संगठन की मजबूती बनाम जनता के सवाल: क्या 2027 की राह भाजपा के लिए उतनी आसान है जितनी दिखाई जा रही है?

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उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ प्रदेश की राजनीति नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी तैयारियों को तेज करते हुए बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने का विस्तृत कार्यक्रम घोषित कर दिया है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

नई दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की अध्यक्षता में हुई उत्तराखंड कोर कमेटी की बैठक में संगठनात्मक कैलेंडर को अंतिम रूप दिया गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित प्रदेश नेतृत्व ने आगामी महीनों के कार्यक्रमों पर सहमति बनाई। तिरंगा यात्रा, हर घर तिरंगा अभियान, सांसद-विधायक बैठकें, बूथ सशक्तिकरण अभियान और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से संवाद जैसे कार्यक्रम भाजपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाए गए हैं।
संगठन की दृष्टि से यह तैयारी मजबूत दिखाई देती है। भाजपा का उद्देश्य बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और जनसंपर्क को नई गति देना है। पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही है। संगठनात्मक रूप से यह एक सुनियोजित प्रयास माना जा सकता है।
किन्तु राजनीति केवल संगठन के सहारे नहीं चलती। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है और जनता का मूल्यांकन केवल नारों, अभियानों और बैठकों से नहीं होता। पिछले वर्षों में जिन मुद्दों पर जनता के बीच असंतोष, आंदोलन और सवाल खड़े हुए, वे चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।
सबसे पहले उत्तराखंड राज्य निर्माण की मूल अवधारणा पर चर्चा आवश्यक है। अलग राज्य की मांग रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन रोकने, पर्वतीय विकास और जनभावनाओं के सम्मान के लिए उठी थी। आज भी अनेक राज्य आंदोलनकारी यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या राज्य निर्माण के मूल उद्देश्य पूरी तरह पूरे हो सके हैं। स्थायी राजधानी का मुद्दा आज भी राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। गैरसैंण को लेकर समय-समय पर आंदोलन और प्रदर्शन होते रहे हैं।
राज्य आंदोलनकारियों में लंबे समय से 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण, सम्मानजनक पेंशन, आश्रितों के लिए रोजगार, चिकित्सा सुविधाओं तथा अन्य मांगों को लेकर असंतोष दिखाई देता रहा है। कई संगठनों ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिए, धरने दिए और सरकार से शीघ्र निर्णय की मांग की। आंदोलनकारियों का कहना है कि राज्य निर्माण में योगदान देने वालों की अपेक्षाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यदि यह वर्ग चुनाव तक संतुष्ट नहीं होता, तो इसका राजनीतिक प्रभाव भी पड़ सकता है।
भाजपा सरकार पर विपक्ष लगातार भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और जनहित के मामलों की अनदेखी के आरोप लगाता रहा है। विपक्षी दलों ने विभिन्न सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, भूमि प्रबंधन, आवास आवंटन और प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों पर सरकार अपना पक्ष भी रखती रही है और कई मामलों में आरोपों को राजनीतिक बताती रही है। अंतिम सत्य का निर्धारण संबंधित जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होता है।
प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर भी समय-समय पर आरोप लगाए गए कि पात्र लाभार्थियों के स्थान पर अपात्र लोगों को लाभ मिला अथवा आवंटन प्रक्रिया में अनियमितताएं हुईं। विभिन्न स्थानों पर जांच की मांग भी उठी। दूसरी ओर सरकार का कहना रहा कि शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाती है और पारदर्शिता बनाए रखने का प्रयास जारी है।
भूमि से जुड़े मामलों में सरकारी जमीनों के उपयोग, फ्री होल्ड नीति और भूमाफियाओं को लाभ पहुंचाने जैसे आरोप भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। विपक्ष ने कई अवसरों पर सरकार को घेरा, जबकि सरकार ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कानूनी प्रक्रिया का पालन किए जाने की बात कही।
