रुद्रपुर। प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत मिशन को सफल बनाने के लिए केंद्र सरकार से लेकर स्थानीय निकायों तक करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। नगर निगम द्वारा घर-घर से कूड़ा एकत्र करने के लिए वाहन लगाए गए हैं, लोगों को सूखा और गीला कूड़ा अलग-अलग देने के लिए जागरूक किया जा रहा है, समय-समय पर स्वच्छता अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद शहर के कुछ लोगों की गैर-जिम्मेदाराना आदतें पूरे समाज के लिए परेशानी का कारण बनी हुई हैं।
ऐसा ही एक मामला रुद्रपुर के दक्ष चौराहे से तीनपानी डैम जाने वाली सड़क के किनारे देखने को मिला, जहां सार्वजनिक स्थान पर बड़ी मात्रा में कूड़ा फेंका गया। इस दृश्य को देखकर स्वच्छता के लिए वर्षों से काम कर रही समाजसेवी नीलम कांडपाल का मन व्यथित हो उठा। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट कर लोगों की इस मानसिकता पर चिंता व्यक्त की।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
राहुल गांधी की सभा टली, लेकिन कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन भाजपा के लिए बड़ा संदेश
अल्मोड़ा में राहुल गांधी की प्रस्तावित जनसभा मौसम खराब होने के कारण भले ही स्थगित हो गई हो, लेकिन इस आयोजन की तैयारियों ने उत्तराखंड की राजनीति में हलचल जरूर पैदा कर दी। कांग्रेस ने मिशन-2027 के तहत कुमाऊं में जिस तरह कार्यकर्ताओं और नेताओं को एक मंच पर लाने की तैयारी की, उसने भाजपा का ध्यान आकर्षित किया। कार्यक्रम से पहले भाजपा के कई नेताओं और समर्थकों की ओर से लगातार प्रतिक्रियाएं सामने आ रही थीं, वहीं मुख्यमंत्री स्तर तक कांग्रेस पर राजनीतिक हमले किए गए। हालांकि सभा नहीं हो सकी, लेकिन कांग्रेस ने यह संदेश देने में सफलता हासिल की कि वह चुनावी मुकाबले के लिए सक्रिय हो चुकी है। दूसरी ओर भाजपा ने मौसम के चलते कार्यक्रम टलने से कुछ राहत जरूर महसूस की होगी, लेकिन अल्मोड़ा में कांग्रेस के पक्ष में दिखा उत्साह और कार्यकर्ताओं की लामबंदी आने वाले समय में भाजपा के लिए चिंता का विषय बन सकती है। कांग्रेस ने बिना सभा हुए भी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास किया है।
वीडियो में साफ दिखाई देता है कि सड़क किनारे खुले में कूड़ा डाला गया है। यह वह क्षेत्र है जहां से प्रतिदिन हजारों लोग गुजरते हैं। सड़क किनारे फैली गंदगी न केवल शहर की सुंदरता को प्रभावित करती है, बल्कि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करती है।
वर्षों की मेहनत पर पानी फेर रहे कुछ लोग
नीलम कांडपाल और उनकी टीम लंबे समय से स्वच्छता के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं। स्वच्छ भारत अभियान के तहत उन्होंने अनेक स्थानों पर सफाई अभियान चलाए, लोगों को जागरूक किया और स्वच्छता को जन आंदोलन बनाने का प्रयास किया। कई बार स्वयं हाथों में झाड़ू लेकर सार्वजनिक स्थलों की सफाई की गई, लेकिन दुखद स्थिति यह है कि कुछ लोग आज भी अपनी जिम्मेदारी समझने को तैयार नहीं हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि नगर निगम की कूड़ा संग्रहण गाड़ियां नियमित रूप से मोहल्लों और बाजारों में पहुंचती हैं। लोगों को बार-बार बताया जाता है कि घरेलू और व्यावसायिक कचरा निगम के वाहनों में ही डालें। इसके बावजूद कुछ लोग रात के अंधेरे में, सुबह तड़के या सुनसान समय का फायदा उठाकर सार्वजनिक स्थानों, खाली प्लॉटों, नालों, पार्कों और सड़क किनारों पर कूड़ा फेंक देते हैं।
केवल निगम की नहीं, नागरिकों की भी जिम्मेदारी
अक्सर गंदगी देखकर लोग नगर निगम को दोष देते हैं, लेकिन सवाल यह भी है कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं कूड़ा सड़क पर फेंक रहा है तो उसके लिए केवल प्रशासन को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है?
