उत्तराखंड की राजनीतिक हकीकत : “विकास” के नारों के पीछे छूटता उत्तराखंड, टूटता भरोसा और बांस के पुल पर चलता बचपन

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उत्तराखंड को बने पच्चीस वर्ष होने जा रहे हैं। राज्य निर्माण आंदोलन के समय जो सपना देखा गया था, वह केवल एक नए राज्य का सपना नहीं था, बल्कि एक ऐसे उत्तराखंड का सपना था जहां पहाड़ का दर्द समझा जाए, गांवों को सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मिले, और पलायन की विवशता खत्म हो। लेकिन आज जब गदरपुर विधानसभा क्षेत्र के खटोला गांव की तस्वीर सामने आती है—जहां छोटे-छोटे बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर जर्जर बांस और लकड़ी के पुल से स्कूल जाने को मजबूर हैं—तो सवाल उठता है कि आखिर विकास के इतने बड़े-बड़े दावों के बीच आम आदमी की जिंदगी अब भी इतनी असुरक्षित क्यों है?
यह दृश्य  उस राजनीतिक व्यवस्था का आईना है जिसने विकास को विज्ञापनों और भाषणों तक सीमित कर दिया है। एक तरफ डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी, ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समिट और करोड़ों-अरबों की योजनाओं का शोर है, दूसरी ओर एक बच्चा स्कूल जाने के लिए सुरक्षित पुल तक से वंचित है। यह विरोधाभास ही आज के उत्तराखंड की सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई है।
विकास के दावे और जमीनी हकीकत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार कहा कि “21वीं सदी का तीसरा दशक उत्तराखंड का दशक होगा।” मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार यह दावा करते रहे हैं कि उत्तराखंड तेजी से विकास की ओर बढ़ रहा है। सरकार निवेश, पर्यटन, चारधाम सड़क परियोजना, एक्सप्रेसवे, खनन से बढ़ती आय और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर को उपलब्धि के रूप में गिनाती है।
लेकिन सवाल यह है कि यदि उत्तराखंड सचमुच विकास के स्वर्णकाल में प्रवेश कर चुका है, तो खटोला जैसे गांवों में बच्चे आज भी बांस के पुल से क्यों गुजर रहे हैं? आखिर क्यों मानसून आने से पहले ग्रामीणों की धड़कनें बढ़ जाती हैं? क्यों हर बरसात के साथ गांव का संपर्क टूट जाने का डर पैदा हो जाता है?
असल समस्या यह है कि विकास का मॉडल ऊपर से नीचे की ओर थोपा गया मॉडल बन गया है। बड़े शहरों, धार्मिक पर्यटन और दिखावटी परियोजनाओं पर अधिक ध्यान दिया गया, जबकि गांवों की बुनियादी जरूरतें लगातार उपेक्षित होती रहीं।
“शॉर्टकट” कहकर जिम्मेदारी से बचने की राजनीति
सबसे दुखद पहलू यह है कि जब स्थानीय लोग अपनी पीड़ा बताते हैं तो कुछ जनप्रतिनिधि इसे “शॉर्टकट रास्ता” कहकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं। यह वही राजनीतिक संस्कृति है जिसमें जनता की समस्या का समाधान करने के बजाय उसे छोटा साबित करने की कोशिश की जाती है।
अगर यह केवल शॉर्टकट है, तो सवाल यह है कि फिर बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर उस रास्ते से क्यों गुजर रहे हैं? क्या कोई अभिभावक अपने बच्चे को खतरे में डालना चाहेगा? सच यह है कि गांवों में “वैकल्पिक रास्ते” अक्सर कई किलोमीटर लंबे, खराब और अव्यवहारिक होते हैं। इसलिए ग्रामीण मजबूरी में ऐसे जानलेवा रास्तों का इस्तेमाल करते हैं।
यह राजनीति की संवेदनहीनता का उदाहरण है। नेताओं के लिए यह एक फाइल हो सकती है, लेकिन ग्रामीणों के लिए यह रोज की जिंदगी और मौत का सवाल है।
चुनावी वादों का पुल
उत्तराखंड की राजनीति में चुनावों के दौरान विकास सबसे बड़ा मुद्दा बनता है। हर चुनाव में सड़क, पुल, अस्पताल, स्कूल और रोजगार के वादे किए जाते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही ये वादे सरकारी फाइलों में दब जाते हैं।
खटोला गांव के लोगों का दर्द यही है। वे कहते हैं कि हर साल पुल बनाने का आश्वासन मिलता है, प्रस्ताव भेजे जाने की बातें होती हैं, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं बदलता। यह केवल एक गांव की शिकायत नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के हजारों गांवों की कहानी है।
राजनीति अब सेवा से अधिक प्रबंधन का माध्यम बन चुकी है। योजनाओं की घोषणा करना आसान है, लेकिन उन्हें समय पर पूरा करना कठिन। जनता को घोषणा मिलती है, सुविधा नहीं।
जिला मुख्यालय के पास भी बदहाली
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह गांव कोई दूरस्थ हिमालयी क्षेत्र में नहीं है। यह जिला मुख्यालय के पास स्थित क्षेत्र है। यदि जिला मुख्यालय के निकट बसे गांवों की यह स्थिति है, तो दूरदराज पहाड़ी इलाकों की हालत का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
उत्तराखंड के कई गांव आज भी सड़क, स्वास्थ्य सुविधा, इंटरनेट, पीने के पानी और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राज्य गठन के बाद भी गांवों की प्राथमिक समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
खनन, निवेश और पुरस्कारों की राजनीति
सरकारें अक्सर खनन से हुई आय, निवेश सम्मेलनों और पुरस्कारों का हवाला देती हैं। करोड़ों-अरबों की परियोजनाओं को उपलब्धि बताया जाता है। लेकिन असली सवाल यह है कि उस धन का लाभ गांवों तक क्यों नहीं पहुंचता?
