नीट पेपर लीक, आंदोलन और अराजकता: लोकतंत्र में विरोध का अधिकार, लेकिन कानून से ऊपर कोई नहीं

Spread the love



नीट पेपर लीक देश के लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय है। इस घटना ने करोड़ों अभिभावकों और छात्रों के मन में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। ऐसे मामलों में सरकार की जवाबदेही तय होना बेशक, वे विधानसभाओं/संसद और लोगों के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन पहले वाले का शायद ही कभी आह्वान किया जाता है और बाद वाला केवल चुनाव के समय होता है। तब एक मंत्री से किस तरह की जवाबदेही की उम्मीद की जानी चाहिए? प्रधान का मामला इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार करने का अवसर प्रदान करता है।
देश का प्रशासन उन अधिकारियों द्वारा चलाया जाता है जिनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे कानून और नियमों के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करें। कई मामलों में उन्हें यह सुनिश्चित करना होता है कि वे दूसरों द्वारा दिए गए सुझावों से प्रभावित हुए बिना, यदि कोई दिए जाएं, तो अपने खुद के निर्णय लेकर ऐसा करें। अन्य उदाहरणों में उन्हें उन नीतियों को लागू करना होता है जिन्हें वे तैयार करने में मदद करते हैं लेकिन राजनीतिक नेतृत्व को नीति की जिम्मेदारी लेनी होती है। वह इसके लिए जवाबदेह है।
राजनीतिक नेतृत्व को सामान्यतः अधिकारियों के काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, लेकिन उसे प्रशासनिक तंत्र पर नजर रखनी चाहिए। यदि वह उस oversight (निगरानी) को नहीं करती है, तो वह उस कार्य को नहीं कर रही है जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है। इसके अलावा, यदि वह अपने निगरानी कार्यों को अच्छी तरह से करती है तो यह भी सुनिश्चित करती है कि नौकरशाहों और अधिकारियों को उनके पैरों पर रखा जाए।
इसलिए, अधिकारियों से उनके द्वारा उठाए जाने वाले कदमों और अपने कर्तव्यों के पालन के लिए की जा रही व्यवस्थाओं के बारे में सवाल पूछना एक मंत्री का काम है। इसके अलावा मंत्रियों से यह भी उम्मीद की जाती है कि वे अधिकारियों को बताएं कि जनता उनकी कार्रवाई और प्रशासनिक निर्णयों पर कैसे प्रतिक्रिया दे रही है।
मंत्रिस्तरीय निगरानी का मामला?
प्रधान को जिस सवाल का जवाब देना है, वह यह है कि क्या उन्होंने नीट परीक्षा की देखरेख की थी? क्या उन्होंने इसे आयोजित करने वाली एजेंसी से उन व्यवस्थाओं के बारे में पूछा जो की जा रही थीं? क्या उन्होंने आम तौर पर खुद को संतुष्ट किया कि इसके सुरक्षित संचालन के लिए पर्याप्त व्यवस्था की जा रही है? यह कोई गुप्त सूचना नहीं है। उनकी ऑफिस डायरी इसका खुलासा कर देगी।
यदि उन्होंने अधिकारियों और संबंधित एजेंसी के साथ नीट परीक्षा पर चर्चा नहीं की, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से निगरानी करने में लापरवाही बरती। इसके लिए उन्हें राजनीतिक रूप से जवाबदेह होना होगा। यह वह निवारक कार्रवाई है जिसका सुझाव एक मंत्री अधिकारियों को देता है जो महत्वपूर्ण है न कि सुधारात्मक जो नीट जैसे भयानक पेपरलीक के बाद अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।
स्वाभाविक रूप से, मंत्रिस्तरीय निगरानी के लिए कोई पक्का नियम नहीं तय किया जा सकता है, लेकिन यह किया जाना चाहिए, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। क्या धर्मेंद्र प्रधान ने ऐसा किया? उन्हें खुलकर सामने आना चाहिए।

दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई भी आवश्यक है। लेकिन इसके साथ एक दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या किसी भी जनआंदोलन के नाम पर हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, पुलिस पर हमला करना और राजधानी का सामान्य जीवन बाधित करना स्वीकार किया जा सकता है?
देश के अनेक राष्ट्रवादी और भाजपा समर्थक वर्ग का मानना है कि पेपर लीक के दोषियों को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए, लेकिन कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वालों के साथ भी समान कठोरता बरती जानी चाहिए। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार संविधान देता है, किंतु हिंसा का अधिकार किसी को प्राप्त नहीं है।
इसी संदर्भ में केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता जे.पी. नड्डा ने भी यह कहा कि नीट पेपर लीक जैसे गंभीर विषय का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। उनका कहना था कि इस मुद्दे को छात्रों के हित में देखा जाना चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ-हानि के नजरिए से। दूसरी ओर विपक्ष लगातार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करता रहा है और संसद के भीतर तथा बाहर आंदोलन का समर्थन कर रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने संदेश में स्वीकार किया कि पेपर लीक सामान्य घटना नहीं थी। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता लाखों छात्रों का एक वर्ष बचाना थी, इसलिए दोबारा परीक्षा कराई गई और साथ ही फास्ट-ट्रैक कोर्ट तथा सख्त कानूनों की दिशा में कदम उठाए गए। सरकार का दावा है कि दोषियों को किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जाएगा।
इसके बावजूद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जारी है। भाजपा समर्थकों का एक वर्ग मानता है कि यदि केवल राजनीतिक दबाव के कारण तत्काल इस्तीफा लिया जाता है, तो इससे यह संदेश जा सकता है कि सड़क के दबाव के आगे सरकार झुक गई। उनका तर्क है कि यदि किसी मंत्री की जवाबदेही बनती है, तो उसका निर्णय तथ्यों, जांच और राजनीतिक नेतृत्व के विवेक के आधार पर होना चाहिए, न कि हिंसक दबाव के आधार पर।
इस वर्ग का यह भी मानना है कि आंदोलन में शामिल अधिकांश छात्र शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखना चाहते हैं, लेकिन यदि कुछ उपद्रवी तत्व हिंसा, तोड़फोड़, पुलिस पर हमला या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, तो उन्हें आंदोलनकारियों से अलग पहचान कर कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। किसी भी शांतिपूर्ण आंदोलन की विश्वसनीयता तब प्रभावित होती है जब उसमें अराजक गतिविधियां शामिल हो जाती हैं।
दिल्ली और अन्य स्थानों पर हुई झड़पों के बाद पुलिस द्वारा बड़ी संख्या में लोगों की पहचान, सीसीटीवी फुटेज की जांच और डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण किया गया। यदि किसी व्यक्ति ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया या हिंसा भड़काई है, तो उसके विरुद्ध निष्पक्ष जांच के बाद कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। कानून का राज तभी मजबूत होगा जब अपराधी की पहचान उसके राजनीतिक या वैचारिक झुकाव से नहीं, बल्कि उसके अपराध से होगी।
राष्ट्रवादी विचार रखने वाले अनेक लोगों का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में करोड़ों छात्र हैं। यदि किसी आंदोलन में कुछ हजार लोग भाग लेते हैं, तो केवल संख्या के आधार पर सरकार को अपनी नीतियां बदलने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व सभी नागरिकों के हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना है।
इसके साथ ही यह भी उतना ही सत्य है कि नीट पेपर लीक जैसी घटना ने सरकार की परीक्षा प्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इसलिए दोषियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई, परीक्षा प्रणाली में सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। जनता यह अपेक्षा करती है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व सरकार से प्रश्न पूछना है और सरकार का दायित्व उत्तर देना। लेकिन यदि किसी आंदोलन के दौरान हिंसा, तोड़फोड़ या कानून-व्यवस्था भंग होती है, तो राज्य को कानून के अनुसार कार्रवाई करने का पूरा अधिकार और दायित्व दोनों है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध और हिंसक अराजकता के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
अंततः यह बहस केवल धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक सीमित नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि देश की परीक्षा प्रणाली को कैसे अधिक सुरक्षित बनाया जाए, दोषियों को कैसे शीघ्र दंड मिले और भविष्य में छात्रों का विश्वास कैसे बहाल किया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी जनआंदोलन की आड़ में हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति और कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वालों को किसी प्रकार का संरक्षण न मिले।
एक सशक्त लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही भी आवश्यक है और कानून का कठोर पालन भी। दोनों में से किसी एक की उपेक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करती है।


Spread the love