प्रदेश में स्पा सेंटरों की आड़ में अवैध गतिविधियों के आरोप भी समय-समय पर सामने आए। पुलिस ने अनेक जिलों में अभियान चलाकर कार्रवाई की। महिलाओं की सुरक्षा और कानून व्यवस्था का मुद्दा लगातार राजनीतिक बहस में बना हुआ है। महिलाओं के विरुद्ध अपराध की घटनाओं पर विपक्ष सरकार से जवाब मांगता रहा है।
सिडकुल और औद्योगिक क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं की सुरक्षा, श्रमिक अधिकारों तथा कार्यस्थल पर सुरक्षा के प्रश्न भी समय-समय पर उठते रहे हैं। किसी भी आपराधिक घटना की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग लगातार होती रही है।
ऋषिकेश-देहरादून मार्ग सहित विभिन्न विकास परियोजनाओं में पेड़ों की कटाई को लेकर पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए। सरकार ने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की बात कही तथा कई स्थानों पर वैकल्पिक वृक्षारोपण और पुनर्वास योजनाओं का उल्लेख किया। फिर भी पर्यावरण संरक्षण उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में बड़ा चुनावी विषय बन सकता है।
चारधाम यात्रा, पर्यटन और सड़क परियोजनाओं के साथ विस्थापन, मुआवजा और पुनर्वास जैसे मुद्दे भी कई क्षेत्रों में चर्चा का विषय रहे हैं। प्रभावित परिवार समय पर उचित मुआवजे और पुनर्वास की मांग करते रहे हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी, अस्पतालों में संसाधनों का अभाव और दूरदराज क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की स्थिति पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी विद्यालयों के विलय, शिक्षकों की कमी और पलायन के कारण खाली होते गांव चिंता का विषय बने हुए हैं।
रोजगार का प्रश्न उत्तराखंड की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौतियों में शामिल है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं पर उठे सवाल और युवाओं के आंदोलन ने प्रदेश की राजनीति को प्रभावित किया। सरकार ने नकल विरोधी कानून लागू करने और दोषियों पर कार्रवाई का दावा किया, किन्तु बेरोजगारी का मुद्दा अब भी विपक्ष के प्रमुख एजेंडे में शामिल है।
पलायन आज भी पर्वतीय उत्तराखंड की गंभीर समस्या है। अनेक गांव खाली हो चुके हैं। युवाओं का रोजगार के लिए मैदानों अथवा अन्य राज्यों की ओर जाना जारी है। चुनाव के दौरान यह विषय प्रमुखता से उठने की संभावना है।
उत्तराखंड क्रांति दल एक बार फिर राज्य निर्माण की मूल भावना, स्थायी राजधानी, स्थानीय रोजगार, भू-कानून, मूल निवास और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दों को लेकर जनता के बीच सक्रिय दिखाई दे रहा है। यदि पार्टी इन मुद्दों पर व्यापक जनसमर्थन जुटाने में सफल होती है तो कुछ विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी मुकाबला रोचक हो सकता है।
कांग्रेस भी संगठन को सक्रिय करने में जुटी है। प्रदेश भर में बैठकों, जनसभाओं और आंदोलनों के माध्यम से सरकार को घेरने का प्रयास जारी है। विशेष रूप से कुमाऊं और तराई क्षेत्र में कांग्रेस अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर कार्य कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल संगठन की शक्ति का चुनाव नहीं होगा। यह सरकार के प्रदर्शन, स्थानीय मुद्दों, जनता के विश्वास, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और विपक्ष की एकजुटता पर भी निर्भर करेगा।
भाजपा का मजबूत संगठन निश्चित रूप से उसकी सबसे बड़ी ताकत है। बूथ स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ता चुनावी प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किन्तु यदि जनता के बीच मौजूद असंतोष, राज्य आंदोलनकारियों की मांगें, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, पलायन, महिलाओं की सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसे आरोप चुनावी विमर्श के केंद्र में आते हैं, तो मुकाबला पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
अंततः उत्तराखंड की जनता यह तय करेगी कि संगठनात्मक मजबूती अधिक प्रभावी सिद्ध होती है या जनभावनाओं से जुड़े प्रश्न। 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन अथवा सत्ता वापसी का चुनाव भर नहीं होगा, बल्कि यह राज्य निर्माण के मूल उद्देश्यों, विकास मॉडल, पारदर्शिता, रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और जनविश्वास की भी परीक्षा होगा।


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