हरेला का संदेश और ऋषिकेश के पेड़ों की पुकार: विकास के साथ प्रकृति का संतुलन ही देवभूमि का धर्म? देहरादून-ऋषिकेश हाईवे चौड़ीकरण पर बढ़ा विवाद, हजारों पेड़ों की कटाई का विरोध

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हरेला पर्व 2026 की समस्त प्रदेशवासियों, देश-विदेश में बसे उत्तराखंडवासियों तथा प्रकृति प्रेमियों को हार्दिक शुभकामनाएं।

देहरादून-ऋषिकेश हाईवे चौड़ीकरण पर बढ़ा विवाद, हजारों पेड़ों की कटाई का विरोध
देहरादून-ऋषिकेश हाईवे के भानियावाला-ऋषिकेश खंड को फोर लेन बनाने की परियोजना को लेकर विवाद गहरा गया है। परियोजना के लिए करीब 3000 से 4000 परिपक्व पेड़ काटे जाने प्रस्तावित हैं, जिसके विरोध में पर्यावरण प्रेमियों ने देहरादून स्थित NHAI कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सड़क चौड़ीकरण का प्रमुख उद्देश्य वीआईपी आवाजाही को सुगम बनाना है, जबकि इससे हाथी कॉरिडोर और वन क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ेगा।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह इलाका हाथियों की प्राकृतिक आवाजाही का महत्वपूर्ण मार्ग है और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से वन्यजीवों का आवास प्रभावित होगा। दूसरी ओर, NHAI और राज्य सरकार का कहना है कि परियोजना के लिए सभी कानूनी और पर्यावरणीय प्रक्रियाएं पूरी की गई हैं। वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए एलिफेंट अंडरपास, वाइल्डलाइफ बॉक्स कल्वर्ट और साउंड बैरियर जैसी व्यवस्थाएं भी प्रस्तावित हैं।
इस मुद्दे ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पर्यावरण प्रेमी परियोजना की समीक्षा की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार का दावा है कि सड़क चौड़ीकरण क्षेत्र की यातायात व्यवस्था और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है।


