उत्तराखंड को ईमानदार प्रशासन, पारदर्शी व्यवस्था और देवभूमि की पहचान के साथ देखा जाता है। दूसरी ओर, समय-समय पर सरकारी विभागों, भर्ती प्रक्रियाओं, भूमि, खनन, शराब, वन, विकास कार्यों और स्थानीय निकायों से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोप भी लगातार सुर्खियों में आते रहे हैं। ऐसे में जब तेलंगाना, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र या अन्य राज्यों में आय से अधिक संपत्ति के मामलों में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB), सीबीआई, ईडी या लोकायुक्त जैसी एजेंसियों की छापेमारी की खबरें सामने आती हैं, तब उत्तराखंड को लेकर एक स्वाभाविक सवाल उठता है—यदि यहां भी भ्रष्टाचार के आरोप लगातार सामने आते हैं, तो बड़े पैमाने पर ऐसी कार्रवाई अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई देती है?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
हाल ही में तेलंगाना में HMDA के चीफ इंजीनियर बी. रविंदर के यहां ACB की कार्रवाई में करोड़ों रुपये की संपत्ति, सोना, चांदी, लग्जरी वाहन और कई अचल संपत्तियों का खुलासा हुआ। यह कार्रवाई बताती है कि जब जांच एजेंसियां सक्रिय होती हैं तो सरकारी अधिकारियों की वास्तविक संपत्ति का आकलन सामने आ सकता है।
उत्तराखंड में भी वर्षों से अनेक मामलों में भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। विधानसभा भर्ती विवाद, अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) पेपर लीक, विभिन्न विभागों में अनियमितताओं के आरोप, सड़क निर्माण, सिंचाई, खनन, भूमि खरीद, नगर निकाय और विकास परियोजनाओं पर सवाल उठते रहे हैं। इन मामलों में जांच भी हुई और कई जगह गिरफ्तारियां भी हुईं। लेकिन आम जनता के मन में यह धारणा बनी हुई है कि आय से अधिक संपत्ति की व्यापक छापेमारी और बड़े अधिकारियों की संपत्तियों का सार्वजनिक खुलासा अपेक्षाकृत कम देखने को मिलता है।
यहीं से व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं। यदि भ्रष्टाचार के आरोप बार-बार सामने आते हैं तो जांच एजेंसियों को केवल शिकायतों तक सीमित रहने के बजाय आर्थिक जांच, संपत्ति के स्रोत, बेनामी निवेश, रिश्तेदारों के नाम संपत्ति और बैंक लेन-देन की भी गहन जांच करनी चाहिए। इससे आरोपों और वास्तविक तथ्यों के बीच स्पष्ट अंतर सामने आ सकता है।
हालांकि, यह कहना भी उचित नहीं होगा कि उत्तराखंड में कभी कोई कार्रवाई हुई ही नहीं। राज्य की विजिलेंस इकाई और अन्य एजेंसियों ने समय-समय पर रिश्वत लेते हुए अधिकारियों और कर्मचारियों को गिरफ्तार किया है। कई मामलों में जांच भी चली है। लेकिन रिश्वत के छोटे मामलों और आय से अधिक संपत्ति के बड़े मामलों के बीच बड़ा अंतर है। जनता का ध्यान अक्सर दूसरी श्रेणी के मामलों पर जाता है।
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सभी राज्यों की संस्थागत व्यवस्था समान नहीं होती। कुछ राज्यों में स्वतंत्र और सक्रिय एंटी करप्शन ब्यूरो या लोकायुक्त लंबे समय से कार्यरत हैं, जबकि अन्य राज्यों में जांच की प्रक्रिया अलग ढंग से संचालित होती है। इसी कारण विभिन्न राज्यों में कार्रवाई के स्वरूप की सीधी तुलना हमेशा उचित निष्कर्ष तक नहीं पहुंचाती।
लोकतंत्र में केवल भ्रष्टाचार की चर्चा पर्याप्त नहीं होती। यदि किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि पर गंभीर आरोप हैं तो उनका निष्पक्ष और समयबद्ध परीक्षण होना चाहिए। यदि आरोप सही हैं तो कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोप गलत हैं तो संबंधित व्यक्ति को भी शीघ्र न्याय मिलना चाहिए। कानून का उद्देश्य आरोप सिद्ध होने से पहले किसी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच करना है।
उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में पारदर्शिता और जवाबदेही का महत्व और भी बढ़ जाता है। यहां प्रत्येक बड़ी परियोजना, प्रत्येक भर्ती प्रक्रिया और प्रत्येक सरकारी निर्णय सीधे जनता के जीवन को प्रभावित करता है। इसलिए आर्थिक अपराधों की जांच भी उतनी ही गंभीरता से होनी चाहिए जितनी अन्य राज्यों में देखने को मिलती है।
राज्य सरकार यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति पर चलने का दावा करती है, तो उस नीति का सबसे मजबूत प्रमाण निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्रवाई और समयबद्ध अभियोजन होना चाहिए। केवल घोषणाएं जनता का विश्वास लंबे समय तक बनाए नहीं रख सकतीं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि आय से अधिक संपत्ति के मामलों में आधुनिक तकनीक, डिजिटल वित्तीय विश्लेषण, संपत्ति सत्यापन और बेनामी लेन-देन की गहन जांच को प्राथमिकता दी जाए। इससे ईमानदार अधिकारियों का मनोबल भी बढ़ेगा और भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के लिए स्पष्ट संदेश जाएगा।
