भाजपा की हैट्रिक की रणनीति सफल होगी? 23 सीटों का मिशन कितना आसान, सत्ता विरोधी लहर और नए समीकरण कितने भारी?

Spread the love



देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। भारतीय जनता पार्टी ने नई दिल्ली में हुई कोर ग्रुप बैठक के बाद चुनावी रणनीति का खाका तैयार कर दिया है। पार्टी का दावा है कि 2022 में हारी 23 सीटों पर विशेष फोकस किया जाएगा, बूथ स्तर तक संगठन मजबूत होगा और जेन-जी (Gen Z) मतदाताओं को जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, सांसदों, मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं को अलग-अलग सीटों की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है।
मगर बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल रणनीति बना लेने से चुनावी जीत सुनिश्चित हो जाती है? क्या छह महीने में वर्षों की नाराजगी दूर हो जाएगी? क्या भाजपा तीसरी बार पूर्ण बहुमत हासिल कर पाएगी?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनावी रणनीति जितनी महत्वपूर्ण होती है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण जनता का मूड होता है। उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बेरोजगारी, पलायन, भर्ती परीक्षाओं पर उठे सवाल, महंगाई, स्थानीय मुद्दे, किसानों की समस्याएं, शहरी विकास, पहाड़ और मैदान के संतुलन जैसे अनेक विषय लगातार चर्चा में रहे हैं। ऐसे में चुनाव केवल संगठन के दम पर नहीं, बल्कि जनविश्वास के आधार पर तय होगा।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


23 सीटों पर जिम्मेदारी तय, मगर जीत की गारंटी कौन देगा?
भाजपा ने 2022 में हारी 23 सीटों के लिए मुख्यमंत्री, सांसदों और वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंप दी है। खटीमा की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को, बदरीनाथ की जिम्मेदारी सांसद अनिल बलूनी को तथा पिरान कलियर की जिम्मेदारी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को दी गई है।
सवाल उठता है—क्या किसी नेता को जिम्मेदारी सौंप देने भर से सीट जीत ली जाएगी? यदि ऐसा होता तो 2022 में ये सीटें हाथ से क्यों निकलीं? क्या इन क्षेत्रों की मूल समस्याओं का समाधान हो चुका है?
जेन-जी पर फोकस या युवाओं की नाराजगी कम करने की कोशिश?
बैठक में जेन-जी मतदाताओं पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई है।
मगर प्रश्न यह भी उठ रहा है कि क्या युवाओं को केवल कार्यक्रमों से जोड़ा जा सकता है? क्या रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, शिक्षा और अवसरों से जुड़े सवाल अधिक प्रभावी मुद्दे नहीं बनेंगे? यदि युवा इन्हीं मुद्दों पर मतदान करते हैं, तो चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
सरकार-संगठन में समन्वय की जरूरत क्यों महसूस हुई?
बैठक में सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर विशेष जोर दिया गया।
यह भी अपने आप में एक सवाल है कि यदि समन्वय पहले से मजबूत था, तो अलग से इस पर जोर देने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या केंद्रीय नेतृत्व को जमीनी स्तर पर किसी प्रकार की असंतुष्टि का संकेत मिला है?
खेमेबाजी खत्म करने का निर्देश—क्या अंदरूनी असंतोष मौजूद है?
केंद्रीय नेतृत्व ने स्पष्ट कहा कि किसी भी स्तर पर खेमेबाजी नहीं होनी चाहिए।
यह निर्देश कई राजनीतिक सवाल भी खड़े करता है। यदि सब कुछ सामान्य है तो यह संदेश देने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या चुनाव से पहले संगठनात्मक असंतोष को नियंत्रित करना भी चुनौती है?
सत्ता विरोधी माहौल को लेकर चिंता?
बैठक में नेताओं से जनता की नाराजगी दूर करने को प्राथमिकता देने की बात कही गई।
यह संकेत देता है कि पार्टी स्वयं भी सत्ता विरोधी प्रभाव को गंभीरता से देख रही है। लगातार दो कार्यकाल के बाद जनता की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं और उसी अनुपात में जवाबदेही भी बढ़ती है।
क्या केवल लाभार्थी सम्मेलन पर्याप्त होंगे?
भाजपा लाभार्थी सम्मेलन, बूथ अभियान और जनसंपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से चुनावी माहौल मजबूत करना चाहती है।
मगर क्या सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर जनता का मूल्यांकन इन कार्यक्रमों से प्रभावित होगा या वास्तविक काम से?
बहुमत का रास्ता पहले जितना आसान नहीं
उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन का क्रम लंबे समय तक चलता रहा। भाजपा ने 2022 में इस परंपरा को तोड़ा, मगर 2027 में उसके सामने तीसरी बार बहुमत हासिल करने की चुनौती पहले से अधिक कठिन मानी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस तक सीमित रहेगा, ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी। क्षेत्रीय दल भी कुछ क्षेत्रों में प्रभाव डाल सकते हैं।
उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) क्या बदल सकता है समीकरण?
उत्तराखंड क्रांति दल लंबे समय से राज्य आंदोलन की विरासत और क्षेत्रीय मुद्दों को चुनावी एजेंडा बनाने की कोशिश करता रहा है।
यूकेडी लगातार मूल निवास, भू-कानून, रोजगार में स्थानीय युवाओं की भागीदारी, पलायन, राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान, पर्वतीय क्षेत्रों के विकास और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे विषयों को प्रमुखता से उठा रहा है।
हालांकि, पिछले कई चुनावों में यूकेडी को बड़ी चुनावी सफलता नहीं मिली, फिर भी कुछ सीटों पर उसके उम्मीदवार वोटों का समीकरण प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यदि क्षेत्रीय मुद्दे चुनाव में प्रमुख बने, तो यूकेडी की भूमिका निर्णायक हो सकती है।
कांग्रेस भी पूरी ताकत से मैदान में
दूसरी ओर कांग्रेस भी संगठन को सक्रिय करने, जनसभाओं और बूथ स्तर तक पहुंच बढ़ाने में लगी है। विपक्ष सरकार को बेरोजगारी, महंगाई, भर्ती प्रक्रियाओं, स्थानीय विकास और प्रशासनिक कार्यशैली जैसे मुद्दों पर घेर रहा है।
निष्कर्ष
भाजपा की रणनीति व्यापक अवश्य दिखाई देती है, लेकिन चुनाव केवल रणनीति से नहीं जीते जाते। अंतिम निर्णय मतदाता करता है। 23 सीटों का मिशन, जेन-जी पर फोकस, बूथ प्रबंधन और संगठनात्मक मजबूती चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, मगर इनके साथ जनता के स्थानीय मुद्दों, सरकार के प्रदर्शन और विपक्ष की रणनीति का भी समान रूप से प्रभाव रहेगा।
यह कहना कि भाजपा आसानी से हैट्रिक लगा लेगी, या यह कहना कि सत्ता परिवर्तन तय है—दोनों ही दावे इस समय समयपूर्व हैं। चुनावी तस्वीर मतदान और मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगी। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि 2027 का उत्तराखंड विधानसभा चुनाव भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों—विशेषकर यूकेडी—सभी के लिए एक कठिन और रोचक राजनीतिक परीक्षा बनने जा रहा है।


Spread the love