हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी कार्रवाई नहीं: क्या धामी सरकार में बेईमानो भू माफिया प्रभावशाली लोगों को मिल रहा संरक्षण?

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उत्तराखंड को ईमानदार शासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का मॉडल राज्य बनाने के दावे लगातार किए जाते रहे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार भी समय-समय पर सख्त प्रशासन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा करती रही है। लेकिन देहरादून के पुरकुल स्थित कथित 19.81 करोड़ रुपये के भूमि धोखाधड़ी प्रकरण ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब सरकार और पुलिस प्रशासन को जनता के सामने देना चाहिए।
प्रेस वार्ता में युवा उद्यमी बिक्रम राणा ने जो आरोप लगाए हैं, वे केवल एक व्यक्ति के साथ हुए कथित आर्थिक विवाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राज्य की कानून व्यवस्था, पुलिस की कार्यशैली और सरकार की जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राणा का दावा है कि नैनीताल हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद पुलिस द्वारा एफआईआर को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने की दिशा में अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई।
यदि यह आरोप सही हैं, तो यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है।
मामला पुरकुल क्षेत्र की उस बहुमूल्य भूमि से जुड़ा बताया जा रहा है, जहां मसूरी रोपवे परियोजना के चलते जमीनों के मूल्य में भारी वृद्धि हुई है। आरोप है कि पहले हुए भूमि सौदों से अब कुछ लोग पीछे हटना चाहते हैं क्योंकि जमीन की कीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं। बिक्रम राणा का दावा है कि उन्होंने लगभग 19 करोड़ 81 लाख रुपये संबंधित पक्षों के खातों में स्थानांतरित किए, लेकिन इसके बावजूद उनके पक्ष में रजिस्ट्री नहीं कराई गई।
इस मामले में राजपुर थाने में एफआईआर दर्ज हुई। इसके बाद मामला न्यायालयों तक पहुंचा। प्रेस वार्ता में कहा गया कि संबंधित पक्षों द्वारा एफआईआर निरस्त कराने का प्रयास किया गया, लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और आर्थिक दंड भी लगाया। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि न्यायालय ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए राहत देने से इनकार किया, तो फिर जांच एजेंसियों की सक्रियता कहां दिखाई दे रही है?
धामी सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन सी बाधा है, जिसके कारण कथित रूप से इतने बड़े आर्थिक अपराध में जांच अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रही है।
उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में आम नागरिकों को अक्सर यह शिकायत रहती है कि प्रभावशाली और आर्थिक रूप से मजबूत लोगों के मामलों में प्रशासन का रवैया अलग दिखाई देता है, जबकि साधारण व्यक्ति के मामलों में पुलिस तेजी से कार्रवाई करती है। यह धारणा लोकतंत्र के लिए घातक है। यदि सरकार वास्तव में पारदर्शी और निष्पक्ष शासन देना चाहती है, तो उसे ऐसे मामलों में तुरंत और सार्वजनिक रूप से कार्रवाई का विवरण देना चाहिए।
बिक्रम राणा ने अपनी प्रेस वार्ता में यह भी आरोप लगाया कि पुलिस अभियुक्तों को अनावश्यक राहत और समय दे रही है ताकि मामला न्यायालय के बाहर निपटाया जा सके। यह एक गंभीर आरोप है। यदि इसमें सच्चाई नहीं है तो सरकार और पुलिस को तथ्यों के साथ इसका खंडन करना चाहिए। लेकिन यदि इसमें कुछ भी तथ्यात्मक आधार है, तो यह कानून के शासन की अवधारणा पर सीधा आघात है।
मुख्यमंत्री धामी अक्सर निवेश, उद्योग और रोजगार की बात करते हैं। उत्तराखंड में निवेश आकर्षित करने के लिए देश-विदेश के उद्योगपतियों को आमंत्रित किया जाता है। लेकिन कोई भी निवेशक सबसे पहले राज्य की कानून व्यवस्था और अनुबंधों की सुरक्षा को देखता है। यदि करोड़ों रुपये के लेन-देन के बाद भी किसी व्यक्ति को न्याय के लिए वर्षों तक अदालतों और थानों के चक्कर लगाने पड़ें, तो यह राज्य की निवेशक-अनुकूल छवि को नुकसान पहुंचाता है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की शिकायत नहीं रह जाता, बल्कि यह निवेशकों के विश्वास से भी जुड़ जाता है।
धामी सरकार को यह समझना होगा कि उत्तराखंड के युवाओं में पहले से ही रोजगार, पलायन और आर्थिक अवसरों की कमी को लेकर असंतोष है। यदि कोई स्थानीय युवा उद्यमी यह आरोप लगाता है कि उसके साथ करोड़ों रुपये की कथित धोखाधड़ी हुई और उसे न्याय नहीं मिल रहा, तो इसका व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संदेश जाता है।
सरकार को यह भी बताना चाहिए कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद जांच की वर्तमान स्थिति क्या है। क्या आरोपितों से पूछताछ हुई? क्या वित्तीय लेन-देन की जांच की गई? क्या संबंधित भूमि पर कोई कानूनी रोक लगाने की पहल हुई? क्या बैंक खातों और दस्तावेजों की जांच पूरी हो चुकी है? यदि नहीं, तो क्यों नहीं?