यदि राज्य को खनन से सैकड़ों करोड़ की आय हो रही है, तो एक छोटे से पुल के लिए बजट क्यों नहीं निकल पाता? यदि सरकार निवेश लाने में सफल है, तो ग्रामीण बुनियादी ढांचे पर पर्याप्त खर्च क्यों नहीं दिखाई देता?
समस्या केवल धन की कमी नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं की है। राजनीतिक व्यवस्था ने गांवों की वास्तविक समस्याओं को प्राथमिकता सूची में नीचे धकेल दिया है।
शिक्षा का अधिकार या जोखिम का सफर?
देश में शिक्षा के अधिकार की बात होती है। नई शिक्षा नीति की चर्चा होती है। डिजिटल क्लासरूम और स्मार्ट एजुकेशन की योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन खटोला के बच्चे जिस पुल से गुजरते हैं, वह बताता है कि शिक्षा तक पहुंच आज भी कई बच्चों के लिए संघर्ष है।
एक बच्चा जब स्कूल जाने से पहले अपनी जान की चिंता करे, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि सामाजिक असफलता भी है।
स्कूल भवन बनाना ही शिक्षा नहीं है। सुरक्षित पहुंच भी शिक्षा का हिस्सा है। यदि रास्ता ही सुरक्षित नहीं, तो शिक्षा का अधिकार अधूरा है।
प्रशासन की पारंपरिक प्रतिक्रिया
प्रभारी मुख्य शिक्षा अधिकारी का बयान—“कोई लिखित शिकायत नहीं आई”—भारतीय प्रशासनिक संस्कृति का परिचित चेहरा है। व्यवस्था अक्सर तब तक समस्या को समस्या नहीं मानती जब तक कागज पर आवेदन न आ जाए।
लेकिन क्या प्रशासन को किसी दुर्घटना का इंतजार करना चाहिए? क्या मीडिया में तस्वीर आने के बाद भी संवेदनशीलता नहीं जागनी चाहिए?
यह मानसिकता बताती है कि शासन आज भी प्रतिक्रियात्मक है, सक्रिय नहीं।
उत्तराखंड का असली संकट : पलायन नहीं, उपेक्षा
उत्तराखंड में अक्सर पलायन को सबसे बड़ी समस्या कहा जाता है। लेकिन पलायन असल समस्या नहीं, बल्कि परिणाम है। वास्तविक संकट है—लगातार उपेक्षा।
जब गांव में सड़क नहीं होगी, पुल नहीं होगा, अस्पताल नहीं होगा, रोजगार नहीं होगा, तो लोग गांव छोड़ेंगे ही। खटोला जैसे गांवों की तस्वीरें बताती हैं कि सरकारें अभी भी गांवों को विकास की मुख्यधारा में शामिल नहीं कर पाई हैं।
“देवभूमि” बनाम “वास्तविक उत्तराखंड”
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां धार्मिक पर्यटन पर भारी निवेश होता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस राज्य में करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए हाईवे बनाए जा रहे हैं, उसी राज्य में गांव के बच्चों को स्कूल जाने के लिए बांस का पुल पार करना पड़ता है।
यह दो उत्तराखंड की तस्वीर है— एक वह जो विज्ञापनों में दिखता है, और दूसरा वह जो गांवों में जीता है।
जनता का धैर्य टूट रहा है
अब ग्रामीण केवल आश्वासन नहीं चाहते। वे परिणाम चाहते हैं। लगातार उपेक्षा ने लोगों का भरोसा कमजोर किया है। जब जनता को लगता है कि उनकी समस्याएं केवल चुनावी भाषणों का हिस्सा हैं, तो लोकतंत्र पर विश्वास भी कमजोर होने लगता है।
खटोला गांव की तस्वीर केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतावनी भी है। यह बताती है कि यदि विकास केवल कागजों और मंचों तक सीमित रहेगा, तो जनता और सत्ता के बीच दूरी बढ़ती जाएगी।
समाधान क्या है?
समाधान केवल पुल निर्माण तक सीमित नहीं है। जरूरत है विकास की प्राथमिकताओं को बदलने की।
गांवों की बुनियादी जरूरतों को राजनीतिक एजेंडा बनाया जाए।
शिक्षा, स्वास्थ्य और संपर्क मार्गों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले।
घोषणाओं के बजाय समयबद्ध क्रियान्वयन हो।
ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासनिक जवाबदेही तय हो।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली का सामाजिक ऑडिट हो।
सबसे महत्वपूर्ण यह कि सरकार को यह समझना होगा कि विकास केवल एक्सप्रेसवे और निवेश सम्मेलन नहीं होते। विकास तब होता है जब एक बच्चा बिना डर के स्कूल जा सके।
खटोला गांव का जर्जर बांस का पुल  लकड़ी बांस का ढांचा , वह उत्तराखंड की राजनीतिक विफलताओं का प्रतीक बन चुका है। वह बताता है कि विकास के चमकदार नारों के पीछे आज भी गांवों की सच्चाई कितनी कठोर है।
जब तक सरकारें गांवों की मूल समस्याओं को प्राथमिकता नहीं देंगी, तब तक “समृद्ध उत्तराखंड” केवल भाषणों का हिस्सा बना रहेगा।
क्योंकि किसी भी राज्य की असली प्रगति राजधानी की चमक से नहीं, बल्कि गांव के बच्चे की सुरक्षित मुस्कान से मापी जाती है।


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