देवभूमि उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, गंगा, मंदिरों और तीर्थों से ही नहीं, बल्कि यहां के जंगलों, नदियों, पर्वतों और वृक्षों से भी है। यहां प्रकृति पूजनीय है, उपभोग की वस्तु मात्र नहीं। उत्तराखंड का लोकजीवन सदियों से पेड़ों, जलस्रोतों और जैव विविधता के साथ जुड़ा रहा है। यही कारण है कि हरेला जैसा लोकपर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था, कृतज्ञता और संरक्षण का जीवंत संदेश है।
16 जुलाई 2026 को मनाया जाने वाला हरेला पर्व हमें याद दिलाता है कि हरियाली ही जीवन है। यह पर्व वर्षा ऋतु, कृषि, पर्यावरण, परिवार और भगवान शिव की आराधना का पावन संगम है। हरेला हमें सिखाता है कि जिस धरती से अन्न मिलता है, जिस वृक्ष से प्राणवायु मिलती है और जिस प्रकृति से जीवन चलता है, उसका संरक्षण प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य है।
आज राज्यभर में हरेला के अवसर पर लाखों पौधे लगाए जाएंगे। सरकारी विभाग वृक्षारोपण अभियान चलाएंगे, विद्यालयों और सामाजिक संगठनों द्वारा पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाई जाएगी। यह स्वागतयोग्य पहल है। प्रत्येक पौधा भविष्य की सांस है और हर पौधे का रोपण आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है।
किन्तु इसी समय एक प्रश्न पूरे उत्तराखंड के मन में उठ रहा है। जिस दिन हम पौधे लगाने का संकल्प ले रहे हैं, उसी समय ऋषिकेश सहित कई स्थानों पर सड़क चौड़ीकरण और अन्य परियोजनाओं के नाम पर वर्षों पुराने हजारों पेड़ों को काटा जा रहा है। यह दृश्य लोगों को भीतर तक विचलित कर रहा है।
ऋषिकेश केवल एक शहर नहीं है। यह गंगा तट की आध्यात्मिक नगरी है, चारधाम यात्रा का प्रवेश द्वार है और योग की वैश्विक राजधानी के रूप में विश्वभर में अपनी पहचान रखता है। यहां के वृक्ष केवल लकड़ी के ढांचे नहीं हैं। इनकी छांव में पीढ़ियां बड़ी हुई हैं, यात्रियों ने विश्राम किया है, पक्षियों ने घर बनाए हैं और पर्यावरण ने अपना संतुलन बनाए रखा है।
यदि विकास आवश्यक है तो पर्यावरण भी उतना ही आवश्यक है। सड़कें बननी चाहिए, यातायात सुगम होना चाहिए और आधुनिक सुविधाएं भी मिलनी चाहिए। किन्तु विकास का अर्थ यह कैसे हो सकता है कि दशकों पुराने वृक्ष कुछ घंटों में मशीनों से धराशायी कर दिए जाएं? जिस पेड़ को बड़ा होने में पचास या सौ वर्ष लगे, उसे काटने में कुछ मिनट ही पर्याप्त हैं। प्रकृति इस क्षति की भरपाई इतनी शीघ्र नहीं कर सकती।
हरेला का वास्तविक संदेश केवल पौधा लगाना नहीं, बल्कि पहले से खड़े वृक्षों की रक्षा करना भी है। यदि एक ओर हजार पौधे लगाए जाएं और दूसरी ओर हजारों परिपक्व वृक्ष काट दिए जाएं, तो पर्यावरण का संतुलन कैसे बनेगा? एक नया पौधा उस विशाल वृक्ष के समान पर्यावरणीय योगदान देने में वर्षों लगा देता है।
उत्तराखंड के इतिहास में चिपको आंदोलन पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा बना। गौरा देवी और पहाड़ की महिलाओं ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना वृक्षों से लिपटकर उन्हें बचाया था। उनका संदेश था कि जंगल केवल लकड़ी नहीं, बल्कि मिट्टी, पानी और जीवन के आधार हैं। आज उसी उत्तराखंड में यदि लोग अपने पेड़ों को बचाने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं, तो उनकी भावनाओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
सरकार से अपेक्षा है कि विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन सर्वोच्च प्राथमिकता बने। यदि किसी स्थान पर पेड़ काटना अपरिहार्य हो, तो उसके पीछे पूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन, पारदर्शी प्रक्रिया और जनसहमति होनी चाहिए। जहां वैकल्पिक डिजाइन संभव हो, वहां पेड़ों को बचाने के विकल्प अपनाए जाएं। आधुनिक तकनीक का उद्देश्य प्रकृति की रक्षा करते हुए विकास करना होना चाहिए।
यह भी आवश्यक है कि जिन पेड़ों को हटाना अपरिहार्य बताया जाता है, उनकी संख्या, प्रजाति, आयु, पर्यावरणीय प्रभाव तथा प्रतिपूरक वृक्षारोपण की पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि कितने वृक्ष हटाए गए, उनके स्थान पर कितने पौधे लगाए जाएंगे, उनकी देखभाल कौन करेगा और कितने वर्षों तक उनका संरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा।
उत्तराखंड की जनता का पेड़ों से भावनात्मक रिश्ता है। यहां पीपल, बरगद, बुरांश, देवदार, बांज, काफल और अन्य वृक्ष केवल वनस्पति नहीं, बल्कि संस्कृति और आस्था के प्रतीक हैं। अनेक गांवों में वृक्षों की पूजा की जाती है। लोकगीतों और लोककथाओं में भी प्रकृति का विशेष स्थान है। ऐसे में वृक्षों की अंधाधुंध कटाई केवल पर्यावरणीय विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चिंता भी है।
हरेला हमें यह भी सिखाता है कि प्रकृति और भगवान शिव एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। शिव कैलाश के अधिपति हैं, हिमालय के स्वामी हैं और वन, पर्वत तथा समस्त जीव-जगत के संरक्षक माने जाते हैं। यदि हम शिव की आराधना करते हैं, तो उनके सृजन की रक्षा भी हमारा धर्म होना चाहिए।
आज आवश्यकता किसी टकराव की नहीं, बल्कि संवाद और संतुलन की है। सरकार, पर्यावरणविद, वैज्ञानिक, स्थानीय नागरिक और सामाजिक संगठन मिलकर ऐसा समाधान निकालें जिसमें विकास भी हो और प्रकृति भी सुरक्षित रहे। यही उत्तराखंड की संस्कृति और भविष्य दोनों के हित में होगा।
हरेला पर्व के अवसर पर प्रत्येक उत्तराखंडवासी एक संकल्प ले—
कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएं।
लगाए गए पौधे की नियमित देखभाल करें।
अपने आसपास के पुराने वृक्षों की रक्षा के लिए जागरूक रहें।
जल, जंगल और जमीन के संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाएं।
आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाएं।
यदि हम केवल पौधे लगाएंगे और परिपक्व वृक्षों को बचाने का प्रयास नहीं करेंगे, तो हरेला का संदेश अधूरा रह जाएगा। इस पावन पर्व की सार्थकता तभी है जब हरियाली केवल समारोह का विषय न होकर हमारी जीवनशैली बने।
हरेला का वास्तविक अर्थ धरती को हरा-भरा रखना है। उत्तराखंड की आत्मा उसके जंगलों में बसती है, उसकी पहचान उसके वृक्षों से है और उसका भविष्य भी इन्हीं के संरक्षण में सुरक्षित है।
आइए, हरेला के इस पावन अवसर पर प्रकृति, पर्यावरण और देवभूमि की अस्मिता की रक्षा का संकल्प लें। विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टि से दोनों साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। यही देवभूमि का संदेश है, यही हरेला की भावना है और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है।
हरेला की सभी प्रदेशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं।
धरती हरी रहे, जंगल सुरक्षित रहें, नदियां निर्मल बहती रहें और उत्तराखंड की सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहर सदैव अक्षुण्ण बनी रहे।


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