफेद कागज या भोजपत्र पर लाल, पीले और हरे रंगों से धार्मिक आकृतियां बनाई जाती हैं। इनमें भगवान गणेश, शिव-पार्वती, सूर्य देव, हनुमान और मां गंगा के प्रतीक अंकित किए जाते हैं।
सप्तऋषियों से जुड़ी मान्यता
पौराणिक कथा के अनुसार जब मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं, उस समय सप्तऋषि कुमाऊं क्षेत्र में तपस्या कर रहे थे। गंगा के आगमन की खुशी में उन्होंने अपने आश्रमों के द्वारों पर विशेष सुरक्षा पत्र लगाए और पवित्र जल का छिड़काव किया। तभी से यह परंपरा आरंभ हुई।
पंडित पनेरु के अनुसार यह धार्मिक प्रतीक साथ साथ प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन का संदेश भी देता है।
वज्रवारक मंत्र का महत्व
द्वार-पत्र पर एक विशेष मंत्र लिखा जाता है, जिसे वज्रवारक मंत्र कहा जाता है—
“अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च वैशम्पायन एव च।
जैमिनिश्च सुमन्तुश्च पञ्चैते वज्रवारका:।।”
मान्यता है कि इस मंत्र के प्रभाव से घर पर बिजली गिरने और अग्नि भय से रक्षा होती है। पर्वतीय क्षेत्रों में जहां मानसून के दौरान आकाशीय बिजली का खतरा अधिक रहता है, वहां यह परंपरा लोकविश्वास का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
यजमान और पुरोहित की सदियों पुरानी परंपरा
गंगा दशहरा से पहले गांवों में पुरोहित अपने यजमानों के घर जाकर द्वार-पत्र भेंट करते हैं। बदले में लोग उन्हें श्रद्धानुसार दक्षिणा, अनाज और फल देते हैं।
पंडित त्रिलोचन पनेरु कहते हैं कि यह परंपरा केवल धार्मिक सामाजिक एकता और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीक भी है। आधुनिक समय में बाजारों में छपे हुए द्वार-पत्र मिलने लगे हैं, लेकिन हाथ से बने पारंपरिक पत्रों का महत्व आज भी बना हुआ है।
प्रशासन भी अलर्ट मोड पर
गंगा दशहरा के दौरान उत्तराखंड में भारी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए प्रशासन भी तैयारियों में जुट गया है। हरिद्वार और ऋषिकेश में सुरक्षा, यातायात, पार्किंग और घाटों पर भीड़ नियंत्रण के विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं।
विशेष रूप से चारधाम यात्रा के चलते पहले से ही उत्तराखंड में यात्रियों की भीड़ बनी हुई है। ऐसे में गंगा दशहरा पर अतिरिक्त पुलिस बल और आपदा प्रबंधन टीमें तैनात की जा सकती हैं।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
पंडित त्रिलोचन पनेरु का कहना है कि गंगा दशहरा केवल पूजा-पाठ एवं गंगा स्वच्छता का भी संदेश देता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपील की कि पूजा सामग्री और प्लास्टिक गंगा में प्रवाहित न करें।
उन्होंने कहा, “यदि हम मां गंगा को सचमुच पूजते हैं तो उनकी स्वच्छता और पवित्रता बनाए रखना भी हमारा धर्म है।”
आध्यात्मिक ऊर्जा का पर्व
गंगा दशहरा पर उत्तराखंड की धार्मिक नगरीयां पूरी तरह भक्तिमय वातावरण में डूब जाती हैं। घाटों पर गूंजते मंत्र, जलते दीप, श्रद्धालुओं की आस्था और लोक परंपराओं की झलक इस पर्व को विशेष बना देती है।
पंडित त्रिलोचन पनेरु के अनुसार गंगा दशहरा आत्मशुद्धि, दान, सेवा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को जीवित रखता है, जिसमें नदियों को केवल जलधारा नहीं, बल्कि जीवनदायिनी मां माना गया है।


Spread the love