देहरादून। वैश्विक स्तर पर प्रकाशित एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि दुनिया की सबसे अमीर 10 प्रतिशत आबादी द्वारा ऊर्जा और खाद्य संसाधनों के अत्यधिक उपभोग से हर वर्ष लगभग 5.7 खरब डॉलर का पर्यावरणीय नुकसान हो रहा है। यह अध्ययन ऑक्सफोर्ड और लेइडेन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है और इसमें कहा गया है कि सबसे अधिक संसाधन उपभोग करने वाला वर्ग ही पर्यावरण विनाश और आर्थिक असमानता का सबसे बड़ा कारण बन रहा है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
उत्तराखंड के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह रिपोर्ट अवतार सिंह बिष्ट हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स के
हिमालयी राज्य उत्तराखंड जलवायु परिवर्तन के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल है। यहां ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, अनियमित वर्षा, बादल फटना, जंगलों में बढ़ती आग, भूस्खलन और नदियों में बाढ़ जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्विक स्तर पर बढ़ती ऊर्जा खपत और जीवाश्म ईंधनों के उपयोग का सीधा असर हिमालयी पारिस्थितिकी पर दिखाई दे रहा है।
राज्य में बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं, सड़क चौड़ीकरण, चारधाम मार्ग, सुरंग निर्माण, पर्यटन का बढ़ता दबाव और अनियोजित शहरीकरण भी प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर पड़ रहा है, जिनकी आजीविका खेती, जंगल और प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर है।
अमीरों का उपभोग, गरीबों पर बोझ
अध्ययन के अनुसार दुनिया की केवल 10 प्रतिशत सबसे समृद्ध आबादी के उपभोग के कारण होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की कीमत प्रति व्यक्ति 2300 से 7500 डॉलर प्रतिवर्ष तक है। भारत में भी सबसे समृद्ध उपभोक्ताओं की जीवनशैली का पर्यावरणीय प्रभाव आम नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक और सामाजिक बोझ के रूप में पड़ रहा है।
उत्तराखंड में इसका असर प्राकृतिक आपदाओं, खेती की घटती उत्पादकता, पेयजल संकट, पलायन और बढ़ते स्वास्थ्य जोखिमों के रूप में देखा जा सकता है।
जैव विविधता पर गंभीर खतरा
रिपोर्ट में कहा गया है कि संसाधनों की अत्यधिक खपत से होने वाले कुल पर्यावरणीय नुकसान का लगभग आधा हिस्सा जैव विविधता के विनाश से जुड़ा है। उत्तराखंड, जहां अनेक दुर्लभ वनस्पतियां और वन्यजीव पाए जाते हैं, वहां जंगलों की आग, अवैध कटान और विकास परियोजनाओं के कारण यह खतरा लगातार बढ़ रहा है।
बढ़ती असमानता और उत्तराखंड
अध्ययन में आर्थिक असमानता को पर्यावरण संकट की प्रमुख वजह बताया गया है। उत्तराखंड में भी एक ओर बड़े शहरों और पर्यटन क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं, जबकि दूसरी ओर पर्वतीय गांवों से लगातार पलायन हो रहा है। सीमित संसाधनों पर निर्भर ग्रामीण आबादी जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं का सबसे अधिक नुकसान झेल रही है, जबकि संसाधनों का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग के उपभोग में जा रहा है।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स का मानना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्यों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। राज्य की नीतियों में जल, जंगल, जमीन और जैव विविधता के संरक्षण के साथ-साथ सतत पर्यटन, स्वच्छ ऊर्जा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को प्राथमिकता देना समय की मांग है।
यह अध्ययन वैश्विक असमानता की तस्वीर न दिखाता हैं उत्तराखंड जैसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील राज्यों के लिए भी गंभीर चेतावनी है। यदि संसाधनों के असमान उपभोग और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो आने वाले वर्षों में हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं की और बड़ी कीमत चुका सकता है।