स्वच्छता किसी एक विभाग का काम नहीं है। यह नागरिक जिम्मेदारी का भी विषय है। यदि प्रत्येक व्यक्ति यह संकल्प ले कि वह कूड़ा निर्धारित स्थान पर ही डालेगा, तो शहर की आधी समस्या स्वतः समाप्त हो जाएगी।
नीलम कांडपाल ने अपनी पोस्ट में भी यही संदेश देने का प्रयास किया कि शहर को स्वच्छ रखना केवल निगम का नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने घरों और दुकानों का कूड़ा केवल निगम की गाड़ियों में ही डालें तथा सार्वजनिक स्थानों को कूड़ाघर न बनाएं।
पढ़ाई-लिखाई से नहीं, व्यवहार से होती है पहचान
समाज में अक्सर यह माना जाता है कि शिक्षित व्यक्ति सामाजिक जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से समझता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति जानबूझकर सड़क, पार्क, नदी-नाले या खाली भूखंड में कूड़ा फेंकता है तो यह उसके व्यवहार और नागरिक चेतना पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी विकसित करना भी है। यदि कोई व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण को गंदा कर रहा है तो वह अनजाने में पूरे समाज को नुकसान पहुंचा रहा है।
आने वाली पीढ़ी क्या सीख रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे अपने घर और आसपास के वातावरण से सबसे अधिक सीखते हैं। यदि वे अपने अभिभावकों को नियमों का पालन करते हुए देखते हैं तो उनमें भी वही आदत विकसित होती है। वहीं यदि वे सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते, कूड़ा फैलाते या नियमों की अनदेखी करते देखते हैं तो यह व्यवहार भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन सकता है।
इसी कारण सामाजिक जिम्मेदारी और स्वच्छता का संस्कार परिवार से शुरू होना चाहिए। घर ही बच्चे की पहली पाठशाला है और वहां सीखे गए मूल्य जीवन भर उसके साथ रहते हैं।
पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों पर खतरा
सड़क किनारे पड़ा कूड़ा केवल देखने में खराब नहीं लगता, बल्कि अनेक समस्याओं को जन्म देता है। इससे दुर्गंध फैलती है, मच्छर और मक्खियां पनपती हैं, आवारा पशु वहां जमा होने लगते हैं और संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
बरसात के मौसम में यही कूड़ा नालियों को जाम कर देता है, जिससे जलभराव की समस्या पैदा होती है। कई बार प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट जल स्रोतों तक पहुंचकर पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं।
सख्त कार्रवाई की उठी मांग
स्थानीय लोगों का मानना है कि केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं। जो लोग बार-बार नियमों का उल्लंघन कर सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकते हैं, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
लोगों ने सुझाव दिया है कि ऐसे मामलों में सीसीटीवी कैमरों की सहायता ली जाए तथा दोषियों पर भारी आर्थिक दंड लगाया जाए। यदि जुर्माने का डर होगा तो लोग नियमों का पालन करने के लिए बाध्य होंगे।
नगर निगम के नियमों के अनुसार सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकना दंडनीय अपराध है। नागरिकों का कहना है कि इन नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है ताकि स्वच्छता व्यवस्था मजबूत हो सके।
नीलम कांडपाल की पहल बनी प्रेरणा
ऐसे समय में जब अधिकांश लोग केवल शिकायत करते हैं, नीलम कांडपाल जैसी समाजसेवी स्वयं मैदान में उतरकर स्वच्छता के लिए काम कर रही हैं। उनकी पीड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने वर्षों तक शहर को स्वच्छ बनाने के लिए लगातार प्रयास किए हैं।
उनका यह वीडियो केवल गंदगी दिखाने के लिए नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने के लिए है। यह संदेश है कि यदि हम स्वयं नहीं सुधरेंगे तो कोई भी अभियान पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सकता।
स्वच्छ शहर के लिए सामूहिक संकल्प जरूरी
स्वच्छता केवल सरकारी योजनाओं से नहीं आती, बल्कि नागरिकों की सहभागिता से आती है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाए, कूड़ा निर्धारित स्थान पर डाले, दूसरों को भी जागरूक करे और सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान करे तो शहर की तस्वीर बदल सकती है।
आज आवश्यकता किसी नए अभियान की नहीं, बल्कि पहले से मौजूद व्यवस्थाओं का ईमानदारी से पालन करने की है। नगर निगम अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है, समाजसेवी अपना योगदान दे रहे हैं, अब बारी नागरिकों की है।
यदि हम वास्तव में स्वच्छ और सुंदर शहर चाहते हैं तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि सड़क, पार्क, नाला और सार्वजनिक स्थान किसी और के नहीं, हमारे अपने हैं। इन्हें स्वच्छ रखना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
नीलम कांडपाल की यह पहल और उनका भावुक संदेश समाज के लिए एक चेतावनी भी है और प्रेरणा भी। उम्मीद की जानी चाहिए कि लोग इससे सबक लेंगे और भविष्य में सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकने जैसी आदतों से दूरी बनाएंगे।