इन प्रश्नों का उत्तर देना सरकार की जिम्मेदारी है।
उत्तराखंड की जनता ने भाजपा सरकार को मजबूत जनादेश दिया था। जनता की अपेक्षा थी कि कानून सबके लिए समान होगा। लेकिन जब ऐसे मामले सामने आते हैं, तो विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर मिलता है। सरकार यदि पारदर्शी तरीके से कार्रवाई नहीं करती, तो यह धारणा मजबूत हो सकती है कि प्रभावशाली लोगों के मामलों में प्रशासन नरम रवैया अपनाता है।
मुख्यमंत्री धामी स्वयं कई बार कह चुके हैं कि अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा। अब समय आ गया है कि इन दावों की परीक्षा हो। यदि किसी के विरुद्ध गंभीर आर्थिक अपराध के आरोप हैं और मामला न्यायालय में भी विचारित हो चुका है, तो जांच एजेंसियों को पूरी निष्पक्षता और तेजी के साथ अपना काम करना चाहिए।
इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण पहलू है। उत्तराखंड लंबे समय से भूमि संबंधी विवादों, फर्जीवाड़ों और कथित भू-माफिया गतिविधियों को लेकर चर्चा में रहा है। सरकार ने समय-समय पर भू-माफियाओं के विरुद्ध अभियान चलाने की बात कही है। लेकिन यदि करोड़ों रुपये से जुड़े ऐसे मामलों में भी पीड़ित पक्ष सार्वजनिक रूप से न्याय की गुहार लगाने को मजबूर हो, तो यह अभियान केवल घोषणाओं तक सीमित दिखाई देता है।
धामी सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुलिस किसी भी राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक दबाव से मुक्त होकर कार्य करे। यदि पुलिस निष्पक्ष जांच करती है, तो इससे न केवल पीड़ित को न्याय मिलेगा बल्कि सरकार की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी।
आज उत्तराखंड की जनता यह जानना चाहती है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद आखिर कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है। क्या जांच में कोई कानूनी अड़चन है? क्या प्रशासन के पास पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं? या फिर मामला किसी प्रभावशाली नेटवर्क के कारण लंबित पड़ा है? जब तक सरकार इन सवालों का स्पष्ट उत्तर नहीं देती, तब तक संदेह और असंतोष बढ़ता रहेगा।
लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। यह विश्वास तभी कायम रहता है जब कानून का शासन दिखाई देता है। यदि किसी मामले में न्यायालय के आदेश के बाद भी कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो सरकार को रक्षात्मक होने के बजाय सक्रिय होकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
धामी सरकार के सामने यह अवसर है कि वह साबित करे कि उत्तराखंड में कानून का राज है और किसी भी व्यक्ति को उसके प्रभाव, धनबल या राजनीतिक संपर्कों के आधार पर विशेष संरक्षण नहीं मिलेगा। यदि ऐसा नहीं होता, तो विपक्ष के उन आरोपों को बल मिलेगा कि राज्य में प्रशासनिक तंत्र चुनिंदा मामलों में निष्क्रिय हो जाता है।
अंततः यह मामला केवल बिक्रम राणा या कथित 19.81 करोड़ रुपये के भूमि सौदे का नहीं है। यह उत्तराखंड में न्याय, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून के समान अनुपालन की परीक्षा बन चुका है। जनता यह देख रही है कि सरकार और पुलिस आगे क्या कदम उठाती है। यदि कार्रवाई होती है तो यह कानून के शासन की जीत होगी, लेकिन यदि देरी और टालमटोल जारी रहती है, तो सरकार की जवाबदेही पर उठ रहे सवाल और अधिक तीखे होते जाएंगे।
अब गेंद सरकार और प्रशासन के पाले में है। उत्तराखंड की जनता जवाब चाहती है, पारदर्शिता चाहती है और सबसे बढ़कर यह देखना चाहती है कि क्या वास्तव में कानून सबके लिए समान है।
यह मसौदा आरोपों को तथ्य के रूप में स्थापित किए बिना सरकार की जवाबदेही पर तीखा राजनीतिक प्रश्न उठाता है, जिससे मानहानि या तथ्यात्मक जोखिम कम रहता है।


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