तेजी से फैलते शहरीकरण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी का राष्ट्रीय चेतावनी संकेत है। उत्तराखंड के रुद्रपुर, हल्द्वानी, देहरादून और हरिद्वार जैसे शहर भी इसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जहां बहुमंजिला आवासीय परियोजनाएं, मॉल और व्यावसायिक प्रतिष्ठान तेजी से खड़े हुए हैं, लेकिन अग्नि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल मौजूद हैं


दिल्ली के मालवीय नगर होटल अग्निकांड में 21 लोगों की मौत ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कागजों में मौजूद सुरक्षा प्रमाणपत्र और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर है। यही स्थिति उत्तराखंड के कई शहरों में भी दिखाई देती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


रुद्रपुर में विशाल मेगा मार्ट, मेट्रोपोलिस सिटी, ओमैक्स जैसी बड़ी परियोजनाओं और बहुमंजिला भवनों को देखकर सहज ही सवाल उठता है कि क्या यहां अग्निशमन सुरक्षा के सभी मानकों का नियमित परीक्षण होता है? क्या आपातकालीन निकास मार्ग पूरी तरह उपयोग योग्य हैं? क्या अग्निशमन उपकरण समय-समय पर जांचे जाते हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या अग्निशमन विभाग तथा स्थानीय प्रशासन इन व्यवस्थाओं का वास्तविक निरीक्षण करता है या केवल औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं?
मेट्रोपोलिस सिटी में पूर्व में आग लगने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। एक फ्लैट पूरी तरह जलकर खाक हो गया था। सौभाग्य से उस समय परिवार के सदस्य बाहर थे, अन्यथा बड़ा हादसा हो सकता था। यह घटना बताती है कि खतरा केवल पुराने भवनों में नहीं, बल्कि आधुनिक आवासीय परिसरों में भी मौजूद है।
उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में मॉल, होटल, अपार्टमेंट और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बने हैं। लेकिन इनमें से कितने भवनों का अग्नि सुरक्षा ऑडिट नियमित रूप से होता है, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं है। कई स्थानों पर पार्किंग क्षेत्रों में अवैध कब्जे, आपातकालीन मार्गों पर बाधाएं और अतिरिक्त निर्माण आम शिकायतें हैं।
सबसे बड़ी चिंता जवाबदेही की है। हादसा होने पर बिल्डर नगर निगम पर दोष डालता है, नगर निगम अग्निशमन विभाग की ओर इशारा करता है और विभाग संसाधनों की कमी का हवाला देता है। परिणामस्वरूप जिम्मेदारी तय नहीं होती और व्यवस्था पुराने ढर्रे पर चलती रहती है।
अग्निशमन विभाग की भूमिका केवल आग बुझाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसका प्रमुख दायित्व जोखिमों की पहचान करना, नियमित निरीक्षण करना और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करना भी है। यदि किसी भवन में अग्नि सुरक्षा मानकों की कमी है तो उसे केवल नोटिस देकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं, बल्कि सुधार होने तक कड़ी कार्रवाई आवश्यक है।
दिल्ली की त्रासदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अग्नि सुरक्षा में लापरवाही सीधे मानव जीवन की कीमत पर पड़ती है। उत्तराखंड सरकार, स्थानीय निकायों और अग्निशमन विभाग को चाहिए कि राज्य के सभी बड़े मॉल, होटल, अस्पताल और बहुमंजिला आवासीय परिसरों का विशेष सुरक्षा ऑडिट कराया जाए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
क्योंकि सवाल यह नहीं है कि आग कब लगेगी, बल्कि यह है कि जब आग लगेगी तो क्या हमारी तैयारी लोगों की जान बचाने के लिए पर्याप्त होगी। यदि आज भी चेतावनी को नजरअंदाज किया गया, तो कोई भी शहर अगली बड़ी त्रासदी का केंद्र बन सकता